परम वैष्णव श्रीरामानुजाचार्य जी द्वारा ख्रीस्तिय एकादश सदी के अन्तिम दशक मे वैष्णव धर्म प्रचार के लिये समुचे भारत का दौरा किया गया ।
इस विषय मे स्थानीय लोगोँ मे एक जनसृति प्रचलित हुआ
उत्तर भारत से लौटते समय श्रीरामानुज उड्र उत्कल व कलिंग प्रदेश आये ! यहाँ उनके सेवकोँ कि जीवनचर्या व उपासना पद्धति देख वे असन्तुष्ट हुए । रामानुचार्य द्वारा स्थानीय राजाओँ कि सहायता से सेवकोँ की पूजाविधि व जीवनचर्या वदलने का उद्यम किया गया । परंतु उत्कलीय सेवकोँ को यह परिवर्तनवाली बात पसंद नहीँ आयी !
तब श्रीरामानुजाचार्य ने नये सेवकोँ कि नियुक्ति कि !
इससे पिड़ित पुरातन सेवकोँ ने श्रीजगन्नाथ जी के निकट इसका घोर प्रतिवाद किया ।
स्वप्नादेश के जरीये श्रीरामानुजन् को इस परिवर्तन नीति से दूर होने को कहा गया ।
परंतु श्रीरामानुजन् पर इन बातोँ का कोई प्रभाव नहीँ देखागया । वे संस्कार कर्मोँ मेँ और अधिक संलग्न हो गये । जगन्नाथजी ने तब अपने गरुड को यह निर्देश दिया कि
"शयनरत्त अवस्था मे रामानुजन् को श्रीकूर्मम् पर छोड़ आओ" । सुबह उठकर श्रीरामानुजन् ने खुदको शिवलिँग पूजित क्षेत्र मे पाया ।
वे परम वैष्णव थे अतः उन्होने शिव उपासना नहीँ कि न शिव प्रदत्त खाद्य द्रव्य ग्रहण किया ।
उन्होने वहाँ विष्णु नाम उच्चारण के साथ उपवास रखा ।
रात मे रामानुजन् को स्वप्नादेश हुआ कि
'सेवकोँ द्वारा गलति से श्री विष्णु के कूर्म अवतार को शिवजी समझकर पूजा जा रहा है । अतः उन्हे श्रीकूर्मम् का वैष्णव विधि मे उपसना करना चाहिये ।
तब श्रीरामानुजन् ने श्रीकूर्मक्षेत्र को विष्णु कूर्मनाथ क्षेत्र मेँ बदलने के साथ साथ स्थानीय राजा को भी वशीभूत कर वैष्णव बनाया !!!
Dr. Gaganedra nath das ने इस जनसृति पर राय देते हुए अपनी अंग्रेजी प्रबन्धं The Evolution of the Priestly power : The gangavamsa period,"the cult of jagannath and the regional tradition of orissa " (CJRTO ,Page.158 मेँ भी प्रकाशित ) मे कहा..
"It seems that Ramanuja ,with the support of the ruling mon-arch in the control of puri tract ,tried to introduce brahmanic mode of worship at the shrine of Lord Jagnnath in Puri . But the priests who were not adept at Brahmanic rites-were unable to adopt it.when Ramanuja,determined to carry on his reform proposals and engaged a new set of brahmin priests , the opposition from the Non Brahmin priest was Vehement. in the face of their fierce resistance in spite of the possible support of the monarch in control of the puri tract, ramanuja had to abandon his attempt.'
इस जनसृति को समाज मे रामानुजपन्थीओ ने ही प्रचारित करवाया । हालाँकि ये घटना श्रीरामानुजन कि पुरी क्षेत्र मे जगन्नाथजी को पूर्ण वैष्णव बनाने कि प्रयासो कि विफलताओँ का प्रमाण है । परंतु इस जनसृति को प्रचार करने के पिछे रामानुजपन्थीओँ का श्रीकूर्मम शैव पीठ को विष्णु मंदिर मे बदलने कि गहरी चाल छुपी हुई थी ।
श्री रामानुजन द्वारा पुरी पर्यटन करने की सपक्ष मेँ कई प्रमाण व तथ्य है ।
1.श्री जगन्नाथ व बलभद्र जी के मस्तक मे लगाये जानेवाला पवित्र चिन्ह रामानुजपन्थीओँ की कपाल चिन्ह से सामजस्य !!
