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अनंत_वासुदेव_मंदिर भूवनेश्वर कि सर्वप्रथम पुरातन विष्णु मंदिर है ।पुरातन काल मे भूवनेश्वर को शैव क्षेत्र के रुप मे जानाजाता था यहाँ कई प...

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

बक्सी जगबंधु और 1817 प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कि कहानी

जगबंधु बिद्याधर महापात्र भ्रमरवर राय
संक्षेप मे "बक्सि जगबंधु" !
लोग स्नेह तथा गौरवभाव से पाइक बक्सी भी कहा करते थे ।
19वीँ सदी तक भारतके लगभग ज्यादातर हिस्सोँ पर अंग्रेजोँ का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभुत्व स्थापित हो गया था !
1803 मेँ अंग्रेजोँ ने कटक के बारबाटी दूर्ग को हमला करके जीत लिया !
महामंत्री जयीराजगुरु के नेतृत्व मे
बक्सी जगबंधु और उनके साथीओँ ने 1803 से 1805 तक गोरिला वार और अन्ततः 1805 मे आमने सामने कि लडाई कि थी जिसमे
जयीराजगुरु को धर लिया गया ।
ब्राह्मणकुल मे जन्मेँ
अंग्रेजोँ के हातोँ फाँसी पानेवाले ये प्रथम शहीद है ।
खैर अंग्रेजोँ से आमनेसामने के लढ़ाई मे हारने के बाद बक्सी ने महशुस किया कि
अपने भाईओँ मे सर्व प्रथम जातिवाद का जहर खत्म करना होगा
वे अपने पैतृक भूमि ररगं लौट आए
और लोगोँ को संगठित करने लगे ।
मोगल व मराठीराज से प्रभावित हो अलगथलग पड़चुकि पाइक जाति को एक करने के लिये उन्होने अपना जीवन नौछावर करदिया !
ये काम इतना सहज न था !
गरीब शोषित लज्जित जाति को उसके गौरवमय अतीत कि याद दिलाना तथा एक उज्वल भविष्य गठन हेतु संकल्पबद्ध करवाना एक व्यक्ति के लिये अत्यन्त कष्टकर व्यापार है ।
इसबीच 1810 मे अंग्रेजोँ ने राजासे मिले करमुक्त भूमिओँ पर टैक्स लगाने शुरुकरदिए ।
और 1811 मे सूर्यास्त आइन के बलपर उत्कलीय जमिदारोँ से जमिदारी छीन कै बंगाली गोरचटोँ को दे दिया ।
ये घटना आग मे घी डालने जैसा था ।
पाइक खण्डायत जिन्हे करमुक्त भूमि मिले हुए थे
वो इस अन्याय के विरुध उठ खड़े हुए
और इस तरह से भारत के प्रथम जन आंदोलन कि घटना
ओड़िशा के खोर्दा मे घटित हुआ !
पहले पहल जमिदार राजाओँ द्वारा
कुछ एक
छिटपुट विद्रोह के बाद
बक्सी जगबंधु के नेतृत्व मे
1817 सालमे एक बड़ा विद्रोह हुआ जिससे बंगाल मे चैन कि निद्रा मे सोये अंग्रेजोँ की निँद हाराम हो गये ।
****
इस साल पाइक विद्रोह को 200 साल पुरे हुए है ।
च्युँकि फिलहाल एक राष्ट्रवादी सरकार केन्द्र मे शासक बना है
मेरा व्यक्तिगत विचार है केन्द्र सरकार Odia paika कोँ के सम्मान मे Paika रेजिमेँट बनाए
यही उनके लिए सच्ची श्रद्धाजंली होगी !!
कौन थे बक्सी जगबंधु ?
बक्सी जगबंधु कि 1804 से पूर्व जीवनी अबतक ठिक से पता नहीँ चल सका है ।
कुछ ऐतिहासिक उनके जीवनकाल को 1780 से 1829 तक सीमित बताते है ।
उन्हे उनके पूर्वपुरुषोँ से वंशानुक्रमे बक्सी उपाधि मिला था ।
खोर्दा राजा के सेनापति दायित्व वहन करते हुए
उन्हे राजा के बाद राज्य मे सबसे शक्तिशाली व्यक्तित्व के रुप मे जाना जाता था ।
उनके पूर्वजोँ को खोर्धा राजा से ररङ्ग किल्ला का
जमिदारी मिला था
वहीँ
उनके परिवार का सेरगड़ तथा बड़म्बा राजपरिवार से वैवाहिक संबन्ध बताता है कि
वे यथा संभव क्षत्रिय खण्डायत बंशज रहे होगेँ ।
बक्सी जगबन्धु बिद्याधर भोइवंश के प्रथमराजा गोविँद विद्याधर के मंत्री दनेइ विद्याधर के अष्टम वंशधर बताए जाते है ।
अंग्रेजी ऐतिहासिक ष्टार्लिगं ने अपने ओड़िशा इतिहास नामक पुस्तक
मे उन्हे रुपवान तेजस्वी वाकपटु शक्तिशाली पुरुष बताया है ।
~घटनाक्रम~
1817 मे अंग्रेजोँ ने घुमुसर क्षेत्र के राजा धनजंय भंज को
एक हत्या के मामले मे फसाकर
गिरफ्तार करलिया !
इसके प्रतिवाद मे 300/400 कंध
जनजाति के योद्धाओँ ने
वाणपुर मे घुसकर सरकारी दफ्तरोँ को जलाया
सरकारी खजाने लुट लिए ।
इन कंध आदिवासीओँ के साथ खोर्द्दा पाइक योद्धा मिलगये
और अंग्रेजोँ के खिलाफ विद्रोह घोषणा करदिया गया ।
। स्वतंत्रता सेनानीओँ के प्रथम शिकार बने
अंग्रेजोँ के शुभचिँतक
चरण पट्टनायक !
पाइकोँ के साथ अंग्रेजोँ का
रगंपड़ा बालकाटि पिपिलि आदि जगहोँ मे संघर्ष छिड़ गया ।
इन क्षेत्रोँ मे अंग्रेजोँ को मुँह कि खानी पड़ी !
पाइक वीर पुरी कि ओर अग्रसर हुए
परंतु यहाँ वो चुक गये
आधुनिक अश्त्रशत्रोँ के साथ पहले से तैयार अंग्रेजोँ के आगे वो हारने लगे ।
अंग्रेजोँ ने पुरी राजा मुकुन्द देव को बंदी बना लिया
उन्हे कटक भेजदिया !
1817 एप्रेल 12 तारिख मे सामरिक कानुन लागु हुआ !
मेजर सार जी मार्टिनडेल नये कमिशनर नियुक्त हुए ।
उसी साल अक्टोवर तक विद्रोह दमन हो गया
परंतु अंग्रेजोँ को चैन न था ।
च्युँकि जगबंधु बिद्याधर ,कृष्णचंद्र भ्रमरवर ,दलबेहेरा तथा उनके अनुचरोँ ने
जंगलोँ मे डेरा बना लिया
और बीच बीच मे सरकारी माल मकान पर हमले होता रहा ।
अंग्रेजोँ ने जगबंधु के परिवारवालोँ को बंदी बनाया
हर मुमकीन कोशिश कि
लेकिन उन्हे तथा उनके मित्रोँ को पकड़ पाने मे नाकामियाब हुए ।
लेकिन धीरे धीरे स्थानीय लोग
मूलतः राजा तथा पूर्व जमिदारोँ ने उनको साहायता देने बंद करदिया
उधर कुछ एक विद्रोहीओँ ने
अंग्रेजोँ द्वारा माफी मिलने तथा पेनसन के एवज मे आत्मसमर्पण कर लिया ।
अन्ततः 27 मई 1825 मे बिमार हालत मे
बक्सी जगबंधु को उनके विद्रोही मित्रोँ द्वारा कटक लाया गया
उन्हे
कटक बक्सी वजार मे अंग्रेजोँ ने गृहवंदी बनाए रखा
और
24 जनवरी 1829
को उनका जीवनदीप बुझगया ।
कुछ डरपोक लोगोँ के लिए
जीता हुआ बाजी हारगये ये योद्धा
हाँ मैँ कहुगाँ अंग्रेज नहीँ ये भीरु लोगोँ ने ही उनको घुट घुट कर मरजाने को मजबुर करदिया
जिनके लिए वो मरना चाहते थे
वह जनता चुप बैठ गयी ।

शनिवार, 13 अगस्त 2016

जागो बन्धनहरा

मूल रचना - कवि अनन्त पट्टनायक
[1912-1987]

नवीनयुग के तुम युवक जागो रे
जागो बन्धनहरा ,
वक्ष रक्त से लोखोँ जीवनोँमे
जलाओ आलोकधारा !! 0

तोड़ दो बन्धन सारे
रोधन करो बंद
लुप्त हो ये जाति उपजाति
खण्डित शत वतन !!

महामानवोँ के शंख ध्वनी से शमन हो दुःख ज्वाला
जागो बन्धनहरा !! 1

मृत्यु के द्वार करो चरण अर्पण
गाओरे अमर गान,
पोछ दो आज
मानव माथा से
संचित अपमान
लांघ बनानी शैल सागर
पोषणकरो तिमिर कारा !! 2


मरु पथे पथे निर्झर गढ़ो
यात्रा करो हे करो
स्पन्दन भर करोड़ोँ हृदय मे
प्रदीप उच्चमे धरो
शंकित हो कंपित प्राणे
चन्द्र तपन तारा !! 3

संधानी !
तुम्हारे संधान पथे
होगेँ काँटे उठाए शिर
सम्मुख तुम्हारे कोहरा रचेगेँ
मोह ममता के नीर (जल) !
भिन्न कर वह तन्द्रा स्पर्श
हसाओ भुवन सारा !! ।4।

विदिर्ण कर दो भूतकाल का जीर्ण जीवन
जागो रे भविष्यकाल !
चूर्ण करे विजय रथ तुम्हारे
पीड़ाओँ के उँचे पर्वत !

टुटपड़े आज बेड़ीआँ सारे
बनाओ विजय माला
जागो बन्धनहरा !!

#बन्धनहरा = #बन्धनमुक्त

***
कवि अनन्त पट्टनायक जी
अपने युवाकालमे जब
इस कविता को Odia मे लिखा था
उनदिनोँ छोटे छोटे देशोँ मे बँटा भारत पराधीन था ।
कवि अनन्त पट्टनायक जी का जन्म खोर्दा जिला चणाहाट गाँव मे 1912 साल मे हुआ था !

उन्हे उनके #अवान्तर कविता पुस्तक के लिए केन्द्र साहित्य एकादमी पुरस्कार मिला है ।
उनकी प्रमुख रचनाओँ मे रक्तशिखा ,छाई र छिटा,अलोड़ालोड़ा ,अवान्तर तथा किँचित आदि पाठकोँ मे सर्वाधिक प्रसिद्ध हुए !

जागो बन्धनहरा फिलहाल
Odisha के दशवी मातृभाषा साहित्य किताव मे स्थानीत हुआ है
आशा है आपको इस कविता कि अनुवादित अंश पसंद आवेगा

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

उठो कंकाल ଉଠ କଙ୍କାଳ [[ଗୋଦାବରୀଶ ମହାପାତ୍ର]]

ଦୁର୍ଗମ ଗିରି ଦୁର୍ଗ ପ୍ରାଚୀର ଜୀର୍ଣ୍ଣ ଦୁଆରେ ବସି,
ଡାକେ ତାନ୍ତ୍ରିକ ମନ୍ତ୍ର ସାଧନେ ଜାଗ୍ରତ ପୁରବାସୀ !
दुर्गम गिरि दुर्ग प्राचीर जीर्ण द्वारे बैठे
कहे तान्त्रिक मंत्र साधने जाग्रत पुरवासी !

