ऋग्वेद के अनेक सूक्तों में अग्नि देव की महिमा और उनके प्रादुर्भाव का विस्तृत वर्णन मिलता है। ऋग्वेद की प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, आरंभ में केवल देवता ही अग्नि के रहस्यों से परिचित थे। उस काल में अग्नि मुख्य रूप से बिजली के रूप में स्वर्ग से पृथ्वी की ओर आती थी और तुरंत स्वयं को प्रकृति के गूढ़ तत्त्वों में छिपा लेती थी।
ऋग्वेद के अनुसार, 'मातरिश्वा' नामक देवदूत या शक्ति ने सर्वप्रथम स्वर्ग से अग्नि का आहरण कर उसे महर्षि भृगु को प्रदान किया था। ऋग्वेद के कुछ मंत्रों का अध्ययन करके विदेशी तथा आधुनिक विद्वानों ने यह अनुमान लगाया कि मानव सभ्यता ने सबसे पहले प्राकृतिक आपदाओं के माध्यम से अग्नि का ज्ञान प्राप्त किया होगा। वास्तव में वैदिक परंपरा में 'मातरिश्वा' स्वयं अग्नि का ही एक विशिष्ट नाम है। अंतरिक्ष या आकाश मंडल में उत्पन्न होने वाली विद्युतीय अग्नि को ही 'मातरिश्वा' कहा गया है। संस्कृत साहित्य में मातरिश्वा का दूसरा मुख्य अर्थ 'वायु' भी होता है, क्योंकि वायु के बिना अग्नि का प्रज्वलन और प्रसार संभव नहीं है।
वैज्ञानिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह माना जाता है कि प्राचीन भारत में मानव ने अग्नि की खोज अंतरिक्ष से पृथ्वी पर गिरे किसी उल्कापिंड, क्षुद्रग्रह (Asteroid) के घर्षण से उत्पन्न आग, अथवा आकाश से गिरी बिजली के कारण जंगलों में अचानक लगी आग से की होगी।
कलिङ्ग देश (वर्तमान ओडिशा) की प्राचीन 'सउरा' (सौरा) जनजाति में अग्नि के आविष्कार और जगंता कितुंग से जुड़ी एक अत्यंत रोचक लोकगाथा प्रचलित है।
सउरा जनजाति के लोग स्वयं को अपने मुख्य देवता 'कितुंग' की संतान मानते हैं।
सउरा जनजाति कि पौराणिक कथा के अनुसार, जब भीषण महाप्रलय के कारण संपूर्ण संसार जलमग्न हो गया, तब महाप्रभु ने प्रलय का अंत कर एक नई सृष्टि के निर्माण का संकल्प लिया। महाप्रभु ने जल के भीतर से केंचुए के शरीर की मिट्टी लाकर पृथ्वी का निर्माण किया। तत्पश्चात, प्रलय के विशाल जल में तैरती हुई एक बंद पेटी (बक्से) में से एक भाई और बहन को बाहर निकाला। महाप्रभु ने उन्हें पति-पत्नी के रूप में स्वीकार कर मानव सृष्टि को आगे बढ़ाने का आदेश दिया। किंतु भाई-बहन ने मर्यादा और लोक-लाज के कारण महाप्रभु के इस आदेश को मानने से इनकार कर दिया। इससे क्रोधित होकर महाप्रभु ने उन दोनों को चेचक (बड़ी माता) के भीषण रोग से ग्रस्त कर दिया, जिससे उनका शरीर विकृत और विकलांग हो गया। कुछ समय बीत जाने के बाद, जब उनके चेहरे और शरीर का रूप बदल गया, तो वे एक-दूसरे को पहचान न सके और पति-पत्नी के रूप में जीवन व्यतीत करने लगे।
कालक्रम में उनके गर्भ से अनेक संतानों का जन्म हुआ। उन भाइयों में सबसे छोटा भाई 'जगंता' था। जगंता के अन्य छह बड़े भाइयों का विवाह हो चुका था और उनकी छह पत्नियाँ (भाभियाँ) थीं।
जगंता का विवाह नहीं हुआ था। वह अपने सभी भाइयों में अत्यधिक सुंदर, शक्तिशाली, सदाचारी और पराक्रमी था। जगंता के अद्भुत रूप, सौंदर्य और सद्गुणों पर मोहित होकर उसकी भाभियों ने उससे प्रेम-संबंध बनाने और उसे अपने जाल में फँसाने का असफल प्रयास किया। किंतु धर्मपरायण जगंता ने अपनी भाभियों के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
भाभियों को भय सताने लगा कि कहीं जगंता उनके इस कुकृत्य की सूचना अपने भाइयों को न दे दे। अतः उन्होंने एक षड्यंत्र रचा। उन्होंने अपने बाल बिखेर लिए, अपने चेहरे, नाक और गालों को स्वयं अपने ही नाखूनों से खरोंचकर लहूलुहान कर लिया। इसके बाद वे रोती-बिलखती हुई उस पहाड़ी (डंगर/खेत) में पहुँचीं जहाँ उनके पति कृषि कार्य कर रहे थे। उन्होंने जगंता के नाम पर तरह-तरह की झूठी और मनगढ़ंत बातें कहकर भाइयों को भड़का दिया।
अपनी पत्नियों की झूठी बातों को सच मानकर छहों भाई क्रोध से अंधाधुंध हो गए। वे तुरंत घर लौटे, जगंता के हाथ-पैर कसकर बाँध दिए और उसे ले जाकर एक घने पहाड़ के नीचे बरगद के विशाल पेड़ के नीचे फेंक दिया।
कई दिन बीत जाने के बाद भी जगंता को कोई नुकसान नहीं पहुँचा; वह भूख-प्यास से परे ईश्वर की कृपा से जीवित और सुरक्षित रहा। जब भाइयों ने उसे सकुशल देखा, तो वे उसके अलौकिक सामर्थ्य से चकित रह गए। उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ और वे जगंता को साधारण मानव न मानकर 'किंदुंग महाप्रभु' के रूप में पूजने लगे।
इसके बाद जगंता ने 'रावणगिरि' पर्वत पर जाकर अपने प्रचंड बल से एक विशाल पत्थर को तोड़ दिया। पत्थर के इस भीषण घर्षण से महा-अग्नि की लपटें बाहर निकलीं और साथ ही पवन (वायु) का भी जन्म हुआ ।
पत्थर तोड़ते समय उसका एक भारी टुकड़ा जगंता के चेहरे पर बड़े जोर से आ लगा, जिससे उनका चेहरा चिपटा (सपाट) हो गया। धीरे-धीरे वह अग्नि प्रचंड रूप धारण कर संपूर्ण रावणगिरि पर्वत के घने जंगलों में फैल गई। उस दावानल की भीषण लपटों में जगंता किंदुंग के दोनों हाथ और पैर जलकर भस्म हो गए। आग के प्रचंड उत्ताप से तपकर उनका संपूर्ण शरीर काला पड़ गया। इस भीषण दुर्घटना के बाद वे रावणगिरि पहाड़ पर 'मादल' (जनजातीय ढोल) की भाँति बिना हाथ-पैर के पड़े रहे।
जगंता द्वारा उत्पन्न इस अग्नि में जंगल के सैकड़ों जीव-जंतु जलकर मर गए। जब आसपास के मनुष्यों ने उन भुने हुए पशु-पक्षियों का मांस खाया, तो उन्हें उसका स्वाद अत्यधिक प्रिय लगा। इसके बाद मनुष्यों ने अग्नि को सहेजकर (सुरक्षित) रखना सीखा और भोजन को आग में पकाकर खाने की कला विकसित की। इस प्रकार जगंता किंदुंग ही मानव सभ्यता के लिए अग्नि और पके हुए भोजन के मूल दाता बने।
अग्नि और भोजन देने वाले प्रभु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए सउरा जनजाति के लोगों ने नीम की लकड़ी के गोल लट्ठे (काठ) से जगंता किंदुंग की बिना हाथ-पैर वाली 'दारू मूर्ति' (काष्ठ प्रतिमा) का निर्माण किया और उन्हें अपने ईष्टदेव के रूप में पूजना आरंभ किया।
जनजातीय संस्कृति और ओड़िया लोक-परंपराओं के अनुसार, रावणगिरि पर्वत पर पूजित यही 'जगंता कितुंग' कालक्रम में केवल सउरा जनजाति तक सीमित न रहकर कलिङ्ग के ओड़, कुई, कंध, संथाली और गोंड आदि सभी जनजातीय व गैर-जनजातीय समाज के मुख्य आराध्य बने। यही जनजातीय देवता आगे चलकर सम्पूर्ण अखंड कलिंग देश के 'राष्ट्रदेवता श्री जगन्नाथ' के रूप में नीलाचल (पुरी) में प्रतिष्ठित हुए।
श्री जगन्नाथ जी का एक अन्य प्रमुख जनजातीय स्वरूप 'जंगादेव' माना जाता है। जंगादेव विशेष रूप से कंध, गोंड और द्रविड़ जनजातियों के सर्वोच्च आराध्य देव हैं । ओडिशा के नवरंगपुर जिले, कोरापुट और सीमावर्ती छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में रहने वाली द्रविड़ जनजातियों के बीच जंगादेव को ब्रह्मांड का सृष्टिकर्ता, महान रक्षक और कृषि-कार्य का मुख्य आविष्कारक माना जाता है।
चैत्र पर्व: इन क्षेत्रों में चैत्र के महीने में जंगादेव की विशेष कृषि-आधारित पूजा का आयोजन किया जाता है। किसान नई फसल और खेती की शुरुआत से पहले जंगादेव का आशीर्वाद लेते हैं।
एक पुरानी मान्यता के अनुसार, प्राचीन काल में कंध, गोंड और सउरा जनजाति के लोग जगंता कितुंग की पूजा अपने-अपने पर्वतीय अंचलों में करते थे। जब जगन्ता कितुंग् , श्री जगन्नाथ जी के रूप में पुरी के नीलाचल धाम (श्रीक्षेत्र) में प्रतिष्ठित हो गए, तो गोंड जनजाति के भक्त अपने देव से दूर होने के कारण दुःखी होकर भगवान के द्वार पर साष्टांग सो गये जिसे ओड़िशा में अधिया कहा जाता है ।
तब सर्वशक्तिमान भगवान जगन्नाथ ने अपने भक्तों को स्वप्नादेश दिया: "मैं अपने पूर्ण स्वरूप का आधा भाग (कटि/जांघ तक का आधा रूप) पुरी के नीलाचल धाम में पूजित हो रहा हूँ। शेष आधा रूप तुम अपने अंचल में ले जाकर पूजो।"
उसी दिन से श्री जगन्नाथ जी के जांघ (जंघा) तक के अर्ध-निर्मित काष्ठ-स्वरूप को 'जंगादेव' के नाम से गोंड और कंध जनजातियों द्वारा आज भी पूरी निष्ठा के साथ पूजा जाता है। यह लोकगाथा इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि भारत में वैदिक संस्कृति और जनजातीय (आदिवासी) संस्कृति के बीच अत्यंत गूढ़, समरस और अविभाज्य संबंध रहा है, जहाँ अग्नि के वैदिक 'मातरिश्वा' और जनजातीय 'जगंता कितुंग' एक ही परम चेतना के विभिन्न रूप हैं।