2. पुरुषोत्तम क्षेत्र से 16 किलोमिटर दूर स्थित आलारनाथ मंदिर आता है ।
रामानुज जी का दक्षिण भारत के अलवार के प्रति प्रवल सम्मान हुआ करता था । संभवतः इस जगह पर रहकर रामानुजाचार्य ने वैष्णव धर्म प्रचार कि होगी ।
इससे अलवार नाम प्रचलन मे आया व किम्बदन्ती बनगया । बादमे चोड़गंग देव के द्वितीय पुत्र राजराज देव ने यहाँ एक मंदिर निर्माण करवाया नाम रखा गया आलार नाथ !!
3.पुरुषोत्तम क्षेत्र मे स्थित एमार मठ श्रीरामानुज संप्रदाय से आज भी जुड़ा है ।
इसका संपूर्ण तामिल नाम है
#इम्_पेरु_मन्_आर् (रामानुज जी का अन्यनाम मन्मथ का परिचय दे रहा है)
पहले इस मठको स्थानीय लोग #इम्बार कहते थे अपभ्रंस हो ये शब्द अब #एमार हो गया है ।
विशिष्ट ऐतिहासिक गगनेन्द्र नाथ दास के हिसाब से 1096 ख्रीस्ताव्द मे श्रीरामानुजन् ने श्रीक्षेत्र का दौरा किया था
परंतु सटिक समय निर्धारण पर ऐतिहासिक तर्कवितर्क हेतु यह तय करपाना एक मौलिक विवाद है ।
विशिष्ट पोस्ट
एक और षडयन्त्र
अनंत_वासुदेव_मंदिर भूवनेश्वर कि सर्वप्रथम पुरातन विष्णु मंदिर है ।पुरातन काल मे भूवनेश्वर को शैव क्षेत्र के रुप मे जानाजाता था यहाँ कई प...
मंगलवार, 22 सितंबर 2015
सोमवार, 21 सितंबर 2015
एक और षडयन्त्र
अनंत_वासुदेव_मंदिर भूवनेश्वर कि सर्वप्रथम पुरातन विष्णु मंदिर है ।पुरातन काल मे भूवनेश्वर को शैव क्षेत्र के रुप मे जानाजाता था यहाँ कई पुरातन शिव मंदिर देखे जा सकते है जैसे लिंगराज मंदिर ,लक्ष्मणेश्वर चक्रेश्वर आदि । यह सहर प्रसिद्ध शाक्त क्षेत्र भी रहा है ! यहाँ कि अधिष्ठात्री देवी भूवनेश्वरी के नामसे सहर का नाम भूवनेश्वर हुआ है ।प्रसिद्ध कंलिग राजा लागुंडा नरसिँह देव कि बहन चंद्रा देवी ने इस विष्णु मंदिर का निर्माण करवाया था । जनसृति है कि चंद्रिका देवी के पति हैहय वंशी राजा परमर्द्दी देव वैष्णव थे अतः उनके मृत्यु पश्चात पति स्मृति रक्षा हेतु कलिँग राज कन्या ने मंदिर निर्माण करवाया ।आप जानकर हैरान होगेँयह मंदिर 19 - 20वीँ सदी मे षडयन्त्र का शिकार हो चुका है ।इस मंदिर कि निर्माण संबन्धि चंद्रादेवी कि शिलालेख को गर्भगृह से चुराकर किसी ने वहाँ बंगाल के राजा भवदेव भट्ट का शिलालेख रखदिया था ।फिर बंगाली प्राबन्धिकोँ ने इसे भवदेव भट्ट कि किर्त्ति बताकर समुचे बंगाल मे प्रचार करवाया ।कहते है सच्चाई छुपाये नहीँ छुपती ! दिखजाती है ,प्रकट हो जाती है ! उसे कोई चाह कर भी झुठला नहीँ सकता न मिटा सकता है.....बहत दिनोँ बाद ओड़िशा के सुयोग्य प्रत्नतत्त्ववित् #परमान्द_आचार्य जी ने इस बात से अपने तथ्यात्मक तर्कोँ के बलपर पर्दा उठादिया ।मयुरभंज महाराजा जी के सहायता से चंद्रादेवी कि वो शिलालेख लंडन म्युजियम से ओड़िशा लायागया ।फिर इस बात पर ऐतिहासिकोँ के बीच बादविवाद तर्क वितर्क दौर शुरु हुआ !अंत मे खोजबीन से पताचला एक बंगाली वैष्णव द्वारा चंद्रादेवी की शिलालेख को लंडनमे बेचदिया गया था....किसी ने क्या खुब कहा है"सच्चाई कि जीत होता रहा है होता रहेगा"
बुधवार, 2 सितंबर 2015
ओड़िशा के वंदरगाह
शिल्पशास्त्रोँ के हिसाब से पुराने जमाने मेँ वंदरगाहोँ को 2 प्रकार बताया गया था ।
Pattana और dronimukha !
