विशिष्ट पोस्ट

एक और षडयन्त्र

अनंत_वासुदेव_मंदिर भूवनेश्वर कि सर्वप्रथम पुरातन विष्णु मंदिर है ।पुरातन काल मे भूवनेश्वर को शैव क्षेत्र के रुप मे जानाजाता था यहाँ कई प...

भजन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
भजन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 11 जनवरी 2017

....नमस्ते प्रभु जगन्नाथ.....

नमस्ते प्रभु जगन्नाथ ।
अनाथ लोगों के नाथ ।।
नमस्ते प्रभु वासुदेव ।
भक्त जनों के बंधु तव ।।
नमस्ते प्रभु हृषिकेश ।
भक्तजनों के विश्वास ।।
नमस्ते प्रभु विश्वरुपी ।
सकल हृदे हो तुम ही ।।
तुम ही सृष्ठि स्थिति लय करते ।
पुनः भव सब संहारते ।।
अशेष कोटि वसुन्धरा ।
तुम्हारे गर्भ मे हे भरा ।।
चौदह ब्रह्माण्ड है बना ।
ये सर्व तुम्हारी रचना ।।
तुम रह्मा रुद्र विष्णु तुम ही ।
तुम बिनु अन्य गति नाही ।।
सृष्टि तुम्हारी क्रीडागृह ।
सर्वपिता होकर भी निर्मोह ।।
तुम्हारा श्वास है मरुत ।
देव हुए है तहुँ जात ।।
तुम ही हो अग्नी देव इन्द्र ।
नयनुँ तव सूर्य चन्द्र जात ।।
भूजा से अनन्त मारुति ।
कण्ठ से जन्मी सरस्वती ।।
सदा चंचल निद्रा नाही ।
यह रुपे शून्ये होते हो तुम्ही ।।
अशेष तुम्हारी महिमा ।
कोई न जानता गुणसीमा ।।
तेरे नाम करता रहे जो लय ।
करोड़ों जन्मों का पाप हो क्षय ।।
तुम्हारा नाम ले जो मिल जाय सिद्धि ।
दूर हो जाते रोग शोक आदि ।।
आरत भंजन तुम्हारा वह बाना ।
आतंग(विपत्ति) काले वज्र सेह्ना (सन्नाह,कवच) ।।
होए हो दश अवतार ।
उतारे धरती के भार ।।
दुष्ट निवारि संत पालते हो।
तुम नाथ परम दयालु ।।
तुम हो दरिद्रों के धन ।
तुमरे चरणों मे रहे मेरा मन ।।
सती युवतियों के मनमें ।
उनके पति होते हे जैसे ।।
उसी भांति मेरा यह मन ।
तुम्हारे चरणों मे रहे सदा भगवन ।।
कहे दास जगन्नाथ ।
कमल चरणों मे आश..।।

द्रष्टव्य :- प्रस्तुत भक्ति रचना "ନମସ୍ତେ ପ୍ରଭୂ ଜଗନ୍ନାଥ" मूलतः ओडिआ भाषा मे अतिवडी जगन्नाथ दासजी ने लिखा था ।
मैने मात्र दैव प्रेरणा से इसका हिन्दी अनुवाद किया है....

सोमवार, 4 जुलाई 2016

बहू के चलना न आए जी...

बचपन मे नीचे लिखे भजन सुनके गुस्सा जाता था....
हूर्र ... ये भी कोई भजन है !!!
भगवन का स्तूति नहीँ
न गुणगान
अपने बोहू यानी पुत्रवधू के विषय मे अनाव सनाव कहागया है !!
लेकिन उम्र बढ़ने के साथ मैँ इसका असली अर्थ समझ पाया था !
‪#‎ विप्रश्री‬ ‪#‎ श्रीरघुनाथ_दास‬रचित
इस भजन मे ‪#‎ योग‬विषयक
हितवाक्य सरल भाषा मे कहा गया है ।
आर्त्तदास बनमाली दास आदि कविओँ के भजन मे योग मुख्य विषय रहा है
ऐसे ही एक भजन
Olata brukhye kheluchi lotani para
काफी प्रसिद्ध हुआ है ।
पैश है रघुनाथ दास जी के लिखे
वह भजन....
"बोहू चालि न जानई लो
पाद पड़ु अछि बंका
=>बहू (जीवात्मा) के चलना न आए जी
पद पड़त है बाँका
*मन से पराधीन जीव पाप कर्मोँ मे लिप्त है
"जेउँदिन बोहू चालि जानिजिब
घरे पड़िजिब डका"
=>जिसदिन बहू चलना जानजाए
घर मे हो जाए डका(सम्मान)
*व्यक्ति सदमार्ग मे चलना जान जाए तो सर्वत्र उसकी पूजा होगी
"जेउँ दिनुँ बोहू बापघरठारु
अईला ससुर घर कु"
=> जिस दिन बहू माईके से
लौटी ससुराल मे
*अर्थात परम् ब्रह्म से अलग
हो जीव जब संसार मे प्रकट हुआ
"आपणा पति र संगे संग नाहिँ
रसरे रसाए पर कु"
=>अपने पति के संगे संग नहीँ
रसमे रसाती दुजे को
*अपने पति अर्थात् परमात्मा को भूल कर जीव विषय भोग मे
लिप्त है
"पाँच भल लोक बुझाई कहिले
न बुझिला बोहू तिळे"
=>पाँच भले लोग समझाए
लेकिन मनाती नही बहू बिलकुल
*पाँच इंद्रियोँ के जरीये सच्चाई को जान कै भी जीव समझ नहीँ रहा
"अर्न पाणि बोहू किछि न खाईण
रहिछि शून्य़ आहारे"
=>अर्ण जल बिना बहू रह रही शून्य आहारे
*जीव के लिए जप तप हि असली आहार है
"पचिस नणन्द जंजाळ करन्ति
बोहू मोर बारुँआळी
=>पच्चीस ननन्द परेशान करती बहू मेरी झगड़ालु
*पच्चीस ननन्द यानी कि मानव सुलभ पच्चीस प्रकृति
से परेशान जीव दुनिया भर मे झगड़ा करता फिरता है ।
बोहू दूर्द्दण्डि सहि न पारइ
बुलइ पड़िशा ओळी
=> बहू दूर्द्दण्डी(उद्दण्डी) सह नहीँ पाती
घुमती पडोशीओँ कि मोहल्ले गली
*इंद्रय सुख तथा मन तोष के लिए
जीव चहुँ ओर दौडता रहता है
"बोहू गोटिक मुँ करि आणि अछि
खाउन्दा घर र झिअ"
बहू ऐके मेँ कर लाया हुँ
खानेवाले घर कि बेटी
*जीव मात्र मे खाते है फिन् शौच करते है
इसलिए ऐसा कहागया
"बांझ करकटी
नुहँई लंपट्टी
बोहू आडे तिनि पुअ"
=>बाँझ करकटी
न है लंपट्टी
बहू को तिन पुत्र
*जीव के तीन गुण
सत्व रज तम
ये तिन पुत्र बताये गये है ।
"पुअ बोहू दुहेँ एकत्र होइले
चर्तुवर्ग फळ पाइ"
=> पुत्र वधू दोनोँ एकत्र होनेँ
से चर्तुवर्ग फल मिले
*पुत्र अर्थात् परमात्मा एवं वधू यानी कि आत्मा के मिलन से चर्तुवर्ग फल मिलते है
"रघुनाथ दास भरसा करिछि
बोहू कु भेटिबा पाइँ"
=>रघुनाथ दास भरसा ( यहाँ ईच्छा ) कर रहा
बहू से मिले
* रघुनाथ दास यानी कवि स्वयं चाहते है कि वो बहू अर्थात् स्व_आत्म दर्शन करेँ ।
स्व आत्म दर्शन परमो भक्ति तथा योग सिद्धि से ही संभव
होता है ।
जो साधक स्व आत्म दर्शन कर लेता है
उनके
परमात्मा का दर्शन भी अल्प
श्रम से संभव हो सकता है ।
योग सिर्फ जीव के नवद्वाररुपी घर के लिए ही नहीँ
परमात्मा से संपर्क का द्वार भी उन्मुक्त करता है

मुझे वही रुप दिखाओ हरि - सालबेग

ମୋତେ ସେହି ରୁପ ଦେଖାଅ ହରି
ଜୟ ଶ୍ରୀରାଧେ ବୋଲି ଡାକେବାଂଶୁରୀ -2
मुझे वही रुप दिखाओ हरि
जय श्रीराधे कहे तोरा बांशुरी 2
ତ୍ରୀପାଦରେ ଦାନ ନେଇ ବଳି କି ପାତାଳେ ଥୋଇ
ଏଣୁ କରି ଶୁକ୍ର ମନ୍ତ୍ର ନୟନରେ କୁଶ ମାରି
त्रीपाद दान लैके बलि को पाताल मे किए उसे राजा
शुक्र मन्त्री बाधक बने
आँख फुटा मिली सजा
ମୋତେ ସେହି ରୁପ ଦେଖାଅ ହରି
ଜୟ ଶ୍ରୀରାଧେ ବୋଲି ଡାକେବାଂଶୁରୀ -2
मुझे वही रुप दिखाओ हरि
जय श्रीराधे कहे तोरा वांशुरी 2
କହେ ସାଲବେଗ ହୀନ
ଜାତୀରେ ଅଟେ ଯବନ
मैँ सालवेग हीन
जाती है यवन
କଂସ ଅଷ୍ଠମଲ୍ଲ ମାରି
କାହାକୁ ନ ଅଛ ତାରି
कंस अष्ठमल्ल मारे
सबको जग उधारे
ମୋତେ ସେହି ରୁପ ଦେଖାଅ ହରି
ଜୟ ଶ୍ରୀରାଧେ ବୋଲି ଡାକେବାଂଶୁରୀ -2
मुझे वही रुप दिखाओ हरि
जय श्रीराधे कहे तोरा बांशुरी ....
------भक्त कवि सालबेग----
***
मोगलकाल मे खासकर
साहजाहान के समय
श्रीक्षेत्र पुरी जगन्नाथ धाम पर
200 वर्षो तक मुस्लिम आक्रमण हुए
लेकिन 17वीँ सदी मे इस मुस्लिम भक्त ने
स्थानीय मुस्लिम शासकोँ को
अपने वस मे कर लिया था !
कहते है भक्ति मे अनन्त शक्ति होता है
सालबेग का श्रीकृष्ण भक्ति से पुरी जिल्ला शासनी ब्राह्मण
भी प्रभावित हुए थे
इतिहास साक्षी है
इस भक्त के आविर्भाव के बाद फिर कभी भी श्रीमंदिर पर हमले नहीँ हुआ