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एक और षडयन्त्र

अनंत_वासुदेव_मंदिर भूवनेश्वर कि सर्वप्रथम पुरातन विष्णु मंदिर है ।पुरातन काल मे भूवनेश्वर को शैव क्षेत्र के रुप मे जानाजाता था यहाँ कई प...

बुधवार, 17 मई 2017

●●●●ओडिआभाषा में अमरुद के प्रतिशब्द●●●●

#हिंदी भाषा में #Guava (Psidium guajava)
के लिए ज्यादा से ज्यादा कितने #प्रतिशब्द है...?
#जामफल ओर #अमरुद......
लेकिन जनकर हैरान होगें
इस मूल अमरीकी फलके लिए
#Odia भाषा में एक दो नहीं आठ दश प्रतिशब्द प्रचलन में है ।

मानक #ओडिआ में #अमरुद को #पिजुळि कहाजाता है
#जाम्व -अविभक्त कोरापुट
#मया/माया-संबलपुर तथा बलांगीरपाटणा
#चाउळिआ-पुरी,खोर्द्धा
#लेभुआ-दशपल्ला(नयागड)
#महुआ-वौद,नरसिंहपुर
#पेडा-बालेश्वर,मयुरभंज
#तमस-देओगड
#बिदुडि-आनंदपुर (केंदुझर जिल्ला)
#जाम,#जामी- गंजाम कळाहांडि जिल्ला
#बिजुळि-ढेंकानाल

  ●हमारे #विच्छिन्नाचंल ओडिआ में●

#बेलति- #हलवी,#भतरी उपभाषा #वस्तर जिल्ला में
#सेतिम्बा- #सडषी उपभाषा #सडैकला #खरसंवा जिल्ला

एइ भारत आम जननी जनमभूइँ

एइ भारत आम जननी जनमभूइँ
एइ भारत यार जगते तुळना नाहीं...

सेनेह सोहाग यार अनुराग
मैत्री र बंधन नेई

एइ भारत आम जननी जनमभूइँ
एइ भारत यार जगते तुळना नाहीं...

मथारे याहार मुकुट पराए
तुंग हिमगिरी सोहे
चरण युगळ परशी याहार
सपत सिंधू बहे

यार बुकुरे कोटि निर्झरिणी याए बहि....
यार कटिरे विंध्यगिरीवर अछि रहि
प्रतिधूळिकणा प्रतिजळविंदु
या नामकु याए गाइ

एइ भारत आम जननी जनमभूइँ
एइ भारत यार जगते तुळना नाहीं...

सबुजिमा यार चिर आभरण
सुंदर याहार शिरी
गौरव यार अक्षय किरती
सौरभे उठे पूरी ......

यार पराण आम सबुरी ममता नेई
यार चरण आम सबुरी मंगळ पाइँ
सेइ भारत र संतान आमेरे
जगत कल्याण पाइँ

एइ भारत आम जननी जनमभूइँ
एइ भारत यार जगते तुळना नाहीं...

सेनेह सोहाग यार अनुराग
मैत्री र बंधन नेई

एइ भारत आम जननी जनमभूइँ
एइ भारत यार जगते तुळना नाहीं...

ओडिआ भाषा में भारि और भारी

#ओडिआभाषी #फेसबुकिये पिछले 2 साल से दिन प्रतिदिन बढ रहे है ।
अब रोज हजारों पोस्ट ओडिआमें भी आने लगे है ।
अब होता क्या है किसी ने कोई शब्द लिखदिया तो लोग चले आते है उसे #शब्दज्ञान देने....
ओर एक शब्द के लिए फिर घंटो #चर्चा चलता रहता है...
कहीं कहीं लोगों में आपसी सहमति हो जाते
तो कहीं #शाब्दिक #महाभारत छिड जाते ।

पिछले दिनों एक ओडिआभाषी बन्दे ने एक व्यक्ति पर तिखे #कटाक्ष करदिए...
उसे बुरालगा शायद
लेकिन
उसने कमेंट मे से एक शब्द को #इश्यू बनाया ओर कटाक्ष करनेवाले पर टुट पडा....

वह शब्द था भारि/भारी....
हिन्दी में आमतौर पर वजनदार के लिए #भारी शब्द का प्रयोग होता है ।
लेकिन ओडिआ में #भारी को एक तो #भारि लिखा जाता है वहीं इसे पांच अलग अर्थों में इस्तेमाल भी किया जाता है....