Pattana समुद्री किनारे स्थित साधारण वंदरगाह को कहाजाता था
जबकी नदी व समंदर के संगमस्थल नजदिक वंदरगाहोँ को Dronimukha कहाजाता था ।
उत्कल मेँ दोनोँ तरह के वंदरगाह पायेजाते थे
Dronimukha वंदरगाह का सबसे बड़ा उदाहरण चित्रोत्पला नदी मेँ कोणार्क/चित्रोत्पला कोणगर Port था जो 800 वर्ष पूर्व प्राची -चित्रोत्पला नदी सुखने के कारण अपना अस्तित्व खो चुका है ।
आज इसी वंदरगाह को लोग चंद्रभागा के नामसे जानते है
जो कोणार्क नजदिक ही है ।
1 AD मेँ लिखे गये ग्रीक क्लासिकाल "The periplus of the erythraean sea"
मेँ कई भारतीय Port का नाम आता है
जैसे #Broach ,#uzane, #sopara, #kalyana, #muziris, #mosalia(Muslipatna), #Dosarene(Coastal odisha) आदि ।
पाश्चात्य परिव्राजक ऐतिहासिक #Ptolemy
2 AD मे भारत आये थे ।
उनके द्वारा लिखेगये भ्रमणग्रंथ
मेँ कई Coastal odisan Port
का नाम पायाजाता है । उनके
भ्रमणग्रथं मे
#Kambyson (Hoogly river),
#Manda/Munde/Mandu
(महानदी व सागर संगम क्षेत्र मेँ स्थित) , #Kannagara (कोणार्क नजदिक), #katikardama (कटक नजदिक), #Palura आदि द्रोणीमुख वंदरगाहोँ का नाम उल्लेख पायागया है ।
Ptolemy ने Palura को पूर्वी भारतीय समुद्र का सबसे बड़ा वंदरगाह बताया है !
प्राचीन #Srilankan पाली ऐतिहासिक ग्रंथ
#Datha_Dhatu_vamsa , #dipavamsa , #chullavamsa
तथा बौध ग्रंथ #Mahagovinda_sutta , #kurudharma_jataka और #Mahavastu के हिसाब से कलिगं का राजधानी Port town #Dantapura हुआ करता था ।
बर्तमान मे कुछ ऐतिहासिक पुरी को दन्तपुर मानते है ।
स्वतंत्रता के बाद प्रत्नतत्व विभाग ने ओड़िशा के कई पुरातन Port को चिन्हित किया
ओड़िशा के उन प्राचीन Ports का नाम इस प्रकार है
#Kalingapatanam , #barua , #sonapur , #matridih , #ganja , #kantiagarh, #palur , #prayagi, #manikpatna , #sanapatna, #badpatna, #arakhkuda, #banjiapatna, #boitkud , #Astaranga , #Harishpur, #Marichpur, #Chandbali, #Narendrapur, #Dhamara, #Chudamani, #balesore, #talchua, #Pipili (Mouth of subarnarekha river), #Shahbandar, #kansabansa, #panchubisa , #chandipur , #kasaphala , #kirtania , #talasari & #Tamluk आदि.... !!!
इनमेँ से एक आद वंदरगाह आज भी कर्मचंचल है ।
वंशधारा नदी मुहाने मेँ Kalingaptnam नामक Port हुआ करता था ये प्राचीन कलिगं का सर्वप्रथम राजधानी भी है ।
ब्रम्हाण्ड पुराण मेँ Chilka lake के बारे मेँ लिखागया है
इसके हिसाब से यहाँ से हजारोँ संख्या मेँ जाहजोँ को आनाजाना लगा रहता था
व्यापारी व्यापार हेतु Java borneo singhala china व अन्य द्वीपोँ मे जाते थे ।
Pattana और dronimukha !