ପୃଥ୍ବୀ ବିଦାରି ବାରବାଟୀ ମଡ଼ା ଉଠ ଉଠ ଚଞ୍ଚଳ,
ଖୋରଧାର ଶତ ସରଦାର ଶିର କର ଉନ୍ନତତର !
पृथ्वी विदारि बारबाटी लाश उठो उठे चंचल
खोरधाके शत सरदार शिर करो उन्नततर !
ଉଠ କଙ୍କାଳ, ଛିଡ଼ୁ ଶୃଙ୍ଖଳ,ଜାଗ ଦୁର୍ବଳ ଆଜି,
ଉଠୁ ଗତ ଗୌରବ, ହୃତ ଗୌରବ, ମୃତ ଗୌରବ ରାଜି୤
उठो कंकाल छिड़ु शृखंल जाग दुर्वल आजि
उठे गत गौरव हृत गौरव मृत गौरव राजि
ମେଘାସନ ତଳ ମନ୍ଦ୍ର-ନିନାଦ ବାଜେ ଫୁଲଝର ବୁକେ
ରାଇବଣିଆର ରଣ ସଙ୍ଗୀତ ଗଞ୍ଜାମ ପଥେ ଡାକେ୤
मेघासन तल मन्द्र निदान बाजे फुलझर बुके
राइबणिआर रण संगीत गंजाम पथे डाके
ସିଂଭୂମ କହେ ମରଣ ଦୁଆରେ ବିଶାଖାପାଟଣା ଚାହିଁ
ସନ୍ତାନ ମୁଖେ, ଶମଶାନ ବୁକେ ପ୍ରାଣ ସଙ୍କେତ ନାହିଁ୤
सिँभूम कहे मरण द्वारे विशाखापाटना चाहिँ
सन्तान मुखे शमशान बुके प्राण संकेत नहीँ
ଉଠ ଦୁର୍ବଳ, ଜାଗ କଙ୍କାଳ, ଛିଡ଼ୁ ଶୃଙ୍ଖଳ ଆଜି
ଉଠୁ ଗତ ଗୌରବ, ହୃତ ଗୌରବ, ମୃତ ଗୌରବ ରାଜି୤
उठो दुर्वल जाग कंकाल छिड़ु शृखंल आजि
उठे गत गौरव हृत गौरव मृत गौरव राजि
ଚିର ବନ୍ଦିତା ବନ୍ଦିନୀ ମାଆ ବନ୍ଧନ ଫେଇବାରେ,
ସମ୍ବଲପୁର ସମ୍ବଳ ବୀର ଦମ୍ଭ କି ନାହିଁ ଧରେ ?
चिर वन्दिता वन्दिना माता
बन्धन खोलने के लिए
संबलपुर संबल वीर दम्ब कि उनमेँ नहीँ ?

ଗଙ୍ଗା ଧୋଇଲା ଚିକୁର ଯାହାର, କୃଷ୍ଣା ଚରଣ ତଳ
ଶମଶାନ ଆଜି ମଡ଼ାଦେଶ ଆଜି, ଏହି ସେ ଉତ୍କଳ୤
गंगा धोति थी चिकुर जिसकी
कृष्णा चरण तल
श्मशान आज मड़ा देश आज
यही वह उत्कल
ଜାଗ ଦୁର୍ବଳ, ଛିଡ଼ୁ ଶୃଙ୍ଖଳ, ଉଠ କଙ୍କାଳ ଆଜି
ଉଠୁ ଗତ ଗୌରବ, ହୃତ ଗୌରବ, ମୃତ ଗୌରବ ରାଜି୤
जाग दुर्वल टुटे शृखंल
उठो कंकाल आजि
उठे गत गौरव हृत गौरव मृत गौरव राजि
ନିଜାମ ଭୁବନେ କଳବର୍ଗର ଅର୍ଗଳ ଏଡ଼ି ଦିନେ
ଗଜପତି ବୀର ‘ବେରାର’ ଭେଦିଲା ଜୟ ଗୌରବ ଗାନେ ୤
निजम भुवने कलवर्गोँ के अर्गल भेदि एकदिन
गजपति वीर वेरार भेदिला जय गौरव गाने
ଦୁର୍ବାର ଗଡ଼, ‘ଦେବର କୋଣ୍ଡା’ କହେ ଆଜି ସେହି କଥା
ବାରବାଟୀ ବୀର ଦେଇଥିଲା ତାର ରଣେ ଉନ୍ନତ ମଥା୤
दुर्वार गड़ देवर कोण्डा गाए आज वही गाथा
बारबाटी बीर दिए थे उन्नत उनके मथा

ଛିଡ଼ୁ ଶୃଙ୍ଖଳ, ଜାଗ କଙ୍କାଳ, ଉଠ ଦୁର୍ବାର ଆଜି,
ଉଠୁ ଗତ ଗୌରବ, ହୃତ ଗୌରବ, ମୃତ ଗୌରବ ରାଜି୤
टुटे शृखंल जागो कंकाल उठो दुर्वार आजि
उठे गत गौरव हृत गौरव मृत गौरव राजि
ଖଣ୍ଡାକୁଶଳ ଖଣ୍ଡାୟତର ଦୁର୍ବାର କରବାଳେ
ଅଜେୟ ବଙ୍ଗ-ବାହିନୀ ଶୋଇଲେ ‘ଶତଗଡ଼’ ପ୍ରାନ୍ତରେ
खण्डाकुशल खण्डायतोँ के दूर्वार करवाले
अजेय बंग वाहिनी शोएथे शतगड़ प्रान्तरे
ଗଉଡ଼ ଭୁବନ ହେଲା ପଦାନତ ମଗଧ ପାଇଲା ଲୀନ,
ପ୍ରତାପୀ ପୁଷ୍ପମିତ୍ର ହଟିଲା ଦେଇ ଉତ୍କଳେ ରଣ୤
गौड़ भुवन हुआ पदानत मगध सूर्य हुआ लीन
प्रतापी पुष्पमित्र हटा लढ़ कर उत्कलमे रण
ଜାଗ କଙ୍କାଳ, ଜାଗ କଙ୍କାଳ,ଜାଗ କଙ୍କାଳ ଆଜି
ଉଠୁ ଗତ ଗୌରବ, ହୃତ ଗୌରବ, ମୃତ ଗୌରବ ରାଜି୤
जागो कंकाल जागो कंकाल जागो कंकाल आजि
उठे गत गौरव हृत गौरव मृत गौरव राजि

କଥା କହ କଥା କହ କଙ୍କାଳ! ସେ କେତେ ଯୁଗର କଥା,
ହିମାଚଳ ତଳେ ଟେକିଥିଲା ଯେବେ ଏ ଜାତିର ବୀର ମଥା୤
कथा कहो कथा कहो कंकाल !
वो कितने युग कि कथा
हिमाचल निचे जब
खड़े थे ये जाति वीर उठाए अपने माथा
ବିଜୟୀ ‘ବିଜୟ ନଗର’ ମାଗିଲା ଶରଶ ଚରଣ ତଳେ,
‘ବାହାମନୀ’ ପତି ଯବନ, ଶମନ କାତରେ ଲୁଚିଲା ଘରେ୤
विजयी विजय नगर मागेँ थे शरण चरण तेरे
बाहामनी पति यवन
राजा छिपा या घर मे एक ही हुँकार से तेरे
ଉଠ କଙ୍କାଳ, ଉଠ ଦୁର୍ବଳ, ଛିଡ଼ୁ ଶୃଙ୍ଖଳ ଆଜି
ଉଠୁ ଗତ ଗୌରବ, ହୃତ ଗୌରବ, ମୃତ ଗୌରବ ରାଜି୤
उठो कंकाल उठो दूर्वल
टुटे शृखंल आजि
उठे गत गौरव हृत गौरव मृत गौरव राजि
ହାଡ଼ ପାଶୁ ଆଜି ଭାଷା ବହି ଆସୁ, ଫୁଟୁ ମଡ଼ା ମୁଖେ ହସ
ଭଗ୍ନ ଏ ଗଡ଼ ମନ୍ଦିରେ ଶୁଭୁ ଦୁନ୍ଦୁଭି ଅହର୍ନିଶ୤
हड्डी के पास से भाषा बह आए
लाश उष्टे फुटे हस
भग्न ए गड़ मन्दिरे सुनाई
दे फिर दुन्दुभी अहर्निश
ଶମଶାନ ଧୂଳି ଅଞ୍ଜଳି ଭରି ନିଅ ପୁରବାସୀ ଜନ;
ଲକ୍ଷ ଜୀବନ ସାକ୍ଷ୍ୟ ଦେବ ସେ ଗୌରବେ ମହୀୟାନ୤
श्मशान धूल अञ्जुल भर लो पुरवासी जन;
लक्ष जीवन साक्ष्य देगा वो गौरवे महीयान
ଉଠ କଙ୍କାଳ, ଭେଦି ମହାକାଳ,ଜାଗ ଦୁର୍ବଳ ଆଜି
ଉଠୁ ଗତ ଗୌରବ, ହୃତ ଗୌରବ, ମୃତ ଗୌରବ ରାଜି୤
उठो कंकाल भेदी महाकाल
जाग दूर्वल आजि
उठे गत गौरव हृत गौरव मृत गौरव राजि
ବେଳନାହିଁ, ବେଳ ନାହିଁ, କଙ୍କାଳ ! ଟେକ ଚଞ୍ଚଳ ମଥା
ବିଦାରି ଉପଳ ନିର୍ମଳ ତବ ପିଞ୍ଜରୁ ଉଠୁ ବ୍ୟଥା,
वक्त नहीँ वक्त नहीँ कंकाल !
उठाओ चचंल माथा
विदारि उपल निर्मल तव
पिजंरु उठे व्यथा !
ବାଜିଉଠୁ ବାରେ ମରଣ-ବିଜୟୀ ବଂଶୀ ସେ ବୁକୁତଳେ,
ଧୂର୍ଜଟି ଜଟାଜୁଟ କମ୍ପାଇ ଯୌବନ କୁତୂହଳେ୤
वज उठे अब मरण विजयी वंशी वही हूदयस्थले
धूर्जटि जटाजुट कम्पाइ यौवन कौतुहले
ଉଠ କଙ୍କାଳ, ଉଠ ଦୁର୍ବଳ, ଜାଗ କଙ୍କାଳ ଆଜି
ଉଠୁ ଗତ ଗୌରବ, ହୃତ ଗୌରବ, ମୃତ ଗୌରବ ରାଜି୤
उठो कंकाल उठो दुर्वल जागो कंकाल आजि
उठे गत गौरव हृत गौरव मृत गौरव राजि

ଉଠ କଙ୍କାଳ
– ଗୋଦାବରୀଶ ମହାପାତ୍ର
मूल रचना गोदावरीश महापात्र

अमृतमय

अमृतमय
–स्वभाव कवि गंगाधर मेहेर [ସ୍ବଭାବ କବି ଗଙ୍ଗାଧର ମେହେର]

नव विकशित पुष्प गंध
नव सरस कविता छन्द
नव विहग मधुर तान
शिशु सरल तरल गान
नव प्रफुल्ल कमल कानन
नव सुकुमार शिशु आनन्द
अमृतमय अमृत रय
भसाए लेता है जीवन

धीर चकित शीतल वात
चिर ललित कुमुद नाथ
क्षीर धवल चंद्रिका जाल
नीर दीन दक्ष घनमाल
मृदु मधुर आलोक उषार
नव पल्लव पतित तुषार
अमृत मय अमृत रय
निम्मजित दिए संसार

चिक मिक करते तारा
टप टप जलधर धारा
तमनाशने धावित धष्ठि
तम मुक्त अवनी हृष्ट
गिरिगर्भ प्रसूत निर्झर
दूर लम्फित प्रपात झर्झर
अमृतमय अमृतरय
जीवन कर रहा जर्जर

मैँ तो अमृत सागर विन्दु
नभे उठा था त्यागे सिन्धु
गिरा मिला फिर अमृत धारे
गति कर रहा वह अकुपारे
पथ मे शुखा गर पाप ताप से
हो शिशिर फिर पतित होना है धरा मे
अमृतमय अमृतरय
मुझे मिलना ही एक दिन सागर मे

Origional odia poem

ଅମୃତମୟ
– ସ୍ବଭାବ କବି ଗଙ୍ଗାଧର ମେହେର
ନବ ବିକଶିତ ଫୁଲ ଗନ୍ଧ
ନବ ସରସ କବିତା ଛନ୍ଦ
ବନ ବିହଗ ମଧୁର ତାନ
ଶିଶୁ ସରଳ ତରଳ ଗାନ
ନବ ପ୍ରଫୁଲ୍ଲ କମଳ କାନନ
ନବ ସୁକୁମାର ଶିଶୁ ଆନନ୍ଦ
ଅମୃତମୟ ଅମୃତ ରୟ
ଭସାଇ ନେଉଛି ଜୀବନ୤
ଧୀର ଚକିତ ଶୀତଳ ବାତ
ଚିର ଲଳିତ କୁମୁଦ ନାଥ
କ୍ଷୀର ଧବଳ ଚନ୍ଦ୍ରିକା ଜାଲ
ନୀର ଦାନ ଦକ୍ଷ ଘନମାଳ
ମୃଦୁ ମଧୁର ଆଲୋକ ଉଷାର
ନବ ପଲ୍ଲବ ପତିତ ତୁଷାର
ଅମୃତମୟ ଅମୃତ ରୟ
ମଜ୍ଜାଇ ଦେଉଛି ସଂସାର୤
ମିଟି ମିଟି ଜକ ଜକ ତାରା
ଟପ ଟପ ଜଳଧର ଧାରା
ତମନାଶନେ ଧାବିତ ଧଷ୍ଣି
ତମ ମୁକତ ଅବନୀ ହୃଷ୍ଟ
ଗିରିଗରଭ ପ୍ରସୂତ ନିର୍ଝର
ଦୂର ଲମ୍ଫିତ ପ୍ରପାତ ଝର୍ଝର
ଅମୃତମୟ ଅମୃତରୟ
ଜୀବନ କରୁଛି ଜର୍ଜର୤
ମୁଁ ତ ଅମୃତ ସାଗର ବିନ୍ଦୁ
ନଭେ ଉଠିଥିଲି ତେଜି ସିନ୍ଧୁ
ଖସି ମିଶିଛି ଅମୃତ ଧାରେ
ଗତି କରୁଛି ସେ ଅକୂପାରେ
ପଥେ ଶୁଖିଗଲେ ପାପ ତାପରେ
ହୋଇ ଶିଶିର ଖସିବି ତା ପରେ
ଅମୃତମୟ ଅମୃତରୟ
ସହିତ ମିଶିବି ସାଗରେ୤

बुधवार, 10 अगस्त 2016

अमिनूल इस्लाम और ओड़िशा कि कोहिनूर प्रेस

ओड़िशा मे कोहिनूर प्रेस उतना हि फैमस है जितना कोहिनूर हीरा दुनियामे !
ओड़िशा मे ज्यादातर पुराण शास्त्र ज्यौतिष पंजिका कोहिनूर प्रेस मे Odia भाषामे छपते है ।
कोहिनूर प्रेस के संस्थापक
अमिनूल ईसलाम् ने
आजसे आठदशकोँ पहले इस प्रेस कि निँव रखी थी !
कोहिनूर प्रेस कि राशिफल व पंजिका को जगन्नाथ मंदिर मुक्तिमंडप द्वारा स्विकृति प्रदान कि गई है ।
अमिनूलजी ने मुसलमान हो कै भी ना सिर्फ अपने प्रेस के जरीये हिन्दु पोथी पुराण तथा ग्रंथ प्रकाशन किया आप कई संस्कृत काव्य ग्रंथोँ को ओड़िआभाषा मे भावानुवादक व नवग्रंथ रचयिता भि रहे !
1928 सालमे, अमिनूल कटक आए और अपनी जीजाजी के संग मिलकर
मूद्रण व्यवसाय सिखे और फिर कटक मे ही कोहिनूर प्रेस व कोहिनूर प्रेस पुस्तक भंडार कि स्थापना किए थे ।
व्रिटिश शासन काल मे
प्राँत के स्वतंत्रता सेनानी यहीँ पोस्टर होर्डिगं छपवाते थे
देशात्मवोधक किताबेँ छाँपने के कारण
कईबार कोहिनूर प्रेस मे छापे ड़ाले तलाशी लि गई
और एक आद बार पकड़े भी गये ।
अमिनूल साहब को हिन्दु पोथी पुराण प्रति जितना प्रगाढ़ श्रद्धा व आदरभाव था
उतना ही ज्योतिष शास्त्रोँ पर यकिन !
उन्होने तय किया कि
वो एक ऐसे पंजिका प्रकाशित करवाएगेँ
जो हर तरह से निर्भुल ,सटिक गणना करता हो ।
इससे पहले Odisha मे अरुणोदय प्रेस पंजिका नामसे एक ही फलित ज्योतिष पोथि प्रकाशित होता था !
अमिनूल जी ने प्रख्यात विद्वान पठाणि सामन्त के वंशज...श्री गदाधर सिँह सामन्त ,
लिँगराज खड़िरत्न परिवार वंशज...पंडित श्री हरिहर खडिरत्न जी के सामुहिक सहायता से
एक पंजिका का पांडुलिपि प्रस्तुत किए थे । सामान्य संशोधन पश्चात
पुरी मुक्ति मंडप सभा से इस नूतन पंजिका को स्विकृति मिल गया था
और इस प्रकार 1935 मे कोहिनूर पंजिका का जन्म हुआ ।
अमिनूल जी ने अपने जीवनकाल मे अनेकोँ ग्रथं लिखे
उनके द्वारा कई हिन्दु ग्रंथोँ का पुनः मुद्रण किया गया !
अमिनूल इस्लाम एक सच्चे देशभक्त स्वतंत्रता सेनानी थे ।
उन्होने गोपबंधु दास हरेकृष्ण महताव नवकृष्ण चौधुरी भागिरथी महापात्र आदि दिग्गज
उत्कलीय मनीषिओँ के साथ मिल कर देश मातृका के लिए काम किया था ।
~पुरस्कार तथा सम्मान~
अमिनूल इस्लाम जी को बिजु पट्टनायक जी के शासनकाल मे पद्मकेशरी उपाधी मिला था
वहीँ जानकी वल्लभपट्टनायाक द्वारा चंद्रशेखर उपाधी प्राप्त हुए ।
1985 साल मे श्रीपुरुषोत्तम पुरी जगन्नाथ धाम श्रीमंदिर मे उनका श्राद्ध आयोजन हुआ था ।
किसी इस्लामीक व्यक्ति का श्री मंदिर मे श्राद्ध होना विरल घटना होने के साथ साथ सम्मानजनक भी है ही ।

बुधवार, 3 अगस्त 2016

मातृभूमि

जिस काल बालक
भ्रम सकता है
घर पड़ोशीओँ का
उस काल जान जाता है
अन्य घर सब है
उसके संगी बालकोँ का
फिर जब वह
अपने पड़ा [वार्ड] से
पासवाले पड़ा मे है जाता
उस समय उस पड़ा को भी वो अपना ही है मानता ।
अन्य गाँव मेँ जब जाए वह
अपने गाँव से हो दूर,
उस काल समझता है
जिस गाँव मे घर है उसका
वह गाँव ही है उनका !
अपने गाँव का नदी तालाब
बगिचा आदि सकल,
स्वयं का ही कहता है
और समझता है इन्हे दुसरोँ से बहतर !
बड़ा होकर वह जब जाता
अन्य राज्योँ मे करने भ्रमण
वखानता है वहाँ अपने राजा ,राज्य -लोगोँ का श्रेष्ठ सभी गुण
हाती घोड़ा से लेकर
भेड़ बकरी सभी उसके राज्य के उत्तम
सकल सुख ले रहा आकार उसके ही राज्य मेँ केबल
उससे भी उच्च हो कोई कभी जब करे देशान्तर
स्वर्ग से भी उँचा लगे उसे
स्वदेश मेँ उसका घर
ज्ञानबल से
जब जनाता है
सभीओँ के पिता
है जगतपति
सहोदर ज्ञान करे
मानवसमाजके प्रति !।
तब वह जानता है
जो जितना करता है दुजोँ का उपकार
विश्वपतिके विश्वगृहमे
वह उतना ही योग्य कुमर [पुत्र]
इसी प्रकार
राज्य देश विश्व का ये जो है कथा
मानव जीवन मे प्रतीत होता है ,
दर्शित होता है सर्वथा
"मातृभूमि मातृभाषा से ममता
जिसके हुदय मे जन्मा नहीँ
उसको भी यदि ज्ञानी गणोँ मे गिनेगेँ
अज्ञानी रहेगेँ नहीँ"
*****[[स्वभाव कवि गंगाधर मेहर कि #अर्घ्यथाली काव्य ग्रंथ से
मातृभुमि कविता का हिन्दी अनुवाद ]]
कविता कि " चिन्हित अन्तिम दो लाइनेँ
ओड़िशा मे बच्चा बच्चा जानता है !!!

बारबाटी

उन्निशवीँ सदी ख्रिस्त अद्ध अन्तमे
विँश सदी अद्ध का प्रवेश हुआ जगतमे ।.....
अनन्त समय - सागर उदरमे
शत वर्ष कैसे बीता
पता न चला दृत क्षणे ।....
कितने हि थे
मनमे कामना
अपूर्ण ही रहा
न है कोई आस्वासना ।
निरपेक्ष काल न रहा
न रुका एक क्षण ।
भवमेँ संभवतः
प्रिय उसे नहीँ कोई जन ।
कितने ही दूःख दर्द अपार
कषण न हुए अन्त
काल कर रहा
सबका रक्त शोषण ।
काल न जाने
दया माया कुछ भी
करता रहा है चलते हुए
अपने कार्योँ का अन्त !
आओ नव युग तुम !
नित नूतन वर्ष
नव दिवसमे
ले कर के अनेकोँ हर्ष !!
विभु-स्वर्गधामसे
लाए हो सुख समाचार
व्याकुल संसारमे
करो तुम वह प्रचार !
वो जिनका जीवन जाने को
थे
उनमे हो तव दया से
नव प्राण संचार !
विगत शताब्दी
घोर ताप से जला
बताना तो ज़रा
सरग का शान्ति
कैसा होता है भला !!
नन्दन कानन का
नव पुष्प संभार
दूषित धरणी धाममे
हो परकाश ।
दिव्य भाव भर दो
हमरे पिण्ड मे तुम ही
पवित्र उत्साह से
मत्त हो हम सभी प्राणी ।
दया हो हम पर
एक कृपा और करना
भारत का पूर्व यश
संग तुम ले आना ।
भवरगंमे रगंते थे वे महाराज
आहा !!! दीनहिन भिखारी है
वे सब आज ..
करो देख ये सब
तुम हम पर करुणा
नव तेजमे एक बार हो
विकशित पुराना !
हे काल !
तुम सर्व शक्तिमन्त !
कोइ न जान पावे
तुमरा आदी अन्त ।
कौन है ये माँप लेगा
तुम्हारा कितना है बल !
होता च्युँकि जलमे स्थल
स्थलमे जल !
यह जो सम्मुख मे दिखरहा
बारबाटी का मैदान !!
टुटा है यहाँ लाखोँ ही गदा
रुके है धड़कन
कभी था ये वीर विहार प्रागंण
भ्रमते है वहीँ आज श्वान शिवागण ।
शुभ शैल सम विशाल सौध होता था
,सीर उठाए कभी गगन को छुँता था
गम्भीर गौरवमय है उसका इतिहास
सुनाता था वो शत्रृ को महिमा थमजाता था तब उसका स्वास
आहा आज ये धरा को देख श्रीहीन
विदारीत हो जाते ये मेरे कोमल हृदय
था यहाँ कभी शस्त्रागार अनेकानेक
ये अब बना है दुर्वादल
का मैदान
कहाँ गये वो कमाण अशनी शब्द
सुन शत्रृ जिसे हो जाते थे
स्तब्ध
वो वीरोँ को जोश दिलानेवाले वाजेगाजे कहाँ है
न दिख रही उद्यम ही
जाति के लिये हमे कहीँ
हे काल !
तुममे एक दिन सभी समाजाते
कहीँ इसलिए उत्कल आज दीनहीन तो नहीँ !
हे काल !
तुम्हारी अटल आदेशसे
ये कैसा दूर्गति उत्कल देश का
हे सती स्रोतस्वती चित्रोत्पला [mahanadi]
तेरे तटमे वसा उत्कल था
सुजला सुफला
पिई ते थे हम तेरा सुधा सम पय [जल]
बढ़ते थे तेरे ही तटमे
वीर शूरचय !
कैसे देखलिया तुने अपने ही पुत्रोँ का निधन ?
देखी और तुझमे अभी भी शेष है जीवन ?
बारबाटी जब हुआ श्रीहीन
कराल कल्होले किए घोर नाद
रिपुकूल हृदयमेँ आतकं प्रमाद
क्युँ न जन्मा तुझसे हे जननी !
थम कैसे गया तेरा वो धमनी ।
धरकर प्रलय भीम रणरुप
शत्रुओँ को करती जग से निःशेष
हाँ शायद तब ऐसा कुछ होता
बारबाटी तेरे जलमे छिपजाता !
उस युगमे स्तम्भित हुए तेरी गति
भला तु कैसे तोड़पाती समय नियति !
महावली धन्य धन्य तुम काल ।
हे कौन तोड़ेगा तुम्हारे तीक्ष्ण करवाल !
था यदि कुछ उत्कल का दोष
दोष अनुमतमे किए हो दोष
हुआ है शास्ति कषण अनेक
न करो हमपर तुम और अत्याचार।
अबसे करुणा तुमसे चाहते है
नव युगमे हो उत्कल का हीत ।
उत्कल तनये दो नव बल
उत्कल पादपे भरो नव फल
उत्कल सरिते पवित्र जीवन
उत्कल कानने स्वर्गीय सुमन
उत्कल आकाशे नव यशः रवि
उत्कल प्रकृति ले लेँ नव छवि
[
पण्डित उत्कलमणी गोपबंधु दास के ओड़िआ कविता Baarobaati का हिन्दी अनुवाद ]

मंगलवार, 2 अगस्त 2016

कथा भक्त सालवेग कि.......

1500 A.C तक मुस्लिम पुरे भारत मेँ फैल गये थे ।
हिन्दु कन्या ओँ को जबरन उठा लेते और सादी करते ।
ऐसे ही एक ब्राम्हण कन्या के साथ हुआ ।

पर उसने अपने धर्म से आस्ता वनाये रखा ।

उसका बेटा मुस्लीम सेनापती बन गया ।
एक दिन वो युध्ध मेँ बुरी तरह घायल हुआ ।
बिमार पुत्र को उस मा ने इतना कहा पुत्र ईस भयानक आपदा से अब तुम्हे कृष्णही बचा सकते है । उनके सरण मेँ जा । वो तुम्हे इस दुख से मुक्त करेगेँ । मा के वात को मानतेहुए उसने पुरी रात कृष्ण नाम जाप किया । सुबह वो क्या देखता है उसके सारेघाऊ भर चुके है अब वो बिलकुल स्वस्थ है । तब उसके माँ ने उसे कहा की वो जगन्नाथ पुरी जा कर भगवान के दर्शन करेँ । वो जगन्नाथपुरी गया । और वाहाँ वो भगवान भक्ति मेँ ऐसा डुबा की फिर कभी लौट ना सका । वो और कोइ नहीँ भक्त सालवेग है ।
वो उडिशा के रसखान है ।

उनके लिखीँ भजन इतने भावमय है की आप खुद को भक्ति रस मेँ डुबा पायेगेँ ।

उनके समाधि जगन्नाथ पुरी मेँ कभी पुरी जायेँ तो जरुर इस भक्त की दर्शन करेँ ।।।।।।

ॐ जय जगन्नाथ ।।।।।।

गजपति जिला........

अंग्रेजोँ ने 1767-68 मे दक्षिण ओड़िशा
के पारलाखेमुण्डि

(बर्तमान के गंजाम गजपति जिल्ला )

राज्य पर हमला करदिया
हमले के जवाब मे स्थानीय राजा
# जगन्नाथ_नारायण_देव तथा उनके अधिनस्त जमिदार तथा # विशोइ # दोरा
# दोरत्नम् सर्द्दारोँ ने अंग्रेजोँ का प्रतिरोध किया ।

परंतु पारलाखेमुण्डि राजा
1768 मे अंग्रेज # कर्णेल_पिच् के हातोँ
# जेलमुर मे परास्त हुए ।

उन्होने अंग्रेजोँ के खिलाफ
कटक के तत्कालिन # मराठा सरकार से सहायता माँगा था
लेकिन मराठीओ ने सामरिक सहायता देने से साफ मना करदिया था 
च्युँकि उन्हे युद्ध न करने के लिये अंग्रेजोँ से तगड़ा रकम् मिले थे ।

युद्ध मे हारने के बाद अंग्रेज राजा जगन्नाथ नारायण को मारनेवाले थे के
तभी उनके कुछ आदवासी विशोइ सर्द्दारोँ ने उन्हे सकुशल बचालिया....

अब राजा और उनके समर्थक अनुचर वागी बनेँ
1768 से 1770 तक राजा जगन्नाथ नारायण ने
अंग्रेजोँ को उनके पारलाखेमुण्डि राज्य मे खजाना वसुलने नहीँ दिया

इससे व्रिटिश इष्ट इंडिया के आला अधिकारी वेहद खफ़ा हो गये और विद्रोह कुचलने के लिये अपने सबसे ताकतवर रेजिमेँट भेजदिया था
राजा जगन्नाथ नारायण देव
मरते दमतक अंग्रेजोँ से लढ़ते रहे
और अंततः वीरगति को प्राप्त हुए ।

~~~उनके मृत्यु पश्चात
अंग्रेजोँ ने राजपुत्र
# गजपति_देव को पारलाखेमुण्डी का नूतनराजा के रुपमे स्वीकृति दिया !

हालाँकि गजपति देव स्वयं को
स्वतंत्र समझते थे
परंतु अंग्रेजो ने जब उनके राजकार्य मे अपना हस्तक्षेप किया
दोनो पक्षोँ मे संबन्ध तिक्त हुए ।

1773 मे जगन्नाथ नारायण देव के पुत्र गजपति देव ने अंग्रेजोँ के खिलाफ अपने समर्थकोँ के साथ मिलकर विद्रोह किया
था परंतु हारकर अंग्रेजोँ के हातोँ 1774 मे वंदी बने ।

गजपति देव को अंग्रेजोँ ने विशाखापट्टनम् मे वंदी बनाए
रखा ।

अगले 6 वर्षोँ मे
यानी 1774 से 1780 तक
समुचे दक्षिण ओड़िशा क्षेत्रमे
विशोइ और दोरा आदिवासी संप्रदाय के सर्द्दारोँ ने अंग्रेजोँ का
निन्द हराम करदिया था
अंततः 1780 मे अंग्रेजोँ को मजबुरन गजपति देव को कारागार से मुक्त करना पड़ा था
और इसतरह से गजपतिदेव को पुनः पारलाखेमुण्डि की राजगदी हासिल हुई थी ।

हालाकिँ अंग्रेजोँ के खिलाफ
आदवासीओँ ने विद्रोह जारी रखा
1799 मे अंग्रेजोँ ने एक आदिवासी नेता को मारदिया
जिससे समुचे क्षेत्र मे विद्रोह हुए ।

राजा गजपतिदेव ने भी विद्रोहीओँ का साथ दिया
जिससे अंग्रेजोँ ने गजपति देव और उनके पुत्रोँ को # मुसलिपट्टनम् मे पुनः वंदी बना दिया था !

1800 से 1803 तक पारलाखेमुण्डि मे अंग्रेजोँ ने इतना खुन वाहाए कि मिट्टी बंजर हो गयी
और
लगातार तिन वर्षोँतक आए अकाल से स्थानीय प्रजा देश छोड़ जाती रही
और उधर राजपरिवार निश्वः हो गया.....

इसतरह से एक लम्बी उतारचढ़ाव वाले नाटकीय घटनाक्रम से गुजरते हुए
अंग्रेज
पारलाखेमुण्डि का विद्रोह दमन
कर पाए थे ।

आगे चलकर
1830 मे इस क्षेत्रमे पुनः विद्रोह हुए
इसबार विद्रोहीओँ के शिकार बने कंपानी मेनेजर जमिदार पद्मनाभ देव !

पद्मनाभ देव अंग्रेजोँ के हातोँ बिकचुका था
उसने इस क्षेत्र के प्रजाओँ पर वर्षोँ अत्याचार किया

पर वो कहते है न

एक दिन पाप का घड़ा भर ही जाता है

1830 मे विद्रोहीओँ ने जमिदार के घर व कचेरी को आग के हवाले करदिया

1832 तक विद्रोही अंग्रेजोँ को मुँहतोड़ जवाब देते रहे

उसी साल मद्रास सरकार द्वारा जर्ज एडवार्ड रसेल को
विद्रोह दमन के लिये भेजागया !

Edward Russel ने अपने सेना को अर्डर दे रखा था
जहाँ भी हतियारधारी योद्धा दिखे जान से मार दो !

कोई दया नहीँ कोई क्षमा नहीँ ।

पहले पहल वो नाकाम् रहा
और तब उसने अपना गुस्सा आमजनता पर उतारा....

हजारोँ लोग कत्लेआम् हुए
लाखोँ वेघर हुए
इससे कुछ एक विशोइ दोरा सर्द्दारोँ ने आत्म समर्पण करदिया व ज्यादातर विद्रोही उत्तरओड़िशा चलेगए !!

अंग्रेजोँ को लगा उन्होने विद्रोह दमन करलिया
अनगिनत लाशोँ के एवज् पर ही सही ।

1856-57 मे सिपाही विद्रोह के समर्थनमे यहाँ पुनः विद्रोह हुए

इस विद्रोह के कर्णधार रहे राधाकृष्ण दण्डसेना
विद्रोहीओँ ने अंग्रेजोँ को सहायता करनेवाले
देशद्रोही जातिद्रोहीओँ के घर जलादिए और लुटपाट मचाया ।

तब इस विद्रोह को दमन करने के लिये Captain wilson ने शवरोँ के परिवारोँ को निशाना बनाया

अनेकानेक शवर गाँव जलादिए गये
अपने ही लोगोँ पर हो रहे
बलात्कार हत्या और अत्याचार का विभत्स रुप
देख विद्रोह और भड़का
इसबार विद्रोहीओँ ने अंग्रेजोँ का सिधा मुकावला किया
लेकिन हारगये ।

राधाकृष्ण दण्डसेना और उनके कुछ विद्रोही साथी को अंग्रेजोँ ने फाँसी पर चढ़ा दिआ था .....

च्युँकि जगन्नाथ नारायण देव के पुत्र गजपति देव ने अंग्रेजोँ के खिलाफ लम्बी लढ़ाई लढ़ी थी
अविभक्त गंजाम जिल्ला से अलग होने पर इस पारलाखेमुण्डि क्षेत्र अंतर्गत
भूमिखंड का नाम गजपति रखा गया......

गुरुवार, 14 जुलाई 2016

-श्रीजगन्नाथ धार्मिक नामार्थ-

श्री- लक्ष्मी वैभव ।
प्रभु आप जगन्मय जौति स्वरुप
,सर्व प्रकाश्य आप हीँ मेरे पथ पदर्शक !
ज– ज अर्थात् उत्पत्ति विष्णु पितामाता तेजः आदि ।
समस्त सृष्ठि के कारण आप प्रभु
जनार्दन
आप ही से सर्वदेवताओँ कि सृष्ठि !
प्रभु आप वेद मन्त्र योग तथा ज्ञान के आदि उत्पत्तिस्थल !
आप हीँ आराध्य देवता श्रीविष्णु
, हम समस्त प्राणीओँ के पितामाता !
ग– ग अर्थ गमन स्वर्ग गुरु आदि !
हे प्रभु आप अनन्त , सागर से भी गहरे है
गुलाब से भी कहीँ अधिक कोमल आपका हृदय । प्रभु आप हम सभी के गुरु
हमारे आश्रयदाता ज्ञानदाता ।
न्ना(न)– न अर्थात् निराकार निर्विकार निविनाशी स्थानातीत निर्माया निरीह निर्मल !
निराकार निर्गुण नित्य अविनाशी परमात्मा परमेश्वर के सगुण साकार रुप हीँ श्रीजगन्नाथ ।
थ– थ शब्द का अर्थ पर्वत,भयत्राता ,मंगल ,रक्षण आदि !
प्रभु ! आप अजेय हो अनाथोँ के नाथ भयनाशक सर्व मंगलकारक ।
बाढ़ ,चक्रवात ,विधर्मी आक्रमणोँ
तथा
मेरे अपने भाईओँ के षडयन्त्रोँ से हमारा रक्षा करनेवाले आप
सर्वजनमोही परमात्मा हो
आप ही हमारे एकता के प्रतीक हो प्रभु....

वर्ष के 12 माह मे श्री जगन्नाथ जी के 12 यात्राएँ !

1.वैशाख शुक्ल त्रुतीया अर्थात् अक्षय त्रृतीया मे ‪#‎ चंदनयात्रा‬
इसे गंधलेपन यात्रा भी कहा जाता है ।

2.स्नान पूर्णिमा यानी जैष्ठ शुक्ल पूर्णिमा
‪#‎ स्नानयात्रा‬!
इसी दिन श्री जगन्नाथजी का जन्म हुआ था बताया जाता हे !
विश्वकर्मा आधा मूर्ति बनाके
अंतर्ध्यान हो गए थे !
भगवान जी का गजरुप होता है ।

3.रथयात्रा
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया
भाई बहन को साथ लिए प्रभु रथ से माउसीमाँ मंदिर तक यात्रा करते है ।

4.आषाढ़ शुक्ल एकादशी
हरिशयन एकादशी
‪#‎ बाहुड़ायात्रा‬
भगवानजी का श्रीमंदिर प्रत्यावर्तन उत्सव !

5. कर्कट संक्रान्ति
श्रावण कृष्ण द्वितीया
‪#‎ दक्षिणायनयात्रा ‬

6. भाद्रव शुक्ल एकादशी
पार्श्व परिबर्त्तन एकादशी
‪#‎ पार्श्वपरिबर्त् तनयात्रा‬

7. कार्त्तिक शुक्ल एकादशी
हरि उथ्थापन एकादशी देवोत्थान एकादशी
‪#‎ प्रवोधनयात्रा‬

8.मृर्गशीर शुक्ल षष्ठी
मूलक षष्ठी गृह षष्ठी
ओढ़ण षष्ठी

‪#‎ प्राबरणयात्रा‬
प्रभु शीतवस्त्र परिधान करते है ।


9. फालगुन शुक्ल पूर्णिमा
‪#‎ पुष्याभिषेकयात् रा‬

10. मकर संक्रान्ति
माघ कृष्ण सप्तमी
‪#‎ उत्तरायणयात्रा‬

11.फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा
दोलोत्सोव बसन्तोत्सव

12 चैत्र शुक्ल चतुर्दशी
दमनक लागि या
‪#‎ दमनक‬चोरी

सोमवार, 4 जुलाई 2016

बहू के चलना न आए जी...

बचपन मे नीचे लिखे भजन सुनके गुस्सा जाता था....
हूर्र ... ये भी कोई भजन है !!!
भगवन का स्तूति नहीँ
न गुणगान
अपने बोहू यानी पुत्रवधू के विषय मे अनाव सनाव कहागया है !!
लेकिन उम्र बढ़ने के साथ मैँ इसका असली अर्थ समझ पाया था !
‪#‎ विप्रश्री‬ ‪#‎ श्रीरघुनाथ_दास‬रचित
इस भजन मे ‪#‎ योग‬विषयक
हितवाक्य सरल भाषा मे कहा गया है ।
आर्त्तदास बनमाली दास आदि कविओँ के भजन मे योग मुख्य विषय रहा है
ऐसे ही एक भजन
Olata brukhye kheluchi lotani para
काफी प्रसिद्ध हुआ है ।
पैश है रघुनाथ दास जी के लिखे
वह भजन....
"बोहू चालि न जानई लो
पाद पड़ु अछि बंका
=>बहू (जीवात्मा) के चलना न आए जी
पद पड़त है बाँका
*मन से पराधीन जीव पाप कर्मोँ मे लिप्त है
"जेउँदिन बोहू चालि जानिजिब
घरे पड़िजिब डका"
=>जिसदिन बहू चलना जानजाए
घर मे हो जाए डका(सम्मान)
*व्यक्ति सदमार्ग मे चलना जान जाए तो सर्वत्र उसकी पूजा होगी
"जेउँ दिनुँ बोहू बापघरठारु
अईला ससुर घर कु"
=> जिस दिन बहू माईके से
लौटी ससुराल मे
*अर्थात परम् ब्रह्म से अलग
हो जीव जब संसार मे प्रकट हुआ
"आपणा पति र संगे संग नाहिँ
रसरे रसाए पर कु"
=>अपने पति के संगे संग नहीँ
रसमे रसाती दुजे को
*अपने पति अर्थात् परमात्मा को भूल कर जीव विषय भोग मे
लिप्त है
"पाँच भल लोक बुझाई कहिले
न बुझिला बोहू तिळे"
=>पाँच भले लोग समझाए
लेकिन मनाती नही बहू बिलकुल
*पाँच इंद्रियोँ के जरीये सच्चाई को जान कै भी जीव समझ नहीँ रहा
"अर्न पाणि बोहू किछि न खाईण
रहिछि शून्य़ आहारे"
=>अर्ण जल बिना बहू रह रही शून्य आहारे
*जीव के लिए जप तप हि असली आहार है
"पचिस नणन्द जंजाळ करन्ति
बोहू मोर बारुँआळी
=>पच्चीस ननन्द परेशान करती बहू मेरी झगड़ालु
*पच्चीस ननन्द यानी कि मानव सुलभ पच्चीस प्रकृति
से परेशान जीव दुनिया भर मे झगड़ा करता फिरता है ।
बोहू दूर्द्दण्डि सहि न पारइ
बुलइ पड़िशा ओळी
=> बहू दूर्द्दण्डी(उद्दण्डी) सह नहीँ पाती
घुमती पडोशीओँ कि मोहल्ले गली
*इंद्रय सुख तथा मन तोष के लिए
जीव चहुँ ओर दौडता रहता है
"बोहू गोटिक मुँ करि आणि अछि
खाउन्दा घर र झिअ"
बहू ऐके मेँ कर लाया हुँ
खानेवाले घर कि बेटी
*जीव मात्र मे खाते है फिन् शौच करते है
इसलिए ऐसा कहागया
"बांझ करकटी
नुहँई लंपट्टी
बोहू आडे तिनि पुअ"
=>बाँझ करकटी
न है लंपट्टी
बहू को तिन पुत्र
*जीव के तीन गुण
सत्व रज तम
ये तिन पुत्र बताये गये है ।
"पुअ बोहू दुहेँ एकत्र होइले
चर्तुवर्ग फळ पाइ"
=> पुत्र वधू दोनोँ एकत्र होनेँ
से चर्तुवर्ग फल मिले
*पुत्र अर्थात् परमात्मा एवं वधू यानी कि आत्मा के मिलन से चर्तुवर्ग फल मिलते है
"रघुनाथ दास भरसा करिछि
बोहू कु भेटिबा पाइँ"
=>रघुनाथ दास भरसा ( यहाँ ईच्छा ) कर रहा
बहू से मिले
* रघुनाथ दास यानी कवि स्वयं चाहते है कि वो बहू अर्थात् स्व_आत्म दर्शन करेँ ।
स्व आत्म दर्शन परमो भक्ति तथा योग सिद्धि से ही संभव
होता है ।
जो साधक स्व आत्म दर्शन कर लेता है
उनके
परमात्मा का दर्शन भी अल्प
श्रम से संभव हो सकता है ।
योग सिर्फ जीव के नवद्वाररुपी घर के लिए ही नहीँ
परमात्मा से संपर्क का द्वार भी उन्मुक्त करता है

मुझे वही रुप दिखाओ हरि - सालबेग

ମୋତେ ସେହି ରୁପ ଦେଖାଅ ହରି
ଜୟ ଶ୍ରୀରାଧେ ବୋଲି ଡାକେବାଂଶୁରୀ -2
मुझे वही रुप दिखाओ हरि
जय श्रीराधे कहे तोरा बांशुरी 2
ତ୍ରୀପାଦରେ ଦାନ ନେଇ ବଳି କି ପାତାଳେ ଥୋଇ
ଏଣୁ କରି ଶୁକ୍ର ମନ୍ତ୍ର ନୟନରେ କୁଶ ମାରି
त्रीपाद दान लैके बलि को पाताल मे किए उसे राजा
शुक्र मन्त्री बाधक बने
आँख फुटा मिली सजा
ମୋତେ ସେହି ରୁପ ଦେଖାଅ ହରି
ଜୟ ଶ୍ରୀରାଧେ ବୋଲି ଡାକେବାଂଶୁରୀ -2
मुझे वही रुप दिखाओ हरि
जय श्रीराधे कहे तोरा वांशुरी 2
କହେ ସାଲବେଗ ହୀନ
ଜାତୀରେ ଅଟେ ଯବନ
मैँ सालवेग हीन
जाती है यवन
କଂସ ଅଷ୍ଠମଲ୍ଲ ମାରି
କାହାକୁ ନ ଅଛ ତାରି
कंस अष्ठमल्ल मारे
सबको जग उधारे
ମୋତେ ସେହି ରୁପ ଦେଖାଅ ହରି
ଜୟ ଶ୍ରୀରାଧେ ବୋଲି ଡାକେବାଂଶୁରୀ -2
मुझे वही रुप दिखाओ हरि
जय श्रीराधे कहे तोरा बांशुरी ....
------भक्त कवि सालबेग----
***
मोगलकाल मे खासकर
साहजाहान के समय
श्रीक्षेत्र पुरी जगन्नाथ धाम पर
200 वर्षो तक मुस्लिम आक्रमण हुए
लेकिन 17वीँ सदी मे इस मुस्लिम भक्त ने
स्थानीय मुस्लिम शासकोँ को
अपने वस मे कर लिया था !
कहते है भक्ति मे अनन्त शक्ति होता है
सालबेग का श्रीकृष्ण भक्ति से पुरी जिल्ला शासनी ब्राह्मण
भी प्रभावित हुए थे
इतिहास साक्षी है
इस भक्त के आविर्भाव के बाद फिर कभी भी श्रीमंदिर पर हमले नहीँ हुआ

शुक्रवार, 6 मई 2016

रसोगुला ओडिशा का है

दुनिया को Odishan ने #रसगोला चखाया....  वो भी अलग अलग प्रकार ,रंग के और एक अकेले कोलकत्ता मे सिर्फ #सफेद_कलर् का रसगुला मिलता है  वहीँ #Odisha मे हर गाँव कसवे मे अलग अलग वेराइटिज् के रसगुला दिखजाएगेँ !!   19वीँ सदी के शुरुवात मे  दीन हीन Odisha छोड़ कुछ कर्मवादी लोग Bengal चलेगये थे ये लोग वहाँ उनकी सवारी ढ़ोने लगे रसौइये बने माली बने और वहीँ के हो कर रहगये माइग्रेटेड ओड़िओँने रसगोला का रेसेपी बेँगोलीओँ को दिया था  ** श्रीचैतन्य महाप्रभु पुरी से बंग लौटते समय अपने संग कई ओड़िआओँ को साथ ले गये थे । यही Odishan आगे चलकर बेँगल मे ठाकुर व ठाकुरदा नामसे जाने गये ...तथा सम्भ्रान्त बेँगली परिवारोँ मे रसौया का काम करने लगे और रसगोला रेसिपी के बेँगलीओँ मे बाँटा  #बंगाली कहते है 15वीँ सदी मे #पुर्तगालीओँ ने भारतीयोँ को #छेना या #Cheese बनाना सिखाया था....  जबकी #मध्यकाल के प्रसिद्ध नवरत्नोँ मे से एक #अमरसिँह ने #अमरकोष मे छेना को #अमिक्षा बताया है !  इसी पुरातन शब्द से ओड़िआ भाषामे अमिशा शब्द प्रचलन मे आया  !  सालेपुर तथा पोहल मे मिलने वाले रसगोला इषत् लाल रंग के होते है ।  1868 मे इस लाल रसगोला के जटिल पद्धत्ति का सरलीकरण करते हुए  कोलकत्ता के नविन दास  ने सफेद रसगोला बनाया था  उन्होने छेना के बदले सुजि मिलाईके  उसे सफेद बनाया जो आगे   चलकर उनके पुत्र के सी दास ने दुनिया भर मे फैलाया !  आज भी यह लाल रसगोला Odisha के अलावा कहीँ नहीँ मिलता  ज्यादे महनत् कौन करे   जब सफेद से ही मुँह मीठा हो जाता हो ।  गाय को माता कहकर पूजने वाले #भारतीय यदि छास ,दही माखन् बना लेते थे तो उन्हे छेना बनाना न आता हो यह तो असम्भव लग रहा है ।  Odisha मे छेना से बने अन्य प्रसिद्ध मिठाईआँ....  #छेनापोड़  यह मिठाई छेना ,चिनि ,सुजि ,काजु व किसमिस् से बनता है इसे नयागड़ जिल्ला मे 12वीँ सदी मे प्रथमवार बनाया गया था ।  **विद्याधर साहु नामसे एक  #गुड़िआ [गुड़ से मिठाई बनानेवाले Odia हलवाई] ने एक दिन रात को छेना मे गुड़ मिलाके उसे सारी रात चुले पर बिठा दिया था...  किसी ने उस चुले पर आग जलादिया  जिससे वह छेनापोड़ बनगया था  #छेनागजा  यह मिठाई छेना ,चिनि तथा सुजि से बनता है Bhubneswer निकटस्थ पोहल गाँव मे इसके अलग अलग वेराइटिज् मिल जाता है ।  #रसावळी  छेना दुग्ध चिनि से बनता है ! सर्व प्रथम केन्द्रपड़ा जिल्ला  मे बना था इसे बलदेवजीउ मंदिरमे भोग लगाया जाता है । श्री जगन्नाथ मंदिरमे लगनेवाले 56 भोग मे रसावळी अन्यतम है ।  #रसवरा :- पश्चिम ओड़िशा का खास मिठाई !  इसे रसगोला का बड़ा भाई मानाजाता है । चावल ,सुजी या छेना के बदले इसे केवल मुंग् के दाल को गोला बनाके चिनि के गर्म रस् मे डुबो कर इसे बनाया जाता है ।  ओड़िशा मे इनके अलवा भी कई  और मिठाई बनाया जाता है  जैसे रसकदम् राविडी रसफेणी रसमलेई आदि  ओड़िशा के ऐसे कई  कई गाँव है जिनका नाम रस शब्द से शुरु होता है  चाहेँ वो बलांगीर का रसतुला गाँव हो या ढ़ेँकानाल का रसोल  इन गाँव को आज भी गुडिआ हलवाईओँ का गाँव कहाजाता है  और   ये सभी गाँव उस क्षेत्र मे रसगोला के लिए फैमस भी है ही  ओड़िशा के पुरी ,भूवनेश्वर , कटक , पाहाळ , सालेपुर , गोविन्दपुर , नीलगीरी का रसगोला एक दुसरे से अलग और स्वाद भी अनन्य होता है ।   यहाँ कई काव्य भी लिखे गये है जिनमे रस शब्द पाया जाता है रसकल्होळ रस विनोदिनी  आदि आदि  वहीँ रसगोला विक्री मे भी पाहाळ तथा सालेपुर काफी आगे है जबकी कोलकत्ता तिसरे स्थान पर है ।    पिछले साल रसगोला विवाद के समय कई लोगोँ ने Odishan पर कटाक्ष किया था  वीर सांघवी ने कहा  अबतक ओड़िआ लोग निँद मे सोए थे क्या ? जो अब जागे हो ???  सांघवीजी को भाई भक्त त्रिपाठी ने फेसबुक तथा प्रमेय मे आर्टिकल् छाप कर तब जोरदार तमाचा जड़ा था  मेरा यह लेख उनके उसी लेख से प्रेरित है  हिन्दी मे एक कहावत् है  जब जागो तभी सवेरा  कॉपी मार मार के नाम कमाने वाले आँख उठाके देखेँ Odishan जाग् रहे है   

बुधवार, 2 मार्च 2016

<<<<<< खण्डायत >>>>>>



"खण्डाय़त" जाति है
स्वाभिमानी ओड़िआओँ कि....

भारत मे यह सैनिक कृषक जाति "सर्वजाति समन्वयता" का ध्वजारोहण कर रहा है ....

पाइकवीरोँ मे सबसे आगे रहकर लढ़नेवाले साहसी वीर थे ये
खण्डायत ....

लेकिन अफसोस...

यहाँ बाकी बिरादरी के लोग
जब थोड़ा बहत पढ़ लेते है
उनके मनमे,
खण्डायतोँ को लेकर के कहीँ ना कहीँ द्वेष भरा हुआ देखा गया है....

ऐसे लोग अकसर् उन अंग्रेजी किताबोँ को पढ़कर बड़े हुए होते है
जिन्हे
कुछ Odia/odisha विद्वेषी लेखकोँ ने
व्यग्यंत्मक शैली मे लिखा हुआ होता है ।

----खण्डायतोँ के प्रति द्वेष क्युँ----

ओड़िशा मे मराठाराज के समय कुछ खण्डायतोँ ने मराठाराजाओँ के कहने पर लुट और अत्याचार उत्पात मचाया था

इसलिये
हमारे समाज मे बाकी संप्रदायोँ का,
खण्डायतोँ के प्रति द्वेष होना आम बात है ।

<<<खण्डायत शब्द का शब्दार्थ>>>

ओड़िआ पूर्णचंद्र भाषाकोष रचयिता
श्री
गोपालचंद्र प्रहराज जी
"खण्डायत-खण्डाएत्" शब्द के बारे मे अपने Odia dictionary
लिखते है


"ये किशानोँ का एक संप्रदाय है
जो युद्धकला मे प्रवीण हुआ करते है'

खण्डायत शब्द का 2 प्रमुख अर्थ है

1.खण्ड - भूमिखण्ड के अधिकारी [जमिदारी]
खण्ड+आयत =खण्डायत]

2.खण्डा या तलवार समान हात
या युँ कहेँ तो वहतर कि
खण्डा सदैव जिनके हातोँ मे रहते हो"


लेकिन जब हम इस शब्द का पोस्टमर्टम् करते है हमेँ मिलता है

संस्कृत भाषा का
"खण्ड् धातु"

अब खण्ड् धातु के कई अर्थ होतेँ है....


जैसे फाड़कर टुकड़ा टुकड़ा करना [खंड खंडकरना]
ठगना
वाधा देना
निश्फल करना
विनाश करना
पूर्णतः पराजीत करना
अवज्ञा करना
निराश करना आदि....[Purnachandra bhasakosha page 1514]


अब खण्ड् धातु के ये सभी समानार्थवादी शब्दोँ को मिलाकर
एक वाक्य गठन किए जाय
तो वो कुछ ऐसा बनेगा



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शत्रृओँ के सेना को चिरफाड़ने को सक्षम,

दुशमनोँ को अपने चालाकि से ठगदेनेवाले,

शत्रृओँ के अनचाहेँ आदेशोँ को अवज्ञा कर उन्हे निराश

पराजीत व विनाश करदेनेवाले
उत्कल भूखण्डमे सामर्थ्यवान
सिर्फ और सिर्फ खण्डायत हीँ हो सकते है !!!

हाँ कुछ लोगोँ को ये अतिशयोक्ति लगे
लेकिन जैसा कि खण्डायतोँ का
गौरवमय इतिहास रहा है
इसे नकारा नहीँ जा सकता !
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खण्डायतोँ के बारे मे
ऐतिहासिक जगबंधु सिँह जी अपने prachin utkal पुस्तक मे
लिखते है

"इन लोगोँ को
स्वयंको चषा या किशान कहने मे शर्म आती थी
अतः खुदको खण्डाएत कहकर दुसरोँ से परिचय करते रहे है'

"भले इनमे मक्खी तक मार पाने कि क्षमता न हो
लेकिन आज भी इन्हे कोई ललकार के देख लेँ
मुछ्छोँ पर ताव देइके
"क्या"
कहकर मैदान मे लढ़ने को कुद पड़ेगेँ'
क्षत्रिय भिन्न किसी मे भी ऐसी प्रवृत्ति मिलपाना
मुस्किल है ।"

मैनेँ मेरे विरादरी के ज्यादातर लोगोँ को अपना परिचय देते समय खुदको
खण्डाएत चषा के तौर पर परिचय देते हुए देखा है

अतः ऐतिहासिक महोदय का ये कहना कि
खण्डायत खुदको चषा या किसान कहने मे शर्म महशुश करते थे या करते है
मैँ सहमत नहीँ हुँ




ओड़िशा मे खण्डायतोँ पर कई प्रशिद्ध
जनसृति प्रचलन मे है


"काँचि अभियान"
इसी तरह के जनसृतिओँ मे से एक है

संक्षेप मे कथा :-

Puri पुरुषोत्तम देव राजा को
काँची राजकन्या पद्मावती से प्रेम हो जाता है
वे अपनी मन कि बात
काँचि नरेश के पास पत्र मे
लिख भेजते है ।
काँचि नरेश पारिवारिक विवाह संबन्ध को राजी हो जाते
और अपने भावी जामाता का
राज्य देखने उत्कल भ्रमण हेतु
आते है !

उनदिनोँ रथयात्रा था
स्थानीय राजाको भगवनजी के रथ मे रथयात्राको झाड़ु लगने का रस्म होता है
काँचि राजा उसी दिन ही पुरी सहर आ पहँचे
और राजा पुरुषोत्तम को चाँडाल कर्म करते
देख
उनका वहीँ भर्त्सना किया
और
काँचि लौट गये...

यहाँ न केवल राजा का वरन
जगन्नाथ संस्कृति का भी अपमान हो गया

राजा ने काँचि पर धाब्बा बोल दिया
लेकिन परास्त हो लौँटे

फिर जगन्नाथ पुरी मे
श्री जगन्नाथ भगवान के सम्मुख
घँटो साष्टागं योग मे पड़े रहे ।

भक्त के भक्ति से प्रीत हो भगवन ने उन्हे पुनः काँचि पर युद्ध अभियान करने को कहा
औ कहा कि मेँ तुम्हारे साथ हुँ ।

सेना पुनः काँचि पर विजय पाने को उत्कल से काँचि कि ओर चलपड़ा...

कहते है श्रीकृष्ण बलराम भी इस युद्ध मे सामिल होने
काले व सफेद घोड़े मे चढ़कर आगे बढ़े जा रहे थे

रस्ते मे एक ग्वाल कन्या चली जा रही थी

उसके मटके मे छास था
और अब प्रभु श्रीकृष्ण को प्यास लगा
[ये भी लीला ही था]
दोनोँ भाई पेट भर भर के छास पि गये
लेकिन ग्वालन् को देँ क्या
धन तो था
नहीँ
सो माणिक ग्वालन् को जगन्नाथ जी ने अपना रत्न खचित अंगुठि दे कर कहा

ये रखो आगे राजा आ रहे है
उन्हे दिखाईके अपना प्राप्य ले लेना ।
और इतना कहकर वे दोनोँ भाई अपना अपना घोड़ा आगे दौडा दिए ।

ग्वालन् माणिक से जब ये रत्न अंगुठि राजा को प्राप्त हुए
राजा और उसके सेना का साहस दुगना हो गया

काँचि का युद्ध चल रहा था

लेकिन टक्कर काँटे कि
थि

देवी तारिणी माता का आशिर्वाद से काँचि राजा अजेय था
च्युकि उन्हे यह बरदान प्राप्त था कि
जबतक काँचि मे
देवी तारिणी रहेगी तबतक
काँचि जीतपाना नामुनकिन है

उत्कलीय सेना मे भीम नामका
एक खंडायत सैनिक था

उसने देवी को प्रसन्न करलिया
माता तारिणी ने कहा

मेँ तेरे साथ चलुगीँ
जहाँतक तु चलेगा
लेकिन ध्यान रहे
जहाँ तेरे कदम् रुके
मैँ वहीँ ठहर जाउगीँ

भीम् देवी तारिणी को केन्दुझर अपने गाँव ले जा रहा था
लेकिन एक जगह उसे मानो ऐसा लगा कि देवी नहीँ चल रही
च्युँकि पाँजेव का शब्द अब सुनाई दे नहीँ रहा था

वो वहीँ रुक गया
और पिछे मुड़कर देखा तो
देवी पत्थर बनगयी है

ये जगह आज घटगाँ तारिणी पीठ के नाम से प्रशिद्ध है ।

क्रमशः.....












सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

श्री चैतन्य महाप्रभु ओड़िआ थे

बंगाली 15वीँ सदी तक शाक्त धर्म के मूल भावनाओँ को छोड़बली प्रथा और तंत्रमंत्र के जाल मेँ फँसकर अंधविश्वासी बन गये थे

ऐसे ही भयंकर परिस्थिति मेश्रीचैतन्य महाप्रभु का जन्म हुआ था
वैष्णव धर्म रक्षार्थे

उनके पूर्वज जाजपुर जिल्ले के मिश्रा सरनेम धारी ब्राह्मण थे
पुरी राजा से हुए विवाद के कारण उनके पिता ओड़िशा छोड़ दिए थे
और बंगाल चले गये थे

वहाँ उनका परिवार सिर्फ 55 साल तक रहा था

दिक्षा लेने के बाद
अपने बाकी कि जिँदेगी
यानी अंतर्ध्यान होने तक
श्री चैतन्य पुरी मेँ ही रहे

ये भी यहाँ प्रणिधान योग्य हे कि पहले मिश्र सरनेमधारी ब्राह्मण या तो मिथिला मे होते थे या ओड़िशा मे

बंग्लादेश से माइग्रेटेड बंगाली
वर्षोँ से भारत के कई हिस्सो मेँ खुद को बंगाली परिचय  देते हुए रह रहे है
तब श्री चैतन्य सिर्फ जन्म आधार पर बंगाली कैसे हुए ?

चलो यही नियम मान भी लिया जाय
तब तो इस हिसाब से सुभाष चंद्र वोष ओड़िआ हुए

च्युँकि उनका जन्म व 15 वर्षोँ तक पालन पोषण पढ़ाई लिखाई यहीँ ओड़िशा के कटक जिल्ला सत्यभामापुर गाँव मे हुआ था !!

मंगलवार, 26 जनवरी 2016

कर्मवीर गौरीशंकर

कर्मवीर गौरीशंकर राय ....

हिन्दीभाषी भाईओँ को शायद यह नाम नया लगे....

1866- [नव अंक दूर्भिक्य ] भयंकर अकाल के समय अंग्रेजोँ कि पोल खोलने के लिये

कुछ जागरुक ओड़िआ नौजवानोँ ने प्रथम

Odia पत्रिका‪#‎UtkalDipika‬
कि निँव रखी थी
इस पत्रिका के आजीवन संपादकसंचालक रहेगौरीशंकर ....

गौरीशंकर के पूर्वज‪#‎बंगाल‬से ओड़िशा आये और यहीँ के हो कर रहगये ....

ओड़िआ भाषा आन्दोलनव स्वतन्त्र उत्कल प्रदेश गठनमे गौरीशंकर जी का बहुत बड़ा हात है .....

वे अपने स्वतंत्रता व स्वाधीन मत को अक्षुर्ण रखते हुएपत्रिका संपादन के साथ साथसरकारी नौकरी भी किया करते थे....

एक दिन Utkaldipika मे तत्कालीन कलेक्टर द्वारा किएगये अनीति पर एक लेख छपा .....

कलेक्टर ने कार्यालय मे ही गौरीशंकर से जवाबतलब किया.....

कि आखिरकार एक सरकारी नौकर होते हुए भी तुमकैसे सरकार के खिलाफ लिखसकते हो .... ?!!

इसके उत्तर मे कर्मवीर गौरीशंकर ने कलेक्टर साहब को साफ शब्दोँ मे जवाब दिया.....

गौरीशंकर राय... वो उत्कलदिपिका के संपादक ने वह लेख लिखा था वो भी कार्यालय से छुट्टी के बाद अवसर समय मे...

..ये गौरीशंकर राय कलेक्टर केदफ्तर मेँ सरकारी कर्मचारी है Utkal dipika के संपादक नहीँ....

ये जवाब सुनकर वेचारा कलेक्टर निरुत्तर रहगया....

बुधवार, 20 जनवरी 2016

ओड़िशामेँ मोगलराज का अंत व मराठाराज कि अयमारम्भ...

1590 से 1595 तक अकबर के दो हिन्दुमंत्रीओँ के सुशासन हेतु
कुछ कालोँ तक शान्ति विराजमान रहा !
बाकी के वर्षोँ मे #ओड़िशा सिर्फ अशान्ति लुटपाट अराजकता का लीलाभूमि बनकर रह गया !

कहते है छिद्रेष्वनर्था बहुळी भवन्ति
अर्थात् विपदा आता है तो बहुधा आता है !
अभी अफगान मोगलोँ का अत्याचार कम् नहीँ हुए थे कि
मराठीओँ के शताधिक अश्वटापुओँ से समुचे क्षेत्रमेँ हाहाकार मचगया !!
क्या इतना अत्याचार सहन करते हुए कोई जाति इससे उभर सकता है ?

मोगलोँ के अत्याचारोँ से लोग दाने दाने के महताज् हो गये थे
मोगोलोँ के साथ ओड़िशा मे गरीबी और अकाल दोनोँ आये
थे और अबतक विराजमान है
जिसे मराठाओँ ने अंग्रेजोँ ने और बढ़ादिया था सिर्फ अपने स्वार्थ के लिये !
1704 मेँ आलिवर्दी खाँ बंगाल नवान नियुक्त हुए
स्थानीय नायव नवाव मुर्शिदकुलि खा के साथ उनका विवाद हुआ !
उनदिनोँ खोर्धा पुरी के राजा वीरकिशोरी देव का समर्थ मुर्शिदकुलि खाँ के तरफ था !
विभिन्न वादविवादोँ के बीच कुछ वर्ष बीतगये .....

1742 -43 AD मे वेरा के माराठा शासक का ओड़िशा के मोगलबंदी इलाकोँ पर भारी सैन्योँ के साथ आगमन हुआ !

वे भास्कर पण्डित .आलिसा तथा अन्य मराठा सरदारोँ के साथ यहाँ आये थे !

मूल उद्देश्य था जैसे तैसे बस धन जुटाना !

उनदिनोँ स्थानीय शासकोँ [Odisha] के पास सैन्य संख्या कम था वहीँ यहाँ के शासक तब मोगलोँ के अधिनस्थ करदराजा हुआ करते थे !
मोगलोँ के अत्याचार से त्रस्त
जनता ,
स्थानीय राजाओँ को तो मानती थी परंतु बंग नवाव या दिल्ली सिँहासनारुढ़ सम्राट से घृणा
यहाँ प्रचलित कथा कहावत
जनसृतिओँ मे साफ नजर आता है ।

तो मराठीओँ को बाधा देना असम्भव हो गया था च्युँकि क्षेत्र मेँ आपसी एकता उतना सुदृढ़ नहीँ थे....

राजा का दोष प्रजा पर निकालते हुए मराठी आक्रमणकारी बारबाटी(कटक) दूर्गतक के इलाकोँ मे लुटपाट मचागये और जहाँ जो मिला ले गये !

अगले वर्ष भी यही सब हुआ !
इसबार रघुजी भोँसले और अधिक सैन्य लेकर आये और उनके साथ आये थे विख्यात हबिबुल्ला !!

आलिवर्द्दि खाँ तब मोगलबंदी इलाकोँ [Bihar,bengal,odisha] के मोगलोँ द्वारा नवाव नियुक्त हुए थे....

वे मराठाओँ को रोक पाने मेँ नाकाम् रहे
अतंतः उन्हे मजबुरन नजिम् व भोँसले के साथ संधि करना हुआ !

संधि मे सर्त्त था
कि बंग ,विहार व ओड़िशा के मोगलबंदी इलाकोँ से मराठाओँ को 2400000 रुपया देना होगा !

बंग नवाव इस संधि के सर्त्तोँ को माने नहीँ अतः मराठीओँ ने 1751 मेँ मोगलबंदी इलाकोँ मे फिर हमला करदिया !

राजा जानोजि भोँसले और मीर हविबुला ने इस आक्रमण का नेतृत्व किया !

अब आलिवर्दी खाँ का मराठीओँ के आगे झुकना लगभग तय था....

उसी साल जानोजी और हविवुला ने अपने अपने सैन्योँ के व्यय भार वहन करने हेतु
ओड़िशा को दो हिस्सोँ मे
बाँट दिया था !

उन दिनोँ ओड़िशा से वार्षिक आय 10 लाख के आसपास होते थे....

पट्टासपुर से बरुआँ तक का उत्तरी हिस्सा अफगान हविबुला को मिला -आय 6 लाख !

बरुआँ से मालुद तक के भूखंड पर मराठीओँ का प्रत्यक्ष प्रभाव रहा -आय 4 लाख !

महानदी निकट चौद्वार छावनी मेँ ये लोग ओड़िशा को चंद मिँटो मेँ बाँट दिए थे !!!

उस ओड़िशा को बाँट गये
थे जिसे एक झंडेतले लाने के
लिये [utkal+kalinga+odra-anga+kosal]
7वीँ सदी मेँ ययाति [जजाती] केशरी को वर्षोँ खटना पड़ा था !

क्रमशः ...
सभार
Prachin utkal
late shri jagbandhu singh

मंगलवार, 5 जनवरी 2016

खारबेल : मेरी नज़र से

लेखक श्री विश्वकेश त्रिपाठी ने अपने अंग्रेजी पुस्तक "खारबेल द वारियर सिकर" मे
इतिहास व जनसृति को मिलादिया है ।

चलिये ये कथा पहले संक्षेप मे जानलेते है ।

यह कथा भारत के अर्धाधिक भूमि पर विजयी ध्वज फहराचुके
महामेघवाहन ऐरपुत्र खारबेल के जीवनी को आधार बनाकर लिखागया है ।

उन्होने अपने किताब मे शेषभारतीयोँ कि भाँति खारबेल को कलिगेँतर राज्य से बताया है । वे कहते है
खारबेल ने सर्वप्रथम कलिगंविजय किया था ....
संभवतः दक्षिण कि कालचुरी राजा करवर को वे खारबेल मानते होगेँ !

खारबेल ने 12 वर्षोँतक युद्ध अभियान चलाया !
दक्षिणी ,पश्चिमी व उत्तर भारत के ज्यादातर हिस्सोँ को अपने अधीन ले आये थे !
उत्तर पश्चिम भारत मे राज करनेवाले ग्रिक् मुख्य सेनापति ड्रिमेटियस् को मथुरा से ग्रीस् लौटने को मजबुर करदिया था !
दक्षिणी राजा सातकर्णि को भी खारबेल से हारना पड़ा था ।
अन्ततः खारबेल ने अपने 34वेँ वर्ष मे शक्तिशालि मगध पर धावा बोलदिया !
पटालिपुत्र हारा ...सम्राट खारबेल मगधराजकुमारी के कक्ष मे गये और राजकन्या को विवाह प्रस्ताव दे डाला !
उसी कक्ष मे उनके साथ कुछ ऐसा हुआ जिससे उन्होने युद्ध व हिँसा त्यागदिया ! इससे
उनके जीवनशैली मे भारी बदलाव आया और वे योद्धा से साधक बने !
उनकी रानी रतिका ,मंत्री सुमित्र ,मालव्य राजा इंद्रद्युम्न , रानी गुण्डिचा ,मालव्य राज विदूषक विध्यापति ने खारबेल को इस महत् उद्देष्य पूर्ति हेतु
सहयोग किया था !

सारा भारतवर्ष मे भ्रमण करते करते एक दिन खारबेल को नीलगीरी मे पूजे जा रहे शवर देवता जगन्त के बारे मे ज्ञात हुआ !

लेखक यहाँ मूल जनसृति से हटकर लिखते है....

खारबेल ने शवर राजा विश्वाबसु से मालब्य राज विदूषक बिद्यापति से सुसंपर्क स्थापन करवा दिया
और बादमेँ सभी जातिओँ ने शवर देवता जगन्त को जगन्नाथ मानकर उनका पूजा करना शुरुकरदिया जो अबतक बरकरार है ।

जाहिर सी बात हे ... जनसृति इतिहास नहीँ है और जनसृति को भी यदि काटछाँटकर या बढ़ाचढ़ाकर लिखाजाय तो वो अपना एहमियत खो देगा !

यहाँ लेखक ने नीलमाधब को यहाँ जगन्त बताया है !! मूल जनसृति मे कहागया हे नीलमाधब ही जगन्नाथ के आदिरुप हे....
वहीँ मालव्य राज इंद्रद्युम्न....
पुराण प्रशिद्ध सत्ययुगी राजा है
अतः उनका भविष्य मे होना
नित्यान्त अवास्तव लग रहा हे ।
दरसल इंद्रद्युम्न राजशक्ति का धोतक है !

जनसृति के जरीये पण्डितोँ ने परोक्ष रुप से यही कहा है कि
राजशक्ति के बलपर एक शवर देवता को बलपूर्बक हो अथबा जनसमर्थन से हिन्दु देवता मे बदलदिया गया !!

हमारे फेसबुक के एक भाई Santosh kumar mishra जी ने एकबार इसी तरह का एक लेख लिखा था !! जाहिर सी बात हे ...खारबेल के जीवनी पर ये जनसृति प्रशिद्ध है
परंतु जैन पंथ के साधु खारबेल पर अन्य एक जनसृति सुनाते है !!
उनके हिसाब से खारबेल ने प्रौढ़ावस्ता मे सिँहासन त्यागदिया
वे वानप्रस्त आश्रम का पालनपूर्वक जंगलवासी साधुओँ कि रक्षा करने लगे । तब
उनकी पत्नी गर्भवती थी वे कुछ खास दवा लाने मालव्य देश गये और वहाँ उन्हे लुटेरा समझकर कारागार मे डालदिया गया !!
खारबेल का परिवार एक व्यापारी के साथ जंगलोँ से मालव्य देश आया और रहने लगा !
खारबेल कि सज़ा सुनवाईवाले दिन मालव्य राजा ने उन्हे पहचान लिया !
मालव्य राजा ने दण्ड विचार संबन्धिय सभी क्षमता
खारबेल को सोँप दिया और
उधर उनके परिवार को भी खोजा जा रहा था !


इन सब घटनाओँ से अनजान खारबेल के जैष्ठ पुत्र को मालब्य राजकुमारी से प्रेम हो गया
मालव्य राज को पताचला...
उन्होने खारबेल पुत्र को कारवास भेजदिया
और ठिक न्याय विचारवाले
दिन खारबेल व उनके पुत्र एक दुसरे को पहचान गये !!

दोनोँ कथाओँ मे दो समानताएँ है

मालव्य और प्रेमप्रकरण !!

मालव्य संभवतः दक्षिणी राज्य मालव हो सकता है
वहीँ यहाँ प्रेम मतलब एक तरह की आपसी सहमति या संधि भी हो सकता है ।....

सोमवार, 28 दिसंबर 2015

गजपति महाराजा पुरुषोत्तम देव

गजपतिराजा कपिलेन्द्र देव के बाद उनके पुत्र पुरुषोत्तम देव ( ୧୪୬୮ AD- से ୧୪୯୭ AD ) कलिगांधिपति बने !
अपने बुद्धि शौर्य व वक्तित्व के वल पर वे सूर्यवंशी गजपति शासकोँ मे स्वयं को सर्वोत्कृष्ट प्रमाण करपाए थे ।
दक्षिण भारतमे उत्कलीय संस्कृति प्रचार प्रसार मे उनका बहुत बड़ा योगदान है !
उन्होने अपने शासनकाल मे जगन्नाथ चेतना को बढ़ावा दिया ! पुरषोत्तम देव गजपति राजवंश के प्रथम श्रेष्ठ राजा कपिलेन्द्र देव के अठारा पुत्रोँ मे से सबसे होनाहार व योग्य थे ।
नियमानुसार राजगद्दी का उत्तराधिकारी उनके जैष्ठभ्राता हम्भीर देव को होना था
परंतु पिता कपिलेन्द्र देव ने प्रिय कनिष्ठ पुत्र पुरुषोत्तम देव कलिगांधिपति बनाया ।

[[ जगन्नाथ संस्कृति कि अमूल्य धरोहर #मादलापाँजी मे लिखा है -- श्रीजगन्नाथजी ने कपिलेन्द्र देव को ऐसा करने हेतु स्वप्न मे आदेश दिया था]]

1468 AD मे कपिलेन्द्र देव के अवसान बाद पुरुषोत्तम देव का सिँहासन आरोहण अभिषेक उत्सव दक्षिण के कृष्णानदी किनारे संपन्न हुआ ।
पुरुषोत्तम देव को सिँहासन आरोहण के बाद मूलतः दो समस्याओँ का सामना करना पड़ा था ।
एक तो जैष्ठभ्राता हम्बीर देव से सिँहासन के वजह से गृहयुद्ध कि समस्या व दुजा विजयनगर राजा साल्व नरसिँह का गजपति राज्य हतियाने कि कुचैष्टा !

जैसे ही पुरुषोत्तम देव ने राजगद्दी संभाला
वौखलाये हम्बीरदेव ने अपने समर्थकोँ के साथ विद्रोह किया और खुद को दक्षिणभारत के अधिकृत भूभागोँ के स्वाधीनराजा घोषणा करदिया !

अंत मे सिँहासन को लेकर के दोनोभाईओँ मे जंग छिड़गया । 1676 AD मे पुरुषोत्तम देव ने अपने पितृदत्त राज्योँ को अपार जनसमर्थन व सामरिक शक्ति के बलपर पुनः जीत लिया ।

पुरुषोत्तम देव ने अपने बड़े भाई हम्बीर देव को युद्ध मे हराया
परंतु दयावश हो अथवा भातृप्रेम के चलते उन्होने हम्बीर देव को माफ करते हुए उन्हे खेमुण्डी राज्य का सामन्तराजा नियुक्त करदिया थे । ये उनके महानता का सबसे बड़ा सबुत है !

1476 AD के अन्तिम दिनो मे उनका दाक्षिणात्य अभियान प्रारम्भ हुआ !
दक्षिण के वाहमानी राज्यमे जन असन्तोष का फायदा उठाते हुए पुरुषोत्तम देव ने 1484 AD को राजमहेन्द्री व कोण्डाभिड़ु पर विजय पताका फहराया था !
उनका विजय रथ गोदावरी से काँची और काँची से कर्णाट देश तक चला ! उनके दाक्षिणात्य
विजय के विषय मे
मादलापाँजी मे कई कथाएँ है !

काचीँ अभियान हो या देवी तारिणी को काँची से उत्कल ले आने जैसे कई जनसृति प्रचलित पाया जाता है !

दक्षिण भारत कि उदयगिरी दुर्ग को पुनः प्राप्त करने हेतु पुरुषोत्तम देव ने कर्णाट राजा नरसिँह के खिलाफ 1489 AD मे युद्ध घोषणा करदिया ।
युद्ध मे कर्णाट राजा हारे और इस तरह उदयगिरि का वो विवादित भूभाग 1489-90 मे कलिगं मे मिला दिया गया था ।
यह युद्ध पुरुषोत्तम देव का सर्वश्रेष्ठ व अन्तिम विजय था ।
कलिगं/उत्कल पर प्रायः 30वर्षोँ तक राज करने के बाद
1497 मे उन्होने दुनिया छोड़ दिया !!
अपने जीवन के आखरी दिनोँ मे वे साहित्य चर्चाओँ पर मनोनिवेश करने लगे थे ।
उनके द्वारा अवसर जीवन मे लिखागया
Mukti chintamani ,Abhinab gitogovinda ,naama maalika ,durgotsva ,visnubhakti ,kalpadruma dipika chanda आदि संस्कृत व ओड़िआ काव्य ग्रंथ प्रसिद्ध हुआ है ।