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अनंत_वासुदेव_मंदिर भूवनेश्वर कि सर्वप्रथम पुरातन विष्णु मंदिर है ।पुरातन काल मे भूवनेश्वर को शैव क्षेत्र के रुप मे जानाजाता था यहाँ कई प...

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

*******उत्कल दिवस*******


जब देने लगे लोग बंदे मातरम् बंदे मातरम् के नारे....
हैरत क्यों जगवालों को हमने ऐसे क्या कर डाले.....
और हमने बदला जब  उसी गीत का शब्द सुर ताल
लिखदिए बंदे उत्कल जननी सा  पद्य उस
साल...
वह बंगभंग का आन्दोलन कहलाया राष्ट्रीय
क्रान्ति
हम 4 हिस्सों में बंटे हुए लोग चाह रहे थे एकजुटता
भारतीय नेता मगर तब कहते रहे हमें ही क्षेत्रवादी....
ना होते कूलबृद्ध मधुसूदन ओर अनेकों माटिप्रेमी पुत्रपुत्री
कहाँ हो पाता तब एकत्रीकरण पडोशीओं कि मंशा थी
कि हम बंटे रहे सदा खटते रहे उनके गुलामों
कि भांति
मगर ठान लिए थे मधुसुदन कि बनकर रहेगा
अलग राज्य
नहीं झुकेगी किसी कलिंगी का माथा बदलेगें मिलकर भाग्य.....

1928 वह दौर था देश में आजादी कि
क्रान्ति कि
गांधी नेहुरु बोस लाल-बाल-पाल  कि
आंधी कि

आया था साइमन कमीशन लिए नये
सौगात
कहा सबने जाओ जाओ साइमन हमें पसंद नहीं तुमरी बात
चालाक मधु देख रहे थे जाना आया मौका अपने हात
उत्कलप्रेमी बंदो से करवाया पटना में ही साइमन का स्वागत
सुने साइमन उत्कल का दुःख लिखे रिपोर्ट बनी बात
1936 बना उत्कल प्रदेश मिला बंटे हुएँ को  एकजुटता
न होता यदि हमारी तब एकत्रीकरण
स्वतंत्रता के बाद
न हो पाते एकजुट
पडोशीओं के नेताओं के कारण

हमने खोया है  तब भी
मेदिनीपुर बस्तर वीरभूम खरसंवा षडैकला
जैसे भूभाग
पुनः मिश्रण अब लक्ष्य बने
जागो उत्कल !!!!!
गाओ अखंड उत्कल का राग.....

आज उत्कल दिवस है......
1756 में मराठीओं ने जब चौद्वार(कटक) में हविबुल्ला के साथ ओडिशा का बंटवारा किया था...
तब से लेकरके 1936 तक उत्कल /कलिंग/कोसल राज्य चार हिस्सों में बंटा हुआ था...

अंग्रेजों को सर्वाधिक परेशान करनेवाले ओडिआ लोगों को उन गोरों ने वर्षों तक अपने शोषण का शिकार बनाया.......
उन्निसवीं सदी में आज का ओडिशा चार हिस्सों में बंटा हुआ था....
बंगाल,मद्रास,मद्यप्रदेश तथा विहार मे चार हिस्सों मे बंटे हुए ओडिआ लोगों को अपना भाषा संस्कृति त्याग कर बंगाली,मद्रासी,हिन्दीभाषी व बिहारी बनने को दवाब डाला गया.....

मधुसुदन दास बंगाल में 16 साल रह कर ओडिशा लौटे और उन्होनें इसके खिलाफ लोगों को एकजुट करना शूरुकरदिया....
1903 से 1934 तक वह आजीवन
उत्कल के लिए लडते रहे.....

1928 मे साइमन कमिशन भारत आया....
भारत के सभी नेताओं ने
उनका विरोध किया
लेकिन मधुसुदन जानते थे कि यही सही मौका है....
उन्होनें उत्कल सम्मिलनी के सदस्यों को पटना मे साइमन कमीशन का स्वागत करने को निर्देश दिए.....
वहीं हुआ....
साइमन कमीशन को सारे भारत में उनकी हो रही अपमान के बीचो बीच यह स्वागत सत्कार अच्छा लगा.....
साइमन कमीशन ने व्रिटेन के पार्ल्यामैंट को नूतन उत्कल/ओडिशा राज्य गठन कि सिफारिश भेज दी.....
और उन्हीं सिफारिशों के बदोलत 1936 में ओडिशा भाषा संस्कृति आधार पर भारत का पहला राज्य बनकर उभरा.......

लेकिन हमें मात्र आधा ओडिशा देकर के #AprilFool बनाया गया था.....
आज भी बंगाल में मेदिनीपुर,छतिशगड का आधा हिस्सा बस्तर से वीरभुम तक और झाडखंड का खरसंवा षडैकला क्षेत्र वहाँ रहनेवाले ओडिआ लोग औडिशा से अलगथलग शोषण शिकार होते आ रहे है....

अब इस पर भी यदि कोई ओडिआ व्यक्ति
अखंड ओडिशा कि बात करने लगे
उत्तरभारतीयों को वह नागवार गुजरता है...

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

एका तो भकत जीवन-सालवेग भजन

भक्तकवि सालवेग द्वारा लिखा एक ओर भजन आज हिन्दी लिपान्तरण एवं अनुवाद के साथ पोस्ट कररहा हुँ....
उम्मिद है आपको पसंद आएगा

ଏକା ତୋ ଭକତ ଜୀବନ
एका तो भकत जीबन
एका(निःसंग) तेरा भक्त जीवन

,ଭକତ ନିମନ୍ତେ ତୋର ଶଙ୍ଖ ଚକ୍ର ଚିହ୍ନ।।
भकत निमन्ते तोर शंख चक्र चिह्न !!
भक्तों के लिए तेरा शंख चक्र चिह्न
।।

ଭକତ ତୋ ପିତାମାତା ଭକତ ତୋ ବନ୍ଧୁ,
भकत तो पितामाता भकत तो बन्धु
भक्त तेरे पितामाता भक्त हीं बन्धु ।

ଭକତ ହିତରେ ତୋର ନାମ କୃପାସିନ୍ଧୁ ।।
भकत हितरे तोर नाम कृपासिंधु
भक्त हितार्थे तेरा नाम कृपासिंधु

ଧେନୁ ପଛେ ପଛେ ବତ୍ସା
ଗମେ କ୍ଷୀର ଲୋଭେ,
धेनु पछे पछे बत्सा गमे क्षीर लोभे
धेनु पिछे पिछे बत्सा
जाए दुग्ध लोभे

ଭକତ ପଛରେ ତୁହି ଥାଉ ସେହି ଭାବେ।।
भकत पछरे तुहि थाउ सेहि भाबे
भक्तों के पिछे तुम वैसे हीं होते

ବାପା ମୋ ମୋଗଲପୁଅ
ମାତେ ମୋ ବ୍ରାହ୍ମଣୀ,.....
बापा मो मोगलपुत्र
माते मो ब्राह्मणी......
पिता मेरे मोगलपुत्र
माते हैं ब्राह्मणी......

ଏ (ଦି) କୁଳେ ଜନ୍ମିଲି ହିନ୍ଦୁ ନଖାଏ ମୋ ପାଣି ।।....
दि कुळे जन्मिलि हिन्दु नखाए मो पाणि ।।....
दोनों कुल मे जन्माँ हिन्दु न छुँए मेरा पानी ।।....

କହେ ସାଲବେଗ ହୀନ ଜାତିରେ ଯବନ,
कहे सालवेग हीन जातिरे जबन
कहे सालवेग हीन जाति में वन ।

ଶ୍ରୀରଙ୍ଗାଚରଣ ବିନୁ ନ ଜାଣଇ ଆନ।।
श्रीरंगा चरण बिनु न जाणइ आन ।।
श्रीरंगाचरण बीनु न जानता मैं आन(और कुछ भी) !!

बुधवार, 18 जनवरी 2017

★★★★संगफल★★★★

स्वभाव कवि गंगाधर मेहेर जी कि कविता संगफल का लिपान्तरण ओडिआ तथा अनुवाद रुप....

●लिपान्तरण●

स्वर्ण वर्ण कनिअर पुष्प मनोरम ।
किन्तु तार फळ बिष भिषण बिषम ।।
शिब पाशे रहिबारु संगर कि फळ ।
गउरी गउर कान्ति भुजंग गरळ ।।
सेरुपे धुस्तूर फुल जाह्नबीबरण ।
फळ करि अछि सर्प बिष आकर्षण ।।
एहि रुपे केते लोक शास्त्र संग गुण ।
घेनि होइथान्ति हित भाषणे निपुण ।।
किन्तु कर्मे करिथान्ति अत्यन्त अहित ।
बद्ध होइ नीच दुष्ट प्रबृत्ति सहित ।।

◆ओडिआ लिपि मे....◆

ସ୍ବର୍ଣ୍ଣ ବର୍ଣ୍ଣ କନିଅର ପୁଷ୍ପ ମନୋରମ ।
କିନ୍ତୁ ତାର ଫଳ ବିଷ ଭିଷଣ ବିଷମ ।।
ଶିବ ପାଶେ ରହିବାରୁ ସଙ୍ଗର କି ଫଳ ।
ଗଉରୀ ଗଉର କାନ୍ତି ଭୁଜଙ୍ଗ ଗରଳ ।।
ସେରୂପେ ଧୁସ୍ତୂର ଫୁଲ ଜାହ୍ନବୀବରଣ ।
ଫଳ କରି ଅଛି ସର୍ପ ବିଷ ଆକର୍ଷଣ ।।
ଏହିରୂପେ କେତେ ଲୋକ ଶାସ୍ତ୍ର ସଙ୍ଗ ଗୁଣ ।
ଘେନି ହୋଇଥାନ୍ତି ହିତ ଭାଷଣେ ନିପୁଣ ।।
କିନ୍ତୁ କର୍ମେ କରିଥାନ୍ତି ଅତ୍ଯନ୍ତ ଅହିତ  ।
ବଦ୍ଧ ହୋଇ ନୀଚ ଦୁଷ୍ଟ ପ୍ରବୃତ୍ତି ସହିତ ।।

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             ★अनुवाद★

स्वर्ण वर्ण कर्णिकार पुष्प मनोरम ।

किन्तु इसका फल विष भिषण विषम ।।

शिव के पास रहने से संग का देखो फल ।

गउरी गउर कान्ति भूजंग गरल ।।

उसीतरह धुस्तूर पुष्प जाह्नवीवरण ।

फल कर रहा सर्प विष आकर्षण ।।

इसी भांति कुछ लोग शास्त्र संग गुण ।

पाकर होते हित भाषणे निपुण ।।

किन्तु कर्म करचुके च्युंकि अत्यन्त अहित ।

बद्ध हो नीच दुष्ट प्रवृत्ति सहित.... ।।

गंगाधर मेहर जी कि रचना....

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#सम्बलपुर के #बरपाली मे कवि गंगाधर मेहरजी का जन्म एक #तन्ती यानी #जुलाह परिवार मे हुआ था....

उन्होंने अपने जीवनकाल मे #ओडिआ #साहित्य को अपना जो अवदान दिया वह सदा हमारे लिए
अमूल्य धरोहर
बना रहेगा....

जातिवादीओं ने भारतवर्ष मे जुलाह...
तन्ती लोगों को बुद्धिहीन बताकरके एक समय खुब बदनाम किया था...
उनपर प्रचलित कई लोककथाएं तथा लोकोक्ति इसबात को साबित भी करता है...

इसलिए उत्तरभारतमे ज्यादातर जुलाह,

मुल्लों के संस्पर्श मे आकै कालान्तर मे मुस्लिम बनगये ओडिशा मे कपडा बनानेवाली तन्ती आज भी हिन्दु ही है....

क्यों ??
च्युंकि गंगाधर मेहेर जैसे महान आत्माओं ने ऐसा होने नहीं दिया था ....
इस कविता मे यही संगफल कि बात कवि कहगये है

बुधवार, 11 जनवरी 2017

....नमस्ते प्रभु जगन्नाथ.....

नमस्ते प्रभु जगन्नाथ ।
अनाथ लोगों के नाथ ।।
नमस्ते प्रभु वासुदेव ।
भक्त जनों के बंधु तव ।।
नमस्ते प्रभु हृषिकेश ।
भक्तजनों के विश्वास ।।
नमस्ते प्रभु विश्वरुपी ।
सकल हृदे हो तुम ही ।।
तुम ही सृष्ठि स्थिति लय करते ।
पुनः भव सब संहारते ।।
अशेष कोटि वसुन्धरा ।
तुम्हारे गर्भ मे हे भरा ।।
चौदह ब्रह्माण्ड है बना ।
ये सर्व तुम्हारी रचना ।।
तुम रह्मा रुद्र विष्णु तुम ही ।
तुम बिनु अन्य गति नाही ।।
सृष्टि तुम्हारी क्रीडागृह ।
सर्वपिता होकर भी निर्मोह ।।
तुम्हारा श्वास है मरुत ।
देव हुए है तहुँ जात ।।
तुम ही हो अग्नी देव इन्द्र ।
नयनुँ तव सूर्य चन्द्र जात ।।
भूजा से अनन्त मारुति ।
कण्ठ से जन्मी सरस्वती ।।
सदा चंचल निद्रा नाही ।
यह रुपे शून्ये होते हो तुम्ही ।।
अशेष तुम्हारी महिमा ।
कोई न जानता गुणसीमा ।।
तेरे नाम करता रहे जो लय ।
करोड़ों जन्मों का पाप हो क्षय ।।
तुम्हारा नाम ले जो मिल जाय सिद्धि ।
दूर हो जाते रोग शोक आदि ।।
आरत भंजन तुम्हारा वह बाना ।
आतंग(विपत्ति) काले वज्र सेह्ना (सन्नाह,कवच) ।।
होए हो दश अवतार ।
उतारे धरती के भार ।।
दुष्ट निवारि संत पालते हो।
तुम नाथ परम दयालु ।।
तुम हो दरिद्रों के धन ।
तुमरे चरणों मे रहे मेरा मन ।।
सती युवतियों के मनमें ।
उनके पति होते हे जैसे ।।
उसी भांति मेरा यह मन ।
तुम्हारे चरणों मे रहे सदा भगवन ।।
कहे दास जगन्नाथ ।
कमल चरणों मे आश..।।

द्रष्टव्य :- प्रस्तुत भक्ति रचना "ନମସ୍ତେ ପ୍ରଭୂ ଜଗନ୍ନାଥ" मूलतः ओडिआ भाषा मे अतिवडी जगन्नाथ दासजी ने लिखा था ।
मैने मात्र दैव प्रेरणा से इसका हिन्दी अनुवाद किया है....

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

चोडगंगदेव और जनसृतिआँ.....भाग 1

#कलिगंराज
अनन्तबर्मा चोडगंग देव ने
1078 से 1147....
सत्तर साल तक आगंगा गोदावरी पर राज किया था ......
उनके पिता
देवेन्द्र बर्मा राजराजदेव

दक्षिणी #कलिगं राज्य के राजा थे जो केशरी राजाओं के उत्कल के पश्चिमी भाग मे था ।

उनकी माता #चोलराज #कुलतुगं राजेन्द्र कि पुत्री तथा पिता #पूर्वगंगवंशी होने के कारण उनका नाम #चोलगंग रखागया था ये नाम आज बदलकर #चोडगंग हुआ है ....... मात्र 2 (1078) वर्ष कि आयु में उनका राज्याभिषेक #कलिगंनगर आधुनिक #मूखलिगंम् सहर में संपन्न हुआ ......

1135 तक यही #कलिगंनगर उनके साम्राज्य कि राजधानी बनी रही ओर उसी साल उन्होने अपना राजधानी #कटकनगर को बनाया ......तबसे 1950 तक #कटक को राजधानी का दर्जा मिलता रहा........

चोडगंग के बारे मे अनेकों जनसृति गढे गये.....

पुरी #श्रीक्षेत्र मे प्रचलित #मादलापांजी
ग्रन्थ मे उनके बारे मे जो कहगया है वह उनकी सम्मान हानी करता है...

कुछ ऐतिहासिकों ने मादला पांजी को 15वीं सदी परवर्त्ती ग्रन्थ माना हे .....

मादलापांजी मे चोडगंग को
#चोरगंग कहागया है
ये भी कि उनकी माता
एक #दक्षिणभारतीय विधवा
व (जारज) पिता #गोकर्ण थे.....

बालक चोडगंग एक दिन अपने संगी साथीओं के साथ #राजामन्त्री खेल रहे थे कि #केशरीराजवंश शासित #उत्कल राज्य सेनापति #वासुदेव_वाहिनीपति ने उन्हें देखा वो चोडगंग से प्रभावित हुए ।
#उत्कल सेनापति उनके गुरू हुए उन्होने चोडगंग को समर्थ योद्धा बनाया ।
इसबीच किसी बातपर #केशरी राजा
से सेनापति बासुदेव वाहिनीपति का झगडा हो गया .....

वासुदेवजी का दुःख शिष्य चोडगंग से देखा न गया ....उसने तय कर लिया ....उत्कलराज को दंड दैके रहेगा.....

वो यही सोचते हुए एक चुडैल #नितेई #धोवणी से मिला और उससे चोडगंग को चमत्कारी शक्ति प्राप्त हुए ।
इससे वह शक्तिशाली अपराजय उत्कलराज को परास्त करके स्वयं
उत्कल #राजसिंहासन आरोहण पूर्वक शासन करनेलगा ।
यथा संभव
यह जनसृति #सूर्यवंशी राजाओं के राजत्वकाल(15वीं सदी) मे गढागया होगा.....

चोडगंग अनन्तवर्मन के बारे में 2 जनसृति और है....

उनके बारे में तेलुगु जनसृति
अगले पोस्ट में.......

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

दळबेहेरा सामन्त माधवचन्द्र राउतराय -1827 तापंगगड संग्राम्

भारत मे ऐसे हजारों स्वतंत्रता सेनानी हुए है जिनके बारे मे  केवल स्थानीय लोग जानते हे ।
ऐसे ही एक जननायक थे
दलवेहेरा सामन्त माधवचन्द्र राउतराय.........
1827 में अंग्रेजोंने खोर्द्दाराज्य के तापंगगड़ पर हमला करदिया .....
मगर
#पाइक योद्धाओं को इस हमले कि पहले से ही खबर हो गयी थी ।
मळिपडा,नारणगड,रामचण्डिगड, रथिपुरगड,छत्रमागड व गडसानपुट आदि क्षेत्रों के योद्धाओं ने मिलकर उनका सामना किया ।
तापंग दलवेहेरा के साथ भागीरथी दळेइ,प्रताप सिंह,बैरीगंजन,गोबर्धन दळेइ व रणसिंह योद्धा आगे रहकर पाइकों का प्रतिनिधित्व कररहे थे ।
शुरुआती लढाई मे अंग्रेज हारने लगे लेकिन जैसेतैसे उन्हे कांजिआगड में छाँवनी लगाने मे सफलता मिलगयी .....
देवी हस्तेश्वरी कि पूजा के बाद पाइक योद्धाओं ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेडदिया जो 7 दिनों तक चला । युद्ध के
चौथे दिन भयानक युद्ध हुआ....
दलवेहेरा माधर चन्द्र के नेतृत्व मे पाइक ज्यादा आक्रामक हो उठे इससे हजारों अंग्रेज सैनिक मरे ओर उनके कैप्टन धारकोर्ट वहाँ से जान बचाकर भाग निकले ।

धाराक्रोट ने अब दिमाग का खेल खेला ......
अंग्रेज रस्ते मे कुछ सोने के सिक्के डाल दिए ओर छिपगये....
अंग्रेजों का पिछा करता हुआ
दधीमाछगाडिआ गाँव का एक पाइक सैनिक मधुसुदन पट्टनायक ने रास्तों मे सोना गिरा देखा और वो सब उठाने लगा .....
अंग्रेज जानगये वो लोभी है यानी काम का बंदा !
उसे और लोभ दियागया
और उसने सोने के लालच मे दुशमनों से हाथ मिलालिया ।

अब अंग्रेज भारी पडने लगे लेकिन वो तब भी किसी भी तरह जीत नहीं पा रहे थे .....

सातवें दिन देशद्रोही मधुसुदन पट्टनायक ने अंग्रेजों को हातीआ पर्वत के नीचे रखे पाइकों का अश्त्रागार दिखादिया और अंग्रेजों ने उसमें आग लगा दिया .....
अब पाइक वीरों के पास गोरिला युद्ध के सिबा कोइ रस्ता न था ।
वो सब छिपकर अंग्रेजों के खिलाफ 2 वर्षों तक लढते रहे ।
1829 में एक सुबह जंगल में एक केवट परिवार कि बृद्धा रोती हुई जा रही थी .....भेष बदले हुए दलवेहेरा माधवचन्द्र ने जब उससे रोने का कारण पुछा उसने अपने गरीबी व कुटुम्बजनों का निराहार
होना आदि प्रसंग कह सुनाया .और कहा कि वो जंगल मे मरने आई है च्युंकि वो अपने बच्चों को खाना तक दे नहीं पा रही....

दलवेहेरा माधवचन्द्र ने उन्हे अंग्रेजों से मिलादेने को कहा .....
और ये भी कि उसे बहुत सारे पैसा मिलेगा .....
अंग्रेज थाने मे जब दलवेहेरा ने अपना परिचय दिया अंग्रेज अफसर दंग रहगये .....वह औरत जो कुछ घंटो पूर्व अन्नदाने के लिए रो रही थी खुदको कोशने लगी कि उसने कितना बडा गलती करदिया .......
दलवेहेरा
माधवचन्द्र राउतरात के बारे मे एक अंग्रेज अफसर ने अपने अटोवायोग्राफी मे लिखा है

“Dalabehera Madhaba Chandra was not only a fighter for freedom, but also a great friend of the poor. No one hadever been turned away from his door empty handed. He wasloved and respected every where for his greatness of heart.”

(दलवेहेरा एक उपाधी है जो पाइक सर्दारों को मिलाकरता था ....)

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

भारत से बौद्ध धर्म कैसे लुप्त हुआ...

दशवीं सदीमे समुचे भारत का चक्कर लगाते हुए श्री शंकराचार्य श्रीक्षेत्र पुरुषोत्तम पहँचते है ।

उन दिनों आज जितना बडा मन्दिर नहीं था आज जहाँ भोगमंडप है वहीं एक बडा मण्डप जरूर हुआ करता था !

शंकरचार्य जी ने देखा हर पंथ सम्प्रदाय के लोग इस मंडप के पास आकरके इक्कठे हो रहे है ओर फिर जगन्नाथ को अपने हिसाब से पूज रहे है .....

कोई शैव बेलपत्र चढा रहा है......तो कोई शाक्त जवा पूष्प .....

उनदिनों पुरी अन्चल केशरी वंश अधीनस्त आया करता था
सो शंकराचार्य
#Jajpur जाजपुर में केशरी राजा से मिले ......

शंकराचार्य जी ने राजा से कहा

एक ईश्वर सो एक पूजाविधी होना चाहिए

केशरी राजा कुछ चिन्तित होते हुए मुनी से आग्रह करने लगे

हे देव ! कृपा करके आप ही कोई मार्ग बतावें मैं तो निरुपाय हुँ......

शंकराचार्य जी ने सभी सम्प्रदायों के बीच उसी भोगमंडप के पास एक तर्कसभा के आयोजन का सुझाव राजा को दिया ।

अपने देश के लोग तर्क वितर्क के मामले में एलियन के बिरादरी को भी हरासकने का दमखम रखते है
...।

सो सब राजी हो गये

एक एक करके सब सम्प्रदाय के अग्रज विद्वान हारकर बाहर हो रहे थे.....जैन,वैष्णव,सौर,गाणपत्य आदि आदि........

अन्त मे सिर्फ बौध व शाक्त धर्म के अनुयायी ही अपराजय रहे गये......

कोई किसी के हरा नहीं पा रहे थे न स्वयं हार मान रहे थे....।

वौधों के पास ऐतिहासिक तथ्य था....
वो जगन्नाथ को भगवन बुद्ध तथा उनके मध्य स्थित ब्रह्म को बुद्धदन्त बतारहे थे....

उधर शाक्तधर्म अनुयायीओं ने श्रीजगन्नाथ को
कामाक्षा काली(आसाम),सुभद्रा जी को भूवनेश्वरी(दुर्गा) तथा बलभद्रजी को मंगलादेवी(उत्कलीय) प्रमाण करदिया.....

दोनों ही पक्ष का तर्क मजबुत था......

केशरी राजा वौध थे रानी शाक्त धर्म प्रेमी
दोनों मे कौन श्रेष्ठ है जाननेे हेतु कौतुहल ओर बढा......

तब श्रेष्ठता जानने को
एक मटके में एक काले नाग को भरवाकै दोनों पक्षों से पुछागया बताओ इस बंद मटके में क्या है .....

बौद्ध सन्यासीओं ने कालानाग बताया
शाक्तधर्म तान्त्रिकों ने उस सांप को सबके अगोचर मे तन्त्र से भस्म करके उस मटके मे भस्म है कहा .....

इससे
शाक्तधर्मावल्भीओं का विजय
हो गया और बौद्धों का हार......

धीरे धीरे बौद्ध भारत में जगह जगह हारते चले गये और अन्ततः भारत से बौद्धधर्म लुप्त हो गया......

बुधवार, 9 नवंबर 2016

अंग्रेजों का 1811 मुद्रानीति - ऐसे हुए ओडिआ एक झटके मे गरीब

1810 तक अंग्रेज पुरे भारत पर कब्जा कर चुके थे ।
अगले साल यानी 1811 को वो लोग नये मुद्रानीति लेकर आ गये ।
उन दिनों पूर्वभारत मे लेनदेन व्यापार कि करेंसीओं मे #कौडी आम लोगों के पास बहुतायत मे हुआ करता था ।
Odisha के लोग अछे खासे व्यापारी हुआ करते थे
वो कौडीओं के बल पर स्वयं को अमीर समझने लगे थे ।
अंग्रेजों ने उनको एक दिन मे नये कानुन बनाके कंगाल बना दिया ।
नये कानुन के तहत केवल सोना सिलवर के
रुपयों को मान्य बनाया गया
। इससे कौडीओं के मूल्य सिलवर के मुकावले काफी घटगये ।
लोग कौडी के बदले रुपा के सिक्के संग्रह करने के चक्कर मे
मुद्रा विनीमयकारीओं के हातों शोषण के शिकार हुए ।

अंग्रेजों ने कौडीओं का मूल्य तय किया था 1280•4 यानी 5120 कौडी = 64 आनै मे एक रुपा या सिलवर मुद्रा

लेकिन वाजार मे वभाव इसके दुगने तिगने करदिएगये थे ।
यानी 20000 से 30000 कौडीओं के बदले एक रुपा मुद्रा

फिर एक ओर सूर्यास्थ कानुन के बल पर अंग्रेजों ने ओडिआ जमिदारों से जमिदारी छीन कर जानकार अत्याचारी बंगाली जमीदारों को दे दिए

ओर उन नये जमिदारों ने अंग्रजी किनुनी क्षमता के बल पर लोगों का शोषण करना शुरुकरदिया........

वर्षों संप्पन रहा एक क्षेत्र मात्र मुद्रानीति के बदल जाने से देश का सबसे गरीब भूभाग बनगया था

शनिवार, 29 अक्टूबर 2016

जामशेदपुरे

जामशेदपुर आज एक Industrial city है
लेकिन
पहले ऐसा न था ।
काळिमाटि ,साक्नी जैसे कुछ उडिया आदिवासीओँ का गाँव यहाँ हुआ करते थे यहाँ !

टाटा कंपनी ने उन लोगोँ की पैतृक संपत्ति को छिनकर वहाँ
करखाने बनाए और तबसे इस जगह का नाम जामशेद टाटा के
नामसे जमशेदपुर हुआ है ।

इस विषय मेँ एक उडिया गीतिकविता
देवनागरी लिपान्तरण के साथ

    -जामसेदपुरे-

एहि ये नगरी आजि मुँ देखे नय़ने चाहिँ
धन दउलते डउल सरि एहार काहिँ ?

सउधु सउध गगने शिर उठिछि टेकि,
मरतु रखिबा पाहाच बान्धि सरगे निकि !

सुख सउभाग्य़े निरते हसि रहन्ति जने ।
मर दुःख शोक नाहान्ति सते देखि नय़ने ।

कळे निति धन संपद शिरी गढ़न्ति करे
लुहारे करन्ति सुना से कर परशे खरे ।

कि अछि अपूर्ब मर्त्त्य़े या धरि नाहान्ति बसि ?
मनासन्ति सते भूंजिबे स्वर्ग संपद हसि ।

एहि ये सम्भार नय़ने दिने देखिबा पाइँ
निखिळ भूबनु सरागे जने आसन्ति धाइँ ।

माडि ये याअन्ति चरणे शिळा
सरणी परे,
अजाणिते केते दरिद्र आशा बिलुप्त भाले ।

कळ घन मन्द्र गर्जने कर्णे शुणन्ति मिशा
दुःखिहृद बृथा गुपत धीर नीरब भाषा ।

केते आहा पल्ली कृषके चित्त उल्लास ताने .
हळ बाहि एहि प्रान्तर भरि न थिबे दिने ।

केते त कृषक घरणी भोके गिरस्त लागि
भात घेनि बिले थिबटि आसि सरमे भागी ।

प्राणपति पेटु बळिले . लता उढ़ाळे बसि ,
निज पेट अळ्पे मउने भरिथिबटि हसि ।

फेरन्ते कुटीरे चरण लागिथिब ता भारि ,
गिरस्त संगरे नथिले ,किबा कुटीर शिरी ?

सेही शिरीमान भागिँ त गढ़ा ए पुरी आजि ,
सेहि पल्ली सुखशरधा एथि रहिछि भाजि

खोळिले मृत्तिका पाइब हळ लंगळ गार ,
दुःखी हृदे देखि पारिब धन पेषण भार ।

गछ लता मूळ निकाशे आजि नथिब शुखि ,
दिने यहिँ काटि फसल चषा थिबटि रखि ।

केदार कनक सम्भारे भरिथिब
ता मन
तोषे बरषटि खाइ ,से यापिपारिब दिन ।

आजि एबे याइ केबण दूर दुर्गम पथे ,
धरि स्तिरी पुत्र अन्दुटि थिब निशून्य़ पेटे ।

सुमरु थिब ता अतीत भब संपद कथा
शमन जीबन्त पीडने नोइँ दइने
मथा ।

निदारुण एहि छबि के येबे देखिब लोड़ि ,
ए कुबेर पुरे किपाइँ
बारे आसिब बरि ?

कुलिबार याइ आसे त मरु पदा कानने ,
अनशने यहिँ उदर जाळि भ्रमन्ति जने ।

रह , हे नगरनिबासि ,
अर्द्ध नृपतिराजि;
न फेरिबि दिने ए पुरे ,तेजि याउछि आजि ।

रंकनाथ मंदिर

श्रीरंकनाथ मंदिर संभवतः ऐसा इकलौता मंदिर है

जहाँ श्रीजगन्नाथ बलभद्र सुभद्रा
पूर्णागं पूजे जाते है ।

खोर्द्धा से नयागड जानेवाले रस्ते  मे आता है
एक गाँव जागुळाइपाटणा
इसी गाँव मेँ है यह ऐतिहासिक देवालय ।

श्रीरंकनाथ
मंदिर प्रतिष्ठा को लेकर
एक जनसृति प्रचलन
है

पुरी राजा तृतीय नरसिँह देव को
19वीँ सदी मेँ अंग्रेजोँ ने
हत्या के आरोप मे कालापानी भेजदिया था ।

वो वहाँ से समंदर मे तैर कर भागने मेँ सफल हो गये

राजा तैर कर
पूर्वभारत मे पहँचे
और जब अंग्रेजोँ को राजा के पुरी मे होना का पताचला
वे फिर बंदी बनाए गये

लेकिन
इसबार उन्हे कटक मेँ कारागार मेँ कैद करदिया गया था ।

एक दिन रात को एक अनजान व्यक्ति ने कारागार से राजाको मुक्त कराया
ओर अपने पिछे चलने को इशारा करते हुए आगे चलने लगा ।

चलते चलते रात से कब सुबह हुआ
राजा को कोई सुद न था
वे बस चलते जा रहे थे
यन्त्रवत् !

जहाँ आज मंदिर है वहाँ उनदिनोँ घने जंगल हुआ करते थे

राजा को यहाँ पहँचने पर संत रघुवीर दास का कुटिआ मिला ।

वे उनके शिष्य बनगये
व तबसे दयानीधि दास कहलाए ।

परवर्त्ती काल मे दयानिधि दास के परम शिष्य खण्डपडा राजा नरेन्द्र ने यहाँ तालाव व मंदिर निर्माण करवाया था

गुरुवार, 29 सितंबर 2016

कैसे बना सम्बलपुर जंगल से जनपद

वर्तमान बलांगिर जिल्ला
एक समय
पाटणा गड़जात के नामसे प्रशिद्ध हुआ करता
था ।

बलांगिर-पाटणा मे 15वीँ सदी मेँ नृसिँहदेव के नामसे एक राजा का राज था ।

नृसिँहदेव कि रानी भयंकर वर्षा रजनी के समय आसन्न प्रसवा हुई !

राजनवर तथा धाई माँ के गाँव के बीच एक स्रोतस्वती नदी हुआ करती थीँ ।

वह नदी पार करना
ओर उस पार जाकर
धाई को लाना
ये मुस्किल को हल करने को
राजा दिमाग दौडा रहे थे
कि
उनको
बिना बताए
उनके छोटे भाई बलराम देव
भीषण परिस्थितिओँ मे
नदी पार कर के गाँव पहँचे
और
धाईमाँ को अपने पीठ पर बिठाए
नदी पार कर लाए ।

यथा समय धाई ने अपना कार्य संपादन किया
जब नृसिँहदेव उनके अनुज भ्राता का पराक्रम पताचला
वे अत्यन्त खुस हुए

अनुज बलरामदेव को बर्तमान संबलपुर क्षेत्र
भेँट दे दिया था ।

हाँलाकि संबलपुर तब
खांडवप्रस्थ के तरह जंगल ही था
फिर भी बड़े भाई से मिले स्नेह भेँट को ग्रहण कर
वो जब विदाय लेने माता के पास पहँचे
राजमाता ने अपने कनिष्ठ पुत्र से कहा
"बेटा
तु आजसे
# अंगनदीके उत्तरभाग का अधिपति है
दक्षिणी राज्य पर कदापी लोभ न करना
न अपने बड़े भ्राता से कलह"
इतिहास गवाह है
संबलपुर मे उनके आनेवाले पिढ़ीओँ ने कभी बलांगीर पर
हमला नहीँ किया
संबलपुर के लोगोँ कि वीरता
किसी से अविदित नहीँ है
1858 तक जब सारा भारत अंग्रेजोँ के हातोँ मे प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रुपसे आ ही गई थी
तब भी संबलपुर को अंग्रेज जीत नहीँ पाए थे ।

10साल तक कड़े संघर्ष के बाद
सुरेन्द्रसाए जैसे वीरोँ के बलिदान के बाद जाकर ये अंग्रेजोँ के हाथ आया ।