भृ-धातु+कर्त्ता. इ =>भारि
भृ धातु के कई अर्थ होता है
जैसे
#धारणकरना,#वहन करना,#पालन करना आदि
#भयभीत करना के अर्थ में भी इसका इस्तेमाल होता था

भारि का ओडिआ अर्थ इसप्रकार है
1.सिंह【ओडिआ में मूल भारि शब्द (देशज विशेष्य)प्रचलन में जिसका अर्थ #सिंह होता है ,शायद यह  आदिवासीओं का शब्द था]

#अत्यधिक, बहुत ही ज्यादा,#दुर्वह यानी #वजनदार,#अत्यावश्यक,#जनपूर्ण,#व्यथायुक्त,
#पीडादायक,#असह्य आदि....

लेकिन ओडिआ में भारी शब्द का अर्थ वजनदार नहीं है....
अगर आपने ऐसा लिखा वह शब्द गलत हो जएगा
आपको #ओडिआ में #भारी शब्द को #भारि लिखना होगा च्यूंकि
#ओडिआभाषा में #भारी का अर्थ #भारिक
यानी भारवहन करनेवाला होता है....

भारतीय भाषा विद्वान इसलिए
ओडिआभाषा कि मौलिकता को मानने में मजबूर हो गये ओर 2014 में odia को भारत का छठा classical language का दर्जा मिला
संस्कृत के बाद यह दुसरा आर्यभाषा है जिसे यह उपलव्धि हासिल हो पाया है.....

शुक्रवार, 5 मई 2017

●●●श्रेष्ठा तु जननी उत्कळ●●●●

या महिमा अप्रमिता
अपरुपे सुशोभिता
दिव्य अनिन्द्य कान्तिज्वळ
हृदय अर्पित छन्दे
कोटि सुत सुता बन्दे
चरणारबिन्दे सकळ
श्रेष्ठा तु जननी उत्कळ ।।

प्रकटिता चर्तुभूजा
धारण श्रीनेत्र ध्वजा
बक्षे शोभित बनमाळ
बारणारोहिणी रुप
हस्ते शंख शरचाप
करमंतित निळोत्पळ
श्रेष्ठा तु जननी उत्कळ .......।।

कुसुम मंजुळ कुंज
खंजि महीधर पुंज
घेनी निघंच बनाचंळ
निर्झरिणी कळकळ
सुनीळ तटिनी जळ
तटप्रांते उर्मी उत्थाळ
श्रेष्ठा तु जननी उत्कळ .......।।

●●●कवि तपन दास ●●●●

यह है शुद्ध संस्कृतप्राण ओडिआ...भाषा...
आज भारतके सभी आर्य भाषाएँ कलुषित हो चुकि हैं
अरवी पार्सी शब्द बोलकर लोगों ने प्राचीन संस्कृत शब्दों को बुड्ढों का शब्द मानलिया और धडल्ले से त्याग भी दिया लेकिन
"संस्कृती के देश #कलिंगोत्कल नें न तो संस्कृत शब्दों को त्यागे न ही संस्कृत के मूल व्याकरणगत नियमों का त्याग किया....
वह तो आज भी स्वयं में संस्कृत को जीवित रख पाने में सफल है और कसम है
श्रीजगन्नाथजी का ध्वज उडता रहेगा ...
जबतक ओडिआओं में स्वाभिमान जिंदा रहेगा
हमारी भाषा और संस्कृती भी जीवित रहेगी

जय हिंद
बंदे उत्कल जननी

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

श्री अरविंद ने ओडिशा एकत्रीकरणको कहा था क्षेत्रवाद

1905 में बंगभंग के बाद
बंगाल में  जन असंतोष अचानक आन्दोलन बना और च्युंकि तब कलकत्ता भारत कि राजधानी थी
एक क्षेत्र विशेष में हो रही क्रान्ति समुचे देश में फैलगया ।
उनदिनों श्री अरविंद जैसे महात्मा बंगभंग के खिलाफ सशक्त आवाज उठाने को उठखडे हुए थे....

2 साल बाद.....

1907 दिसेंबर 13 तारीख को
श्रीअरविंद ने अपने पत्रिका #बंदेमातरम्
में एक संपादकीय लिखा था....

इसमें उन्होंने #ओडिशा तथा #मधुसूदन दास जी का सम्मान पूर्वक कुछ युँ उल्लेख किया था....