Pattana समुद्री किनारे स्थित साधारण वंदरगाह को कहाजाता था
जबकी नदी व समंदर के संगमस्थल नजदिक वंदरगाहोँ को Dronimukha कहाजाता था ।
उत्कल मेँ दोनोँ तरह के वंदरगाह पायेजाते थे
Dronimukha वंदरगाह का सबसे बड़ा उदाहरण चित्रोत्पला नदी मेँ कोणार्क/चित्रोत्पला कोणगर Port था जो 800 वर्ष पूर्व प्राची -चित्रोत्पला नदी सुखने के कारण अपना अस्तित्व खो चुका है ।
आज इसी वंदरगाह को लोग चंद्रभागा के नामसे जानते है
जो कोणार्क नजदिक ही है ।
1 AD मेँ लिखे गये ग्रीक क्लासिकाल "The periplus of the erythraean sea"
मेँ कई भारतीय Port का नाम आता है
जैसे #Broach ,#uzane, #sopara, #kalyana, #muziris, #mosalia(Muslipatna), #Dosarene(Coastal odisha) आदि ।
पाश्चात्य परिव्राजक ऐतिहासिक #Ptolemy
2 AD मे भारत आये थे ।
उनके द्वारा लिखेगये भ्रमणग्रंथ
मेँ कई Coastal odisan Port
का नाम पायाजाता है । उनके
भ्रमणग्रथं मे
#Kambyson (Hoogly river),
#Manda/Munde/Mandu
(महानदी व सागर संगम क्षेत्र मेँ स्थित) , #Kannagara (कोणार्क नजदिक), #katikardama (कटक नजदिक), #Palura आदि द्रोणीमुख वंदरगाहोँ का नाम उल्लेख पायागया है ।
Ptolemy ने Palura को पूर्वी भारतीय समुद्र का सबसे बड़ा वंदरगाह बताया है !
प्राचीन #Srilankan पाली ऐतिहासिक ग्रंथ
#Datha_Dhatu_vamsa , #dipavamsa , #chullavamsa
तथा बौध ग्रंथ #Mahagovinda_sutta , #kurudharma_jataka और #Mahavastu के हिसाब से कलिगं का राजधानी Port town #Dantapura हुआ करता था ।
बर्तमान मे कुछ ऐतिहासिक पुरी को दन्तपुर मानते है ।
स्वतंत्रता के बाद प्रत्नतत्व विभाग ने ओड़िशा के कई पुरातन Port को चिन्हित किया
ओड़िशा के उन प्राचीन Ports का नाम इस प्रकार है
#Kalingapatanam , #barua , #sonapur , #matridih , #ganja , #kantiagarh, #palur , #prayagi, #manikpatna , #sanapatna, #badpatna, #arakhkuda, #banjiapatna, #boitkud , #Astaranga , #Harishpur, #Marichpur, #Chandbali, #Narendrapur, #Dhamara, #Chudamani, #balesore, #talchua, #Pipili (Mouth of subarnarekha river), #Shahbandar, #kansabansa, #panchubisa , #chandipur , #kasaphala , #kirtania , #talasari & #Tamluk आदि.... !!!
इनमेँ से एक आद वंदरगाह आज भी कर्मचंचल है ।
वंशधारा नदी मुहाने मेँ Kalingaptnam नामक Port हुआ करता था ये प्राचीन कलिगं का सर्वप्रथम राजधानी भी है ।
ब्रम्हाण्ड पुराण मेँ Chilka lake के बारे मेँ लिखागया है
इसके हिसाब से यहाँ से हजारोँ संख्या मेँ जाहजोँ को आनाजाना लगा रहता था
व्यापारी व्यापार हेतु Java borneo singhala china व अन्य द्वीपोँ मे जाते थे ।
रविवार, 30 अगस्त 2015
ओड़िशा का अपना स्वतंत्र व्रत खुदुरुकुणी
भाद्रव माह मेँ हर रविवार
ओड़िशा के पूर्वी क्षेत्रोँ मेँ
#खुदुरुकुणी #Khudurukuni
नामसे
यह व्रत बहनोँ द्वारा उनके भाईओँ कि लम्बी उम्र के लिये रखाजाता है ।
कभी #उत्कल प्रान्त #शाक्तधर्म प्रभावित हुआ था ।
अतः गाँवदेहातोँ मेँ आज भी #विरजा #बिमला #मंगला #चंडी #चर्चिका आदि देवीओँ का पूजा व व्रत रखाजाता है ।
*. खुदुरुकुणी मेँ देवी मंगला की पूजा कियाजाता है । पुराने जमाने मेँ ग्रामकन्याएँ मिट्टी से मंगला देवी कि मूर्ति बनाया करती थी । आजकल कारिगरोँ के हातोँ बनायेगये मूर्तिओँ से
बड़े धुमधाम से व्रत रखा जाता है । वाकायदा आतिशवाजी
लाईटिगं के साथ मूर्तिविसर्जन भी किया जाता है ।
खुदुरुकुणी दरसल खुदरकुंणी का अपभ्रंस है
ये दो शब्दोँ के मिलन से बना है
खुद+रकुंणी ।
खुद का अर्थ है चावल का दाना
रकुंणी का अर्थ दीवानी ।
चावल कि दाना भोग लगाने से भी देवीमंगला प्रसन्न हो जाती और
भक्तोँ कि मनोकामनाएँ पूर्ण करदