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अनंत_वासुदेव_मंदिर भूवनेश्वर कि सर्वप्रथम पुरातन विष्णु मंदिर है ।पुरातन काल मे भूवनेश्वर को शैव क्षेत्र के रुप मे जानाजाता था यहाँ कई प...

रविवार, 25 जून 2017

•••• मेरे प्रभु जगन्नाथ सर्वत्र विराजमान ••••

यह मेरी पवित्र भूमि ओडिशा है जिसका धूल "जगन्नाथ" कहते हैं, हवा भी "जगन्नाथ", महासागर, नदी, धारा आदि हरकोई "जगन्नाथ" कहते हैं.....
ओडिशन संस्कृति का केंद्र भगवान जगन्नाथ है ओडिशन दर्शन का प्रतीक श्री जगन्नाथ है.....

ओडिशा का साहित्य जगन्नाथ से शुरू होता है श्री जगन्नाथ महाप्रभु ओडिश के भक्ति गीत, संगीत, कला, सोच और ओडिडिया के दिन-प्रतिदिन जीवन में हैं.....

संभवत: पूरे विश्व में ओडिशा एकमात्र भौगोलिक क्षेत्र है जहां भूपति यानी राजाएं भी भगवान जगन्नाथ की सेवा पर सफाईदार हो जाते हैं.....

वह क्यों नहीं होगा, क्योंकि ओडिशा का वास्तविक राजा (उत्कल / कलिंग) भगवान जगन्नाथ है....

शायद जगन्नाथ पूरे विश्व में एकमात्र देवता है जो अपनी दिव्य भक्तों को पवित्र दर्शन (झलक) देने के लिए अपनी मूल मूर्ति (मुगल विग्रा) के रूप में आते है.....

वह पतित-पवन, भगवान जो मोक्ष (उद्धार) यहां तक ​​कि सर्वश्रेष्ठता के लिए उनका दूसरा नाम पुरूसोत्तम है, वे पूर्णतः सर्वश्रेष्ठ है ।

उनके पवित्र निवास को पुरूषोत्तम पुरी के नाम से भी जाना जाता है जो भ्रम के बंधन से सर्व प्राणीओं को मुक्त करने का शक्ति रखता है.....

प्रभु जिसकी सब कुछ महान है उनके पवित्र निवास को श्रीक्षेत्र (गौरवशाली निवास) के रूप में जाना जाता है,
उनका मंदिर श्री-मंदिर (गौरवशाली मंदिर) है, उनकी सड़क को बडदांड (भव्य रोड) कहा जाता है,
उनका ध्वज "पतित-पावन" बाना (झंडा है उनकी रसोई को "आनंद बाज़ार" के रूप में जाना जाता है, उनके समुद्र को "महोदधी" (महासागर) आदि के रूप में जाना जाता है ...
भगवान जगन्नाथ जो मन में सभी अंतराल को पूरा कर सकते हैं और आंतरिक खुशी देता है इसलिए वह सत्_चिद-आनंद है...

"रत्त्तु बानम
दत्ताव पावर जनमा न विद्या "

 जन्म से मृत्यु तक एक आत्मा (जीवा) की निरंतर यात्रा में, उनका शरीर एक रथ जैसा है..

उस रथ पर सर्वोच्च देवता परम-आत्मा (सर्वोच्च आत्मा) के रूप में विराजमान है ।
भगवान जीवित चरम के लिए सवार है और आत्मा उस शारीरिक रथ की यात्रा की तरह है
इसलिए सवार की आज्ञा का पालन करना (स्वामी) यदि यात्रा (स्वयं जीवित प्राणी) जीवन के रास्ते पर चलता है, तो जीवन सार्थक होगा ।
यह राठयत्रा का सार है
इस रथयात्रा में  सर्वोच्च भगवान हमें जीवन भर में केवल उसके जीवन में आगे बढ़ने के लिए आशीष देते है....
लक्ष्य हासिल करना चाहें वो आध्यात्मिक हो अथवा सांसारिक कितना महत्वपूर्ण है यह हम रथयात्रा से सिखते है ।

हम सभी इन दिव्य अनुभवों से अपने जीवन को पवित्र कर सकते है 
मैं मेरे आराध्य प्रभु  के चरणकमलों में प्रणिपात पूर्वक सभी विश्ववासीओं को रथयात्रा के शुभ अवसर पर शुभेच्छा शुभकामनाएं देता हुं .....

गुरुवार, 22 जून 2017

ओडिआभाषा में संयुक्ताक्षर

कल #मैथिली भाषा के बारे में एक किताब में पढरहा था ओर यहां काहागया है कि सिर्फ मैथिली में ही संयुक्ताक्षर होते है अन्य भाषाओं में नहीं तो मैं कहता हुं यह मात्र भ्रम है ऐसी गलतफैमी में ना रहें....

जहां तक ओडिआभाषा कि बात है यहां बहुतसे ऐसे युक्ताक्षर/संयुक्ताक्षर है जिससे किसी अन्य भाषाभाषी व्यक्ति को यह भाषा सिखने में मुस्किलें होती है....
पैस है ऐसे ही कुछ ओडिआ संयुक्ताक्षर....

କ୍ଷ,କ୍ତ,କ୍ର,କ୍ସ,ଖ୍ୟ,ଚ୍ଛ,ଙ୍କ,ଙ୍ଗ,ତ୍ସ,ଦ୍ଦ,ନ୍ତ,ତ୍କ,ତ୍ତ,ଦ୍ଵ,ନ୍ଦ,ନ୍ମ,ବ୍ଲ,ନ୍ନ,ଦ୍ଧ,ତ୍ବ,ଞ୍ଜ,ଞ୍ଚ,ଜ୍ଞ,ବ୍ର,ନ୍ଧ,ତ୍ମ,ଣ୍ଟ,ଣ୍ଡ,ଟ୍ର,ଟ୍ଟ,ନ୍ତ୍ର,ର୍ଣ୍ଣ,ସ୍କ,ୱ,ସ୍ପ,ସ୍ଵ,ମ୍ପ,ମ୍ଭ,ମ୍ମ,ମ୍ଲ,ଶ୍ଚ,ଶ୍ଵ,ସ୍ଥ,ଷ୍ଣ,ଷ୍ଟ୍ର,ଷ୍ଠ,ଷ୍ଟ,ର୍ଦ୍ଧ,ଳ୍ପ,ର୍ଯ୍ୟ आदि आदि....
इसके अलावा कुछ अतिप्राचीन संयुक्ताक्षर भी हुआ करता था जैसे ऐकंत्र ଙ୍କ୍ତ,ଙ୍କ୍ଏ आदि
वैदिक भाषामें चुहों के एक प्रजाति को
'ପାଙ୍କ୍ତ୍ର' (पाङ्क्त) कहाजाता था जो प्राचीन ओडिआ ग्रंथों मे मिलजाता है ।
हालांकि ऐङ्कत्र शब्द संस्कृत में भी बिरल ही मिलता है......
(कुछ तथ्य odia classical languagge group से लियागया है)

शुक्रवार, 9 जून 2017

भूमिपुत्र बिजयानन्द पट्टनायक

लोग कहते है मोदीजी जैसा कोई नेता नहीं हुआ था....
मैं कहता हुं
हाँ हुआ था.....
नाम है
कलिंगवीर आधुनिक खारवेल भूमिपुत्र
विजयानन्द पट्टनायक(बिजुबाबु)....

लोग आज मोदीजीको लोगों के बीच निर्भय जाते देखते है तो हैरान हो जाते हे....
ओर ये उन्होंने बिजु जैसे राष्ट्रीय नेताओं से सिखा....

लोग मोदीजी के वोर्डर पर जाने ओर वहां सैनिकों का हौसला बढाते देख चकित हो जाते
भला ऐसा कोई नेता हुआ है.......

हुआ है नाम है बिजु.....
वह सिर्फ बोर्डर पर जाकै फोटो नहीं खिंचवाते थे
युद्ध भी लडते थे
१९४८ के भारत पाक युद्ध में उन्होंने युद्धभूमि में पाकिस्तानी​ सैनिकों पर हवाई बमबारी कि थी....
१९६२ भारत चीन युद्ध में बिजु ने अपनी नीजी बिमानसेवा कलिंग  एयारलाइनको सैनिकों तक
खाद्यपेय पहुंचाने मे लगा दिया था ओर
वे लगातार सीमा में ही बने रहे जबतक युद्ध अनिर्णायक खत्म नहीं हो गया तब तक....

१९६५ के भारत पाकिस्तान युद्ध में बिजु
श्री लालबहादुर शास्त्री जी के सलाहकार थे साथ में वे
पाकिस्तान भारत बोर्डर पर भी जाकर सैनिकों का मनोवल बढारहे थे....
उनदिनों इंडोनेशिया ने भारत के खिलाफ पाकिस्तान को सहायता पहुंचाने के मकसद से एक युद्धक जलपोत भेजा था जिसे बिजुबाबुने
इंडोनेशिया नेता सुकोर्णो से बात करवाके रुकवा दिया था.....
सूकर्णो को १९४८में बिजु ने ही एक हैरतअंगेज तरिके से बचाया था
जब उन्हें इंडोनेशिया सरकार ने ५००० करोड धनराशि के साथ अपने देशका नागरिकता देना चाहा बिजुबाबु ने सस्मान ठुकरा दिया.....
उन्होंने कहा था.....
यह सम्मान भूमिपुत्र रखलेता हुं परंतु भारतीयता छोड नहीं सकता.....

आज मोदी मेक इन इंडिया मेड इन इंडिया कि बात करते है....
बिजुबाबु ने वो काम १९४८से ही शुरू करदिया था....
कलिंग टेक्सटाइल बनवाकर.....
नव्वे के दशक में तो ओडिशा के घर घर मे स्वदेशी सामान हुआ करते थे
कलिंग टिवी,कलिंग रेफरेजीरेटर आदि आदि.....

बिजु अंग्रेजीराज में भारतीय सेना में सामिल हुए थे
वाबजूद इसके वे गुप्तरुप से स्वतंत्रता सेनानियों को मदद मुहैया करते थे.....
जब अंग्रेजों को पताचला उन्हें कई वर्षों तक जेलवास भोगने पडे थे.....

ओडिशा में आज जो भी विकास देख रहे हो वे सब बिजु कि काहानी कहती है
ये जीवनी इतनी भी छोटी नहीं है
बहुत सी बातें ऐसी है जो फिर कभी सेयर करुंगा....

गुरुवार, 8 जून 2017

श्री जगन्नाथपुरी कि विशेषता क्या है

8 साल पहले 10 नवेम्बर 2007 को
Puri Ahamadabad express मैँ भाई
#राजेश_पण्डा जी के साथ
#सुरत आ रहा था !

उसी ट्रेन मे हमारे सामनेवाले सीट पर एक #प्रौढ़ #गुजराती #युगल भी था !

ये लोग #श्रीजगन्नाथधाम दर्शन
पश्चात घर लौट रहे थे

एक #ओड़िआ लौँडा जो कि #गुजरात एक दो बार हो आया था
उनके साथ बातेँ करने मे 
मशगुल था

तभी वहाँ बैठी
गुजराती #महिला ने एक दमदार प्रश्न पुछलिया

जिसका उत्तर किसी साधारण व्यक्ति के लिए आसान न हो

प्रश्न था

#श्री #जगन्नाथपुरी #कि #विशेषता
#क्या #है ?

अब वो लौँडा
शायद #खाद्यप्रिय घराने से होगा

उसने #पुरुषोत्तमपुरी कि रसोईघर
से लैके गुप्त खजानोँ तक के कथाओँ का वर्णन कर दिया !

उसका उत्तर सुनके गुजराती महिला
#स्मितहास्य करने लगी ....

अब वही प्रश्न जब #बाउन्सर बनके
भाई #राजेश_पाण्डा जी कि ओर
उछला

उन्होने उस प्रश्न को सुलझाने के लिए एक #तात्विक उत्तर दिया
जिसे सुनने के बाद गुजराती महिला
#संतुष्ट दिखी

उत्तर था --

"कहीँ #नारी कि पूजा हुई
कहीँ #पुरुष पूजे गए
यह भारत का एक अकेला
ऐसा क्षेत्र है
जहाँ #भाई #बहन ओर उनके
#पवित्र #रिस्ते को #एहमियत मिले !"

"विश्व भर मे श्रीजगन्नाथ"

* ओड़िशा मे पुरी जगन्नाथ धाम सहित कुल 3141 श्रीजगन्नाथ मंदिर है !

अन्य भारतीय राज्योँ मे 244
तथा विदेशोँ मे 154 मंदिर पाया गया है ।

विदेशोँ मे स्थित 154 श्रीजगन्नाथ मंदिरोँ मे से 54 मंदिर केवल
अमरिका मे है !

...2...

सर्वप्रथम
अमरिका मे 1968 ,
कानाड़ा मे 1972 तथा
फ्राँस मे 1991 मे रथयात्रा का आयोजन किया गया था..,

विश्वभरमे अपने मंदिरोँ मे प्रभु 24 नामोँ से पूजे जाते है ।

अबतक 102 राजा विदेशोँ मे करचुके है श्रीजगन्नाथ जी कि सेवा !

....(3)....

आलवामा मे रहनेवाले एक वैज्ञानिक माईकेल ने आठ साल पहले श्रीजगन्नाथजी कि मूर्त्ति को चाँद पर ले जा चुका है ।

बुधवार, 17 मई 2017

●●●●ओडिआभाषा में अमरुद के प्रतिशब्द●●●●

#हिंदी भाषा में #Guava (Psidium guajava)
के लिए ज्यादा से ज्यादा कितने #प्रतिशब्द है...?
#जामफल ओर #अमरुद......
लेकिन जनकर हैरान होगें
इस मूल अमरीकी फलके लिए
#Odia भाषा में एक दो नहीं आठ दश प्रतिशब्द प्रचलन में है ।

मानक #ओडिआ में #अमरुद को #पिजुळि कहाजाता है
#जाम्व -अविभक्त कोरापुट
#मया/माया-संबलपुर तथा बलांगीरपाटणा
#चाउळिआ-पुरी,खोर्द्धा
#लेभुआ-दशपल्ला(नयागड)
#महुआ-वौद,नरसिंहपुर
#पेडा-बालेश्वर,मयुरभंज
#तमस-देओगड
#बिदुडि-आनंदपुर (केंदुझर जिल्ला)
#जाम,#जामी- गंजाम कळाहांडि जिल्ला
#बिजुळि-ढेंकानाल

  ●हमारे #विच्छिन्नाचंल ओडिआ में●

#बेलति- #हलवी,#भतरी उपभाषा #वस्तर जिल्ला में
#सेतिम्बा- #सडषी उपभाषा #सडैकला #खरसंवा जिल्ला

एइ भारत आम जननी जनमभूइँ

एइ भारत आम जननी जनमभूइँ
एइ भारत यार जगते तुळना नाहीं...

सेनेह सोहाग यार अनुराग
मैत्री र बंधन नेई

एइ भारत आम जननी जनमभूइँ
एइ भारत यार जगते तुळना नाहीं...

मथारे याहार मुकुट पराए
तुंग हिमगिरी सोहे
चरण युगळ परशी याहार
सपत सिंधू बहे

यार बुकुरे कोटि निर्झरिणी याए बहि....
यार कटिरे विंध्यगिरीवर अछि रहि
प्रतिधूळिकणा प्रतिजळविंदु
या नामकु याए गाइ

एइ भारत आम जननी जनमभूइँ
एइ भारत यार जगते तुळना नाहीं...

सबुजिमा यार चिर आभरण
सुंदर याहार शिरी
गौरव यार अक्षय किरती
सौरभे उठे पूरी ......

यार पराण आम सबुरी ममता नेई
यार चरण आम सबुरी मंगळ पाइँ
सेइ भारत र संतान आमेरे
जगत कल्याण पाइँ

एइ भारत आम जननी जनमभूइँ
एइ भारत यार जगते तुळना नाहीं...

सेनेह सोहाग यार अनुराग
मैत्री र बंधन नेई

एइ भारत आम जननी जनमभूइँ
एइ भारत यार जगते तुळना नाहीं...

ओडिआ भाषा में भारि और भारी

#ओडिआभाषी #फेसबुकिये पिछले 2 साल से दिन प्रतिदिन बढ रहे है ।
अब रोज हजारों पोस्ट ओडिआमें भी आने लगे है ।
अब होता क्या है किसी ने कोई शब्द लिखदिया तो लोग चले आते है उसे #शब्दज्ञान देने....
ओर एक शब्द के लिए फिर घंटो #चर्चा चलता रहता है...
कहीं कहीं लोगों में आपसी सहमति हो जाते
तो कहीं #शाब्दिक #महाभारत छिड जाते ।

पिछले दिनों एक ओडिआभाषी बन्दे ने एक व्यक्ति पर तिखे #कटाक्ष करदिए...
उसे बुरालगा शायद
लेकिन
उसने कमेंट मे से एक शब्द को #इश्यू बनाया ओर कटाक्ष करनेवाले पर टुट पडा....

वह शब्द था भारि/भारी....
हिन्दी में आमतौर पर वजनदार के लिए #भारी शब्द का प्रयोग होता है ।
लेकिन ओडिआ में #भारी को एक तो #भारि लिखा जाता है वहीं इसे पांच अलग अर्थों में इस्तेमाल भी किया जाता है....

भृ-धातु+कर्त्ता. इ =>भारि
भृ धातु के कई अर्थ होता है
जैसे
#धारणकरना,#वहन करना,#पालन करना आदि
#भयभीत करना के अर्थ में भी इसका इस्तेमाल होता था

भारि का ओडिआ अर्थ इसप्रकार है
1.सिंह【ओडिआ में मूल भारि शब्द (देशज विशेष्य)प्रचलन में जिसका अर्थ #सिंह होता है ,शायद यह  आदिवासीओं का शब्द था]

#अत्यधिक, बहुत ही ज्यादा,#दुर्वह यानी #वजनदार,#अत्यावश्यक,#जनपूर्ण,#व्यथायुक्त,
#पीडादायक,#असह्य आदि....

लेकिन ओडिआ में भारी शब्द का अर्थ वजनदार नहीं है....
अगर आपने ऐसा लिखा वह शब्द गलत हो जएगा
आपको #ओडिआ में #भारी शब्द को #भारि लिखना होगा च्यूंकि
#ओडिआभाषा में #भारी का अर्थ #भारिक
यानी भारवहन करनेवाला होता है....

भारतीय भाषा विद्वान इसलिए
ओडिआभाषा कि मौलिकता को मानने में मजबूर हो गये ओर 2014 में odia को भारत का छठा classical language का दर्जा मिला
संस्कृत के बाद यह दुसरा आर्यभाषा है जिसे यह उपलव्धि हासिल हो पाया है.....

शुक्रवार, 5 मई 2017

●●●श्रेष्ठा तु जननी उत्कळ●●●●

या महिमा अप्रमिता
अपरुपे सुशोभिता
दिव्य अनिन्द्य कान्तिज्वळ
हृदय अर्पित छन्दे
कोटि सुत सुता बन्दे
चरणारबिन्दे सकळ
श्रेष्ठा तु जननी उत्कळ ।।

प्रकटिता चर्तुभूजा
धारण श्रीनेत्र ध्वजा
बक्षे शोभित बनमाळ
बारणारोहिणी रुप
हस्ते शंख शरचाप
करमंतित निळोत्पळ
श्रेष्ठा तु जननी उत्कळ .......।।

कुसुम मंजुळ कुंज
खंजि महीधर पुंज
घेनी निघंच बनाचंळ
निर्झरिणी कळकळ
सुनीळ तटिनी जळ
तटप्रांते उर्मी उत्थाळ
श्रेष्ठा तु जननी उत्कळ .......।।

●●●कवि तपन दास ●●●●

यह है शुद्ध संस्कृतप्राण ओडिआ...भाषा...
आज भारतके सभी आर्य भाषाएँ कलुषित हो चुकि हैं
अरवी पार्सी शब्द बोलकर लोगों ने प्राचीन संस्कृत शब्दों को बुड्ढों का शब्द मानलिया और धडल्ले से त्याग भी दिया लेकिन
"संस्कृती के देश #कलिंगोत्कल नें न तो संस्कृत शब्दों को त्यागे न ही संस्कृत के मूल व्याकरणगत नियमों का त्याग किया....
वह तो आज भी स्वयं में संस्कृत को जीवित रख पाने में सफल है और कसम है
श्रीजगन्नाथजी का ध्वज उडता रहेगा ...
जबतक ओडिआओं में स्वाभिमान जिंदा रहेगा
हमारी भाषा और संस्कृती भी जीवित रहेगी

जय हिंद
बंदे उत्कल जननी

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

श्री अरविंद ने ओडिशा एकत्रीकरणको कहा था क्षेत्रवाद

1905 में बंगभंग के बाद
बंगाल में  जन असंतोष अचानक आन्दोलन बना और च्युंकि तब कलकत्ता भारत कि राजधानी थी
एक क्षेत्र विशेष में हो रही क्रान्ति समुचे देश में फैलगया ।
उनदिनों श्री अरविंद जैसे महात्मा बंगभंग के खिलाफ सशक्त आवाज उठाने को उठखडे हुए थे....

2 साल बाद.....

1907 दिसेंबर 13 तारीख को
श्रीअरविंद ने अपने पत्रिका #बंदेमातरम्
में एक संपादकीय लिखा था....

इसमें उन्होंने #ओडिशा तथा #मधुसूदन दास जी का सम्मान पूर्वक कुछ युँ उल्लेख किया था....

"ओडिशा प्रेसिडेंसी में बर्त्तमान समय में नवजागरण नवचेतना के नवयुग में सूर्योदय हुआ है ।
उडीसा अपने अस्तित्व रक्षा हेतु मधुसूदन दास सरीखे दक्ष,शक्तिशाली नेता के अगवाई में लगगया है ।
हम नहीं जानते उनका आशय क्या है मगर हमें आशंका हो रहा है कि यह उडीआ भाषा आन्दोलन कहीं क्षेत्रवाद को बढावा न दे दें
हम भारत को एक देखना चाहते है..."(अरविंद)

जवाब में उत्कल गौरव मधुसूदन दास ने एक अंग्रेजी आर्टिकिल लिखा जिसमें पहले तो उन्होने श्रीअरविंद कि प्रशंसा कि फिर उन्होने उनके आशंकाओं को दूर करते हुए कहा था.....

"यदि 2 हिस्सों में बंटे हुए बंगाल के पुनःमिश्रण के लिए हो रहे एक क्षेत्रविशेष के आन्दोलन को जातीय सर्वभारतीय आन्दोलन का दर्जा मिला है तब
चार राज्यों में बंटे हुए प्राचीन कलिंग/उत्कल देश के पुनः एकत्रीकरण
को कैसे क्षेत्रवाद कहा जा सकता है ?
बंगभंग के खिलाफ तुम्हारा आंदोलन का जो उद्देश्य हे बिलकुल वही उद्देश्य हमारा भी है ।
इसलिए बंगभंग आंदोलन से जुडे लोग हमें  भी समर्थन करें तभी तुम और हम दोनों सफल हो पावेगें...."

खैर मधुसूदन दास के कहने पर उनकी सोच थोडी बदलनेवाली थी
तथाकथित राष्ट्रियनेता इसे कभी राष्ट्रिय मुद्दा मानते ही नहीं थे
यहाँतक कि गांधी ने भी हमारे नेताओं को ये नशीहत दे दीं थी कि वे ये सब आंदोलन रोक दें....

आज भी यही हो रहा है
जब मैं ओडिशा कि बात करता हुँ
तुम्हे लगता है ये क्षेत्रवाद है....
लेकिन नहीं ना तो तब वो क्षेत्रवाद था न आज यहाँ कोई क्षेत्रवाद फैला रहा है

अपने मिट्टीको लेकरके सबमें स्वाभिमान होना ही चाहिए
किसीके द्वारा हमारी संस्कृति भाषा मिट्टी पर मूर्खतापूर्ण टिप्पणी का उसी के भाषा में जवाब मिलेगा

जय हिंद
बंदे उत्कल जननी

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

★★★★श्रीजगन्नाथपुरी मैं राम तथा रामनवमी★★★★

रामनवमी में श्रीपुरुषोत्तमपुरी में पूजाविधि बहुत ही रोचक है......

युँ तो श्रीजगन्नाथ  श्रीविष्णु के अवतारी रुप माने जाते रहे है
परंतु रामनवमी के दिन
श्रीजगन्नाथ मंदिर कि रीतिनीति शाक्तधर्म से प्रभावित प्रतीत होती है....

"रामनवमी के दिन रात्र के समय स्वयं जगन्नाथ माता के रुपमें
भगवन श्रीराम को जन्म देते है......"

अतः उनकीक्षप्रसव वेदना कम् करने के लिए
अष्ठमी के दिन संध्या आरती के बाद
श्रीजगन्नाथ को जेउड़ भोग(ଯେଉଡ଼ ଭୋଗ)तथा गर्भोदक अर्पण कियेजाते है..... ।

नवमी में श्रीविग्रहों का मध्याह्न धूपनीति संपन्न पश्चात जन्मनीति अनुष्ठित होता है.... ।
2 महाजन सेवकों को दशरथ तथा कौशल्या मानकर जन्मविधि पाला जाता है ।

च्युंकि यह गुप्तनीतिओं मे से एक है
अतः कोई इसे देख न लें इसलिए
मंदिर के गर्भगृह में स्थित जयविजय द्वार को
बंद करदियाजाता है ।

श्रीरामजी की जन्म हो जाने के बाद
कर्पुर आरती ,महासुआर गंडुस मसाला तथा दुग्ध मणोही होता है ।
इसके बाद पंडाजी शितलभोग कराने के साथ महासुआर जयविजय द्वारके पास
चरुभात मणोही कराते है.......

जगन्नाथ ना तो पुरुष है न स्त्री
न केवल बुद्ध है न शिव न ही विष्णु.....
वह तो गणेशभेष भी धारण करते है.....
उनमें शैव शाक्त वैष्णव वौद्ध जैन गाणपत्य आदि सभी पंथ तथा जातिगत एकता के
अन्यतम चिह्न है.....
वह सनातन है !!!!

●●●श्रीजगन्नाथजी का रघुनाथभेष●●●●

जिस वर्ष वैशाख शुक्ल नवमी गुरुवार हो तथा मकर राशि श्रावणा नक्षत्रयुक्त हो तथा रामजन्मतिथी पुष्या नक्षत्रयुक्त हो
उसी दिन श्रीजगन्नाथजी की रघुनाथभेष हुआ करता था ।
मान्यता है कि इसी तिथी में अयोद्धापति श्रीराम का राज्यभिषेक संपन्न हुआ था ।

26 अप्रेल 1905 गुरुवार को अंतिमवार
श्रीजगन्नाथ श्रीरामजी के भेष धारण किये थे....

1983 में वही लग्न फिर गिरा था लेकिन कंग्रेसराज में भ्रष्टनेताओं के वजह से मंदिर के लोग भी प्रभावित हुए थे इसलिए वर्षों पुराना रिवाज को तिलांजलि दे दी गयी......

अबतक कुल 9 बार श्रीजगन्नाथजी , श्रीरघुनाथ भेष धारण करचुके है

1.1577
2.1739
3.1809(मुकुन्ददेव के राज्यकाल 14वाँ वर्ष)
4.1833(रामचंद्रदेव के शासनकाल 19वाँ वर्ष)
5.1842(वीर किशोर देव शासनकाल में 3वर्ष)
6.1850
7.1893(द्वितीय मुकुंददेव शासनकाल)
8.1896(मुकुन्ददेव के शासनकाल)
9.1905~26 अप्रेल व्रिटिशराज में......

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

●●●●●भारत का सर्वप्रथम संगठन●●●●●

भारत का सर्वप्रथम संगठन
दक्षिण ओडिशा में बनाया गया था
1870 में....
संगठन का नाम था
"ओडिआ हितवादिनी सभा"

काटिगिंआ क्षेत्र के जमीदार
भेंकटेश्वर राउ इसके संस्थापक थे.....

ना केवल राजनैतिक वरन किसी भाषा संस्कृति को
संरक्षण समर्थन करने को बनाया जाने वाला
यह सर्व प्रथम भारतीय संगठन है....

भेंकटेश्वर राउ
कंधमाल के घने जंगलों में वह जैसे सूर्य कि भाँति उदय हुए ।
1866 में उन्हें जमीदारी मिलने के बाद से ही
वह अपने मन के विचारों को कार्य में रुपान्तरण करने के लिए कई गाँव सहरों मे घुम घुम कर लोगों को ओडिआ भाषा आन्दोलन कि यथार्थता समझाने में लग गये थे ।
हदगड,मुठा,चकापाद,अठर,करडा,रणदा,गदापुर,पालुर,हुमा,गंजा,महुरी,सुरंगी,जरडा़,खल्लिकोट,आठगड़,घुमुसर,धराकोट,सोरडा़,खेमुंडि,चिकिटि,जळन्तर,पारळा,
मंजुसा आदि क्षेत्रों के स्थानीय राजा तथा जनसाधारणों में जनजागरण ले आने में भेंकटेश्वर राउ सफल हुए ।

1870 में ही ओडिआ हितवादिनी सभा का सर्वप्रथम सभा रसुलकुंडा(भंजनगर) में आयोजित हुआ था....
और यही वह सभा थी जहाँ से पहली बार
बंगाल,मांद्राज,मध्यप्रदेश मे बंटे हुए ओडिआ भाषी क्षेत्रों को एकजुट करने के लिए संखनाद हुआ था.....

इस सभा में दक्षिण ओडिशा क्षेत्रों में तेलुगुभाषी लोगों का प्रार्दुभाव तथा ओडिआभाषी क्षेत्रों मे  तेलुगु प्रचलन कि उनकी कोशिशों का मुंहतोड जवाब
दियागया था ।
मंद्राज सरकार के लाट को इस सभा से  मिले स्मारक पत्र के बदौलत ही
मांद्राज राज्य मे सामिल ओडिआभाषी क्षेत्रों मे सभी सरकारी कार्यालय तथा स्कुलों में 4 मार्च 1872 को
ओडिआ भाषा को सरकारी भाषा का मान्यता मिला.....

इस घटना से प्रेरित हो कर हीं बाद में कटक सम्बलपुर तथा बालेश्वर में भाषा को लेकर बुद्धिजीवीओं में जागृति देखने को मिली थी.....

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

*******उत्कल दिवस*******


जब देने लगे लोग बंदे मातरम् बंदे मातरम् के नारे....
हैरत क्यों जगवालों को हमने ऐसे क्या कर डाले.....
और हमने बदला जब  उसी गीत का शब्द सुर ताल
लिखदिए बंदे उत्कल जननी सा  पद्य उस
साल...
वह बंगभंग का आन्दोलन कहलाया राष्ट्रीय
क्रान्ति
हम 4 हिस्सों में बंटे हुए लोग चाह रहे थे एकजुटता
भारतीय नेता मगर तब कहते रहे हमें ही क्षेत्रवादी....
ना होते कूलबृद्ध मधुसूदन ओर अनेकों माटिप्रेमी पुत्रपुत्री
कहाँ हो पाता तब एकत्रीकरण पडोशीओं कि मंशा थी
कि हम बंटे रहे सदा खटते रहे उनके गुलामों
कि भांति
मगर ठान लिए थे मधुसुदन कि बनकर रहेगा
अलग राज्य
नहीं झुकेगी किसी कलिंगी का माथा बदलेगें मिलकर भाग्य.....

1928 वह दौर था देश में आजादी कि
क्रान्ति कि
गांधी नेहुरु बोस लाल-बाल-पाल  कि
आंधी कि

आया था साइमन कमीशन लिए नये
सौगात
कहा सबने जाओ जाओ साइमन हमें पसंद नहीं तुमरी बात
चालाक मधु देख रहे थे जाना आया मौका अपने हात
उत्कलप्रेमी बंदो से करवाया पटना में ही साइमन का स्वागत
सुने साइमन उत्कल का दुःख लिखे रिपोर्ट बनी बात
1936 बना उत्कल प्रदेश मिला बंटे हुएँ को  एकजुटता
न होता यदि हमारी तब एकत्रीकरण
स्वतंत्रता के बाद
न हो पाते एकजुट
पडोशीओं के नेताओं के कारण

हमने खोया है  तब भी
मेदिनीपुर बस्तर वीरभूम खरसंवा षडैकला
जैसे भूभाग
पुनः मिश्रण अब लक्ष्य बने
जागो उत्कल !!!!!
गाओ अखंड उत्कल का राग.....

आज उत्कल दिवस है......
1756 में मराठीओं ने जब चौद्वार(कटक) में हविबुल्ला के साथ ओडिशा का बंटवारा किया था...
तब से लेकरके 1936 तक उत्कल /कलिंग/कोसल राज्य चार हिस्सों में बंटा हुआ था...

अंग्रेजों को सर्वाधिक परेशान करनेवाले ओडिआ लोगों को उन गोरों ने वर्षों तक अपने शोषण का शिकार बनाया.......
उन्निसवीं सदी में आज का ओडिशा चार हिस्सों में बंटा हुआ था....
बंगाल,मद्रास,मद्यप्रदेश तथा विहार मे चार हिस्सों मे बंटे हुए ओडिआ लोगों को अपना भाषा संस्कृति त्याग कर बंगाली,मद्रासी,हिन्दीभाषी व बिहारी बनने को दवाब डाला गया.....

मधुसुदन दास बंगाल में 16 साल रह कर ओडिशा लौटे और उन्होनें इसके खिलाफ लोगों को एकजुट करना शूरुकरदिया....
1903 से 1934 तक वह आजीवन
उत्कल के लिए लडते रहे.....

1928 मे साइमन कमिशन भारत आया....
भारत के सभी नेताओं ने
उनका विरोध किया
लेकिन मधुसुदन जानते थे कि यही सही मौका है....
उन्होनें उत्कल सम्मिलनी के सदस्यों को पटना मे साइमन कमीशन का स्वागत करने को निर्देश दिए.....
वहीं हुआ....
साइमन कमीशन को सारे भारत में उनकी हो रही अपमान के बीचो बीच यह स्वागत सत्कार अच्छा लगा.....
साइमन कमीशन ने व्रिटेन के पार्ल्यामैंट को नूतन उत्कल/ओडिशा राज्य गठन कि सिफारिश भेज दी.....
और उन्हीं सिफारिशों के बदोलत 1936 में ओडिशा भाषा संस्कृति आधार पर भारत का पहला राज्य बनकर उभरा.......

लेकिन हमें मात्र आधा ओडिशा देकर के #AprilFool बनाया गया था.....
आज भी बंगाल में मेदिनीपुर,छतिशगड का आधा हिस्सा बस्तर से वीरभुम तक और झाडखंड का खरसंवा षडैकला क्षेत्र वहाँ रहनेवाले ओडिआ लोग औडिशा से अलगथलग शोषण शिकार होते आ रहे है....

अब इस पर भी यदि कोई ओडिआ व्यक्ति
अखंड ओडिशा कि बात करने लगे
उत्तरभारतीयों को वह नागवार गुजरता है...

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

एका तो भकत जीवन-सालवेग भजन

भक्तकवि सालवेग द्वारा लिखा एक ओर भजन आज हिन्दी लिपान्तरण एवं अनुवाद के साथ पोस्ट कररहा हुँ....
उम्मिद है आपको पसंद आएगा

ଏକା ତୋ ଭକତ ଜୀବନ
एका तो भकत जीबन
एका(निःसंग) तेरा भक्त जीवन

,ଭକତ ନିମନ୍ତେ ତୋର ଶଙ୍ଖ ଚକ୍ର ଚିହ୍ନ।।
भकत निमन्ते तोर शंख चक्र चिह्न !!
भक्तों के लिए तेरा शंख चक्र चिह्न
।।

ଭକତ ତୋ ପିତାମାତା ଭକତ ତୋ ବନ୍ଧୁ,
भकत तो पितामाता भकत तो बन्धु
भक्त तेरे पितामाता भक्त हीं बन्धु ।

ଭକତ ହିତରେ ତୋର ନାମ କୃପାସିନ୍ଧୁ ।।
भकत हितरे तोर नाम कृपासिंधु
भक्त हितार्थे तेरा नाम कृपासिंधु

ଧେନୁ ପଛେ ପଛେ ବତ୍ସା
ଗମେ କ୍ଷୀର ଲୋଭେ,
धेनु पछे पछे बत्सा गमे क्षीर लोभे
धेनु पिछे पिछे बत्सा
जाए दुग्ध लोभे

ଭକତ ପଛରେ ତୁହି ଥାଉ ସେହି ଭାବେ।।
भकत पछरे तुहि थाउ सेहि भाबे
भक्तों के पिछे तुम वैसे हीं होते

ବାପା ମୋ ମୋଗଲପୁଅ
ମାତେ ମୋ ବ୍ରାହ୍ମଣୀ,.....
बापा मो मोगलपुत्र
माते मो ब्राह्मणी......
पिता मेरे मोगलपुत्र
माते हैं ब्राह्मणी......

ଏ (ଦି) କୁଳେ ଜନ୍ମିଲି ହିନ୍ଦୁ ନଖାଏ ମୋ ପାଣି ।।....
दि कुळे जन्मिलि हिन्दु नखाए मो पाणि ।।....
दोनों कुल मे जन्माँ हिन्दु न छुँए मेरा पानी ।।....

କହେ ସାଲବେଗ ହୀନ ଜାତିରେ ଯବନ,
कहे सालवेग हीन जातिरे जबन
कहे सालवेग हीन जाति में वन ।

ଶ୍ରୀରଙ୍ଗାଚରଣ ବିନୁ ନ ଜାଣଇ ଆନ।।
श्रीरंगा चरण बिनु न जाणइ आन ।।
श्रीरंगाचरण बीनु न जानता मैं आन(और कुछ भी) !!