"ओडिशा प्रेसिडेंसी में बर्त्तमान समय में नवजागरण नवचेतना के नवयुग में सूर्योदय हुआ है ।
उडीसा अपने अस्तित्व रक्षा हेतु मधुसूदन दास सरीखे दक्ष,शक्तिशाली नेता के अगवाई में लगगया है ।
हम नहीं जानते उनका आशय क्या है मगर हमें आशंका हो रहा है कि यह उडीआ भाषा आन्दोलन कहीं क्षेत्रवाद को बढावा न दे दें
हम भारत को एक देखना चाहते है..."(अरविंद)

जवाब में उत्कल गौरव मधुसूदन दास ने एक अंग्रेजी आर्टिकिल लिखा जिसमें पहले तो उन्होने श्रीअरविंद कि प्रशंसा कि फिर उन्होने उनके आशंकाओं को दूर करते हुए कहा था.....

"यदि 2 हिस्सों में बंटे हुए बंगाल के पुनःमिश्रण के लिए हो रहे एक क्षेत्रविशेष के आन्दोलन को जातीय सर्वभारतीय आन्दोलन का दर्जा मिला है तब
चार राज्यों में बंटे हुए प्राचीन कलिंग/उत्कल देश के पुनः एकत्रीकरण
को कैसे क्षेत्रवाद कहा जा सकता है ?
बंगभंग के खिलाफ तुम्हारा आंदोलन का जो उद्देश्य हे बिलकुल वही उद्देश्य हमारा भी है ।
इसलिए बंगभंग आंदोलन से जुडे लोग हमें  भी समर्थन करें तभी तुम और हम दोनों सफल हो पावेगें...."

खैर मधुसूदन दास के कहने पर उनकी सोच थोडी बदलनेवाली थी
तथाकथित राष्ट्रियनेता इसे कभी राष्ट्रिय मुद्दा मानते ही नहीं थे
यहाँतक कि गांधी ने भी हमारे नेताओं को ये नशीहत दे दीं थी कि वे ये सब आंदोलन रोक दें....

आज भी यही हो रहा है
जब मैं ओडिशा कि बात करता हुँ
तुम्हे लगता है ये क्षेत्रवाद है....
लेकिन नहीं ना तो तब वो क्षेत्रवाद था न आज यहाँ कोई क्षेत्रवाद फैला रहा है

अपने मिट्टीको लेकरके सबमें स्वाभिमान होना ही चाहिए
किसीके द्वारा हमारी संस्कृति भाषा मिट्टी पर मूर्खतापूर्ण टिप्पणी का उसी के भाषा में जवाब मिलेगा

जय हिंद
बंदे उत्कल जननी

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

★★★★श्रीजगन्नाथपुरी मैं राम तथा रामनवमी★★★★

रामनवमी में श्रीपुरुषोत्तमपुरी में पूजाविधि बहुत ही रोचक है......

युँ तो श्रीजगन्नाथ  श्रीविष्णु के अवतारी रुप माने जाते रहे है
परंतु रामनवमी के दिन
श्रीजगन्नाथ मंदिर कि रीतिनीति शाक्तधर्म से प्रभावित प्रतीत होती है....

"रामनवमी के दिन रात्र के समय स्वयं जगन्नाथ माता के रुपमें
भगवन श्रीराम को जन्म देते है......"

अतः उनकीक्षप्रसव वेदना कम् करने के लिए
अष्ठमी के दिन संध्या आरती के बाद
श्रीजगन्नाथ को जेउड़ भोग(ଯେଉଡ଼ ଭୋଗ)तथा गर्भोदक अर्पण कियेजाते है..... ।

नवमी में श्रीविग्रहों का मध्याह्न धूपनीति संपन्न पश्चात जन्मनीति अनुष्ठित होता है.... ।
2 महाजन सेवकों को दशरथ तथा कौशल्या मानकर जन्मविधि पाला जाता है ।

च्युंकि यह गुप्तनीतिओं मे से एक है
अतः कोई इसे देख न लें इसलिए
मंदिर के गर्भगृह में स्थित जयविजय द्वार को
बंद करदियाजाता है ।

श्रीरामजी की जन्म हो जाने के बाद
कर्पुर आरती ,महासुआर गंडुस मसाला तथा दुग्ध मणोही होता है ।
इसके बाद पंडाजी शितलभोग कराने के साथ महासुआर जयविजय द्वारके पास
चरुभात मणोही कराते है.......

जगन्नाथ ना तो पुरुष है न स्त्री
न केवल बुद्ध है न शिव न ही विष्णु.....
वह तो गणेशभेष भी धारण करते है.....
उनमें शैव शाक्त वैष्णव वौद्ध जैन गाणपत्य आदि सभी पंथ तथा जातिगत एकता के
अन्यतम चिह्न है.....
वह सनातन है !!!!

●●●श्रीजगन्नाथजी का रघुनाथभेष●●●●

जिस वर्ष वैशाख शुक्ल नवमी गुरुवार हो तथा मकर राशि श्रावणा नक्षत्रयुक्त हो तथा रामजन्मतिथी पुष्या नक्षत्रयुक्त हो
उसी दिन श्रीजगन्नाथजी की रघुनाथभेष हुआ करता था ।
मान्यता है कि इसी तिथी में अयोद्धापति श्रीराम का राज्यभिषेक संपन्न हुआ था ।

26 अप्रेल 1905 गुरुवार को अंतिमवार
श्रीजगन्नाथ श्रीरामजी के भेष धारण किये थे....

1983 में वही लग्न फिर गिरा था लेकिन कंग्रेसराज में भ्रष्टनेताओं के वजह से मंदिर के लोग भी प्रभावित हुए थे इसलिए वर्षों पुराना रिवाज को तिलांजलि दे दी गयी......

अबतक कुल 9 बार श्रीजगन्नाथजी , श्रीरघुनाथ भेष धारण करचुके है

1.1577
2.1739
3.1809(मुकुन्ददेव के राज्यकाल 14वाँ वर्ष)
4.1833(रामचंद्रदेव के शासनकाल 19वाँ वर्ष)
5.1842(वीर किशोर देव शासनकाल में 3वर्ष)
6.1850
7.1893(द्वितीय मुकुंददेव शासनकाल)
8.1896(मुकुन्ददेव के शासनकाल)
9.1905~26 अप्रेल व्रिटिशराज में......

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

●●●●●भारत का सर्वप्रथम संगठन●●●●●

भारत का सर्वप्रथम संगठन
दक्षिण ओडिशा में बनाया गया था
1870 में....
संगठन का नाम था
"ओडिआ हितवादिनी सभा"

काटिगिंआ क्षेत्र के जमीदार
भेंकटेश्वर राउ इसके संस्थापक थे.....

ना केवल राजनैतिक वरन किसी भाषा संस्कृति को
संरक्षण समर्थन करने को बनाया जाने वाला
यह सर्व प्रथम भारतीय संगठन है....

भेंकटेश्वर राउ
कंधमाल के घने जंगलों में वह जैसे सूर्य कि भाँति उदय हुए ।
1866 में उन्हें जमीदारी मिलने के बाद से ही
वह अपने मन के विचारों को कार्य में रुपान्तरण करने के लिए कई गाँव सहरों मे घुम घुम कर लोगों को ओडिआ भाषा आन्दोलन कि यथार्थता समझाने में लग गये थे ।
हदगड,मुठा,चकापाद,अठर,करडा,रणदा,गदापुर,पालुर,हुमा,गंजा,महुरी,सुरंगी,जरडा़,खल्लिकोट,आठगड़,घुमुसर,धराकोट,सोरडा़,खेमुंडि,चिकिटि,जळन्तर,पारळा,
मंजुसा आदि क्षेत्रों के स्थानीय राजा तथा जनसाधारणों में जनजागरण ले आने में भेंकटेश्वर राउ सफल हुए ।

1870 में ही ओडिआ हितवादिनी सभा का सर्वप्रथम सभा रसुलकुंडा(भंजनगर) में आयोजित हुआ था....
और यही वह सभा थी जहाँ से पहली बार
बंगाल,मांद्राज,मध्यप्रदेश मे बंटे हुए ओडिआ भाषी क्षेत्रों को एकजुट करने के लिए संखनाद हुआ था.....

इस सभा में दक्षिण ओडिशा क्षेत्रों में तेलुगुभाषी लोगों का प्रार्दुभाव तथा ओडिआभाषी क्षेत्रों मे  तेलुगु प्रचलन कि उनकी कोशिशों का मुंहतोड जवाब
दियागया था ।
मंद्राज सरकार के लाट को इस सभा से  मिले स्मारक पत्र के बदौलत ही
मांद्राज राज्य मे सामिल ओडिआभाषी क्षेत्रों मे सभी सरकारी कार्यालय तथा स्कुलों में 4 मार्च 1872 को
ओडिआ भाषा को सरकारी भाषा का मान्यता मिला.....

इस घटना से प्रेरित हो कर हीं बाद में कटक सम्बलपुर तथा बालेश्वर में भाषा को लेकर बुद्धिजीवीओं में जागृति देखने को मिली थी.....

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

*******उत्कल दिवस*******


जब देने लगे लोग बंदे मातरम् बंदे मातरम् के नारे....
हैरत क्यों जगवालों को हमने ऐसे क्या कर डाले.....
और हमने बदला जब  उसी गीत का शब्द सुर ताल
लिखदिए बंदे उत्कल जननी सा  पद्य उस
साल...
वह बंगभंग का आन्दोलन कहलाया राष्ट्रीय
क्रान्ति
हम 4 हिस्सों में बंटे हुए लोग चाह रहे थे एकजुटता
भारतीय नेता मगर तब कहते रहे हमें ही क्षेत्रवादी....
ना होते कूलबृद्ध मधुसूदन ओर अनेकों माटिप्रेमी पुत्रपुत्री
कहाँ हो पाता तब एकत्रीकरण पडोशीओं कि मंशा थी
कि हम बंटे रहे सदा खटते रहे उनके गुलामों
कि भांति
मगर ठान लिए थे मधुसुदन कि बनकर रहेगा
अलग राज्य
नहीं झुकेगी किसी कलिंगी का माथा बदलेगें मिलकर भाग्य.....

1928 वह दौर था देश में आजादी कि
क्रान्ति कि
गांधी नेहुरु बोस लाल-बाल-पाल  कि
आंधी कि

आया था साइमन कमीशन लिए नये
सौगात
कहा सबने जाओ जाओ साइमन हमें पसंद नहीं तुमरी बात
चालाक मधु देख रहे थे जाना आया मौका अपने हात
उत्कलप्रेमी बंदो से करवाया पटना में ही साइमन का स्वागत
सुने साइमन उत्कल का दुःख लिखे रिपोर्ट बनी बात
1936 बना उत्कल प्रदेश मिला बंटे हुएँ को  एकजुटता
न होता यदि हमारी तब एकत्रीकरण
स्वतंत्रता के बाद
न हो पाते एकजुट
पडोशीओं के नेताओं के कारण

हमने खोया है  तब भी
मेदिनीपुर बस्तर वीरभूम खरसंवा षडैकला
जैसे भूभाग
पुनः मिश्रण अब लक्ष्य बने
जागो उत्कल !!!!!
गाओ अखंड उत्कल का राग.....

आज उत्कल दिवस है......
1756 में मराठीओं ने जब चौद्वार(कटक) में हविबुल्ला के साथ ओडिशा का बंटवारा किया था...
तब से लेकरके 1936 तक उत्कल /कलिंग/कोसल राज्य चार हिस्सों में बंटा हुआ था...

अंग्रेजों को सर्वाधिक परेशान करनेवाले ओडिआ लोगों को उन गोरों ने वर्षों तक अपने शोषण का शिकार बनाया.......
उन्निसवीं सदी में आज का ओडिशा चार हिस्सों में बंटा हुआ था....
बंगाल,मद्रास,मद्यप्रदेश तथा विहार मे चार हिस्सों मे बंटे हुए ओडिआ लोगों को अपना भाषा संस्कृति त्याग कर बंगाली,मद्रासी,हिन्दीभाषी व बिहारी बनने को दवाब डाला गया.....

मधुसुदन दास बंगाल में 16 साल रह कर ओडिशा लौटे और उन्होनें इसके खिलाफ लोगों को एकजुट करना शूरुकरदिया....
1903 से 1934 तक वह आजीवन
उत्कल के लिए लडते रहे.....

1928 मे साइमन कमिशन भारत आया....
भारत के सभी नेताओं ने
उनका विरोध किया
लेकिन मधुसुदन जानते थे कि यही सही मौका है....
उन्होनें उत्कल सम्मिलनी के सदस्यों को पटना मे साइमन कमीशन का स्वागत करने को निर्देश दिए.....
वहीं हुआ....
साइमन कमीशन को सारे भारत में उनकी हो रही अपमान के बीचो बीच यह स्वागत सत्कार अच्छा लगा.....
साइमन कमीशन ने व्रिटेन के पार्ल्यामैंट को नूतन उत्कल/ओडिशा राज्य गठन कि सिफारिश भेज दी.....
और उन्हीं सिफारिशों के बदोलत 1936 में ओडिशा भाषा संस्कृति आधार पर भारत का पहला राज्य बनकर उभरा.......

लेकिन हमें मात्र आधा ओडिशा देकर के #AprilFool बनाया गया था.....
आज भी बंगाल में मेदिनीपुर,छतिशगड का आधा हिस्सा बस्तर से वीरभुम तक और झाडखंड का खरसंवा षडैकला क्षेत्र वहाँ रहनेवाले ओडिआ लोग औडिशा से अलगथलग शोषण शिकार होते आ रहे है....

अब इस पर भी यदि कोई ओडिआ व्यक्ति
अखंड ओडिशा कि बात करने लगे
उत्तरभारतीयों को वह नागवार गुजरता है...

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

एका तो भकत जीवन-सालवेग भजन

भक्तकवि सालवेग द्वारा लिखा एक ओर भजन आज हिन्दी लिपान्तरण एवं अनुवाद के साथ पोस्ट कररहा हुँ....
उम्मिद है आपको पसंद आएगा

ଏକା ତୋ ଭକତ ଜୀବନ
एका तो भकत जीबन
एका(निःसंग) तेरा भक्त जीवन

,ଭକତ ନିମନ୍ତେ ତୋର ଶଙ୍ଖ ଚକ୍ର ଚିହ୍ନ।।
भकत निमन्ते तोर शंख चक्र चिह्न !!
भक्तों के लिए तेरा शंख चक्र चिह्न
।।

ଭକତ ତୋ ପିତାମାତା ଭକତ ତୋ ବନ୍ଧୁ,
भकत तो पितामाता भकत तो बन्धु
भक्त तेरे पितामाता भक्त हीं बन्धु ।

ଭକତ ହିତରେ ତୋର ନାମ କୃପାସିନ୍ଧୁ ।।
भकत हितरे तोर नाम कृपासिंधु
भक्त हितार्थे तेरा नाम कृपासिंधु

ଧେନୁ ପଛେ ପଛେ ବତ୍ସା
ଗମେ କ୍ଷୀର ଲୋଭେ,
धेनु पछे पछे बत्सा गमे क्षीर लोभे
धेनु पिछे पिछे बत्सा
जाए दुग्ध लोभे

ଭକତ ପଛରେ ତୁହି ଥାଉ ସେହି ଭାବେ।।
भकत पछरे तुहि थाउ सेहि भाबे
भक्तों के पिछे तुम वैसे हीं होते

ବାପା ମୋ ମୋଗଲପୁଅ
ମାତେ ମୋ ବ୍ରାହ୍ମଣୀ,.....
बापा मो मोगलपुत्र
माते मो ब्राह्मणी......
पिता मेरे मोगलपुत्र
माते हैं ब्राह्मणी......

ଏ (ଦି) କୁଳେ ଜନ୍ମିଲି ହିନ୍ଦୁ ନଖାଏ ମୋ ପାଣି ।।....
दि कुळे जन्मिलि हिन्दु नखाए मो पाणि ।।....
दोनों कुल मे जन्माँ हिन्दु न छुँए मेरा पानी ।।....

କହେ ସାଲବେଗ ହୀନ ଜାତିରେ ଯବନ,
कहे सालवेग हीन जातिरे जबन
कहे सालवेग हीन जाति में वन ।

ଶ୍ରୀରଙ୍ଗାଚରଣ ବିନୁ ନ ଜାଣଇ ଆନ।।
श्रीरंगा चरण बिनु न जाणइ आन ।।
श्रीरंगाचरण बीनु न जानता मैं आन(और कुछ भी) !!

बुधवार, 18 जनवरी 2017

★★★★संगफल★★★★

स्वभाव कवि गंगाधर मेहेर जी कि कविता संगफल का लिपान्तरण ओडिआ तथा अनुवाद रुप....

●लिपान्तरण●

स्वर्ण वर्ण कनिअर पुष्प मनोरम ।
किन्तु तार फळ बिष भिषण बिषम ।।
शिब पाशे रहिबारु संगर कि फळ ।
गउरी गउर कान्ति भुजंग गरळ ।।
सेरुपे धुस्तूर फुल जाह्नबीबरण ।
फळ करि अछि सर्प बिष आकर्षण ।।
एहि रुपे केते लोक शास्त्र संग गुण ।
घेनि होइथान्ति हित भाषणे निपुण ।।
किन्तु कर्मे करिथान्ति अत्यन्त अहित ।
बद्ध होइ नीच दुष्ट प्रबृत्ति सहित ।।

◆ओडिआ लिपि मे....◆

ସ୍ବର୍ଣ୍ଣ ବର୍ଣ୍ଣ କନିଅର ପୁଷ୍ପ ମନୋରମ ।
କିନ୍ତୁ ତାର ଫଳ ବିଷ ଭିଷଣ ବିଷମ ।।
ଶିବ ପାଶେ ରହିବାରୁ ସଙ୍ଗର କି ଫଳ ।
ଗଉରୀ ଗଉର କାନ୍ତି ଭୁଜଙ୍ଗ ଗରଳ ।।
ସେରୂପେ ଧୁସ୍ତୂର ଫୁଲ ଜାହ୍ନବୀବରଣ ।
ଫଳ କରି ଅଛି ସର୍ପ ବିଷ ଆକର୍ଷଣ ।।
ଏହିରୂପେ କେତେ ଲୋକ ଶାସ୍ତ୍ର ସଙ୍ଗ ଗୁଣ ।
ଘେନି ହୋଇଥାନ୍ତି ହିତ ଭାଷଣେ ନିପୁଣ ।।
କିନ୍ତୁ କର୍ମେ କରିଥାନ୍ତି ଅତ୍ଯନ୍ତ ଅହିତ  ।
ବଦ୍ଧ ହୋଇ ନୀଚ ଦୁଷ୍ଟ ପ୍ରବୃତ୍ତି ସହିତ ।।

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             ★अनुवाद★

स्वर्ण वर्ण कर्णिकार पुष्प मनोरम ।

किन्तु इसका फल विष भिषण विषम ।।

शिव के पास रहने से संग का देखो फल ।

गउरी गउर कान्ति भूजंग गरल ।।

उसीतरह धुस्तूर पुष्प जाह्नवीवरण ।

फल कर रहा सर्प विष आकर्षण ।।

इसी भांति कुछ लोग शास्त्र संग गुण ।

पाकर होते हित भाषणे निपुण ।।

किन्तु कर्म करचुके च्युंकि अत्यन्त अहित ।

बद्ध हो नीच दुष्ट प्रवृत्ति सहित.... ।।

गंगाधर मेहर जी कि रचना....

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#सम्बलपुर के #बरपाली मे कवि गंगाधर मेहरजी का जन्म एक #तन्ती यानी #जुलाह परिवार मे हुआ था....

उन्होंने अपने जीवनकाल मे #ओडिआ #साहित्य को अपना जो अवदान दिया वह सदा हमारे लिए
अमूल्य धरोहर
बना रहेगा....

जातिवादीओं ने भारतवर्ष मे जुलाह...
तन्ती लोगों को बुद्धिहीन बताकरके एक समय खुब बदनाम किया था...
उनपर प्रचलित कई लोककथाएं तथा लोकोक्ति इसबात को साबित भी करता है...

इसलिए उत्तरभारतमे ज्यादातर जुलाह,

मुल्लों के संस्पर्श मे आकै कालान्तर मे मुस्लिम बनगये ओडिशा मे कपडा बनानेवाली तन्ती आज भी हिन्दु ही है....

क्यों ??
च्युंकि गंगाधर मेहेर जैसे महान आत्माओं ने ऐसा होने नहीं दिया था ....
इस कविता मे यही संगफल कि बात कवि कहगये है

बुधवार, 11 जनवरी 2017

....नमस्ते प्रभु जगन्नाथ.....

नमस्ते प्रभु जगन्नाथ ।
अनाथ लोगों के नाथ ।।
नमस्ते प्रभु वासुदेव ।
भक्त जनों के बंधु तव ।।
नमस्ते प्रभु हृषिकेश ।
भक्तजनों के विश्वास ।।
नमस्ते प्रभु विश्वरुपी ।
सकल हृदे हो तुम ही ।।
तुम ही सृष्ठि स्थिति लय करते ।
पुनः भव सब संहारते ।।
अशेष कोटि वसुन्धरा ।
तुम्हारे गर्भ मे हे भरा ।।
चौदह ब्रह्माण्ड है बना ।
ये सर्व तुम्हारी रचना ।।
तुम रह्मा रुद्र विष्णु तुम ही ।
तुम बिनु अन्य गति नाही ।।
सृष्टि तुम्हारी क्रीडागृह ।
सर्वपिता होकर भी निर्मोह ।।
तुम्हारा श्वास है मरुत ।
देव हुए है तहुँ जात ।।
तुम ही हो अग्नी देव इन्द्र ।
नयनुँ तव सूर्य चन्द्र जात ।।
भूजा से अनन्त मारुति ।
कण्ठ से जन्मी सरस्वती ।।
सदा चंचल निद्रा नाही ।
यह रुपे शून्ये होते हो तुम्ही ।।
अशेष तुम्हारी महिमा ।
कोई न जानता गुणसीमा ।।
तेरे नाम करता रहे जो लय ।
करोड़ों जन्मों का पाप हो क्षय ।।
तुम्हारा नाम ले जो मिल जाय सिद्धि ।
दूर हो जाते रोग शोक आदि ।।
आरत भंजन तुम्हारा वह बाना ।
आतंग(विपत्ति) काले वज्र सेह्ना (सन्नाह,कवच) ।।
होए हो दश अवतार ।
उतारे धरती के भार ।।
दुष्ट निवारि संत पालते हो।
तुम नाथ परम दयालु ।।
तुम हो दरिद्रों के धन ।
तुमरे चरणों मे रहे मेरा मन ।।
सती युवतियों के मनमें ।
उनके पति होते हे जैसे ।।
उसी भांति मेरा यह मन ।
तुम्हारे चरणों मे रहे सदा भगवन ।।
कहे दास जगन्नाथ ।
कमल चरणों मे आश..।।

द्रष्टव्य :- प्रस्तुत भक्ति रचना "ନମସ୍ତେ ପ୍ରଭୂ ଜଗନ୍ନାଥ" मूलतः ओडिआ भाषा मे अतिवडी जगन्नाथ दासजी ने लिखा था ।
मैने मात्र दैव प्रेरणा से इसका हिन्दी अनुवाद किया है....

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

चोडगंगदेव और जनसृतिआँ.....भाग 1

#कलिगंराज
अनन्तबर्मा चोडगंग देव ने
1078 से 1147....
सत्तर साल तक आगंगा गोदावरी पर राज किया था ......
उनके पिता
देवेन्द्र बर्मा राजराजदेव

दक्षिणी #कलिगं राज्य के राजा थे जो केशरी राजाओं के उत्कल के पश्चिमी भाग मे था ।

उनकी माता #चोलराज #कुलतुगं राजेन्द्र कि पुत्री तथा पिता #पूर्वगंगवंशी होने के कारण उनका नाम #चोलगंग रखागया था ये नाम आज बदलकर #चोडगंग हुआ है ....... मात्र 2 (1078) वर्ष कि आयु में उनका राज्याभिषेक #कलिगंनगर आधुनिक #मूखलिगंम् सहर में संपन्न हुआ ......

1135 तक यही #कलिगंनगर उनके साम्राज्य कि राजधानी बनी रही ओर उसी साल उन्होने अपना राजधानी #कटकनगर को बनाया ......तबसे 1950 तक #कटक को राजधानी का दर्जा मिलता रहा........

चोडगंग के बारे मे अनेकों जनसृति गढे गये.....

पुरी #श्रीक्षेत्र मे प्रचलित #मादलापांजी
ग्रन्थ मे उनके बारे मे जो कहगया है वह उनकी सम्मान हानी करता है...

कुछ ऐतिहासिकों ने मादला पांजी को 15वीं सदी परवर्त्ती ग्रन्थ माना हे .....

मादलापांजी मे चोडगंग को
#चोरगंग कहागया है
ये भी कि उनकी माता
एक #दक्षिणभारतीय विधवा
व (जारज) पिता #गोकर्ण थे.....

बालक चोडगंग एक दिन अपने संगी साथीओं के साथ #राजामन्त्री खेल रहे थे कि #केशरीराजवंश शासित #उत्कल राज्य सेनापति #वासुदेव_वाहिनीपति ने उन्हें देखा वो चोडगंग से प्रभावित हुए ।
#उत्कल सेनापति उनके गुरू हुए उन्होने चोडगंग को समर्थ योद्धा बनाया ।
इसबीच किसी बातपर #केशरी राजा
से सेनापति बासुदेव वाहिनीपति का झगडा हो गया .....

वासुदेवजी का दुःख शिष्य चोडगंग से देखा न गया ....उसने तय कर लिया ....उत्कलराज को दंड दैके रहेगा.....

वो यही सोचते हुए एक चुडैल #नितेई #धोवणी से मिला और उससे चोडगंग को चमत्कारी शक्ति प्राप्त हुए ।
इससे वह शक्तिशाली अपराजय उत्कलराज को परास्त करके स्वयं
उत्कल #राजसिंहासन आरोहण पूर्वक शासन करनेलगा ।
यथा संभव
यह जनसृति #सूर्यवंशी राजाओं के राजत्वकाल(15वीं सदी) मे गढागया होगा.....

चोडगंग अनन्तवर्मन के बारे में 2 जनसृति और है....

उनके बारे में तेलुगु जनसृति
अगले पोस्ट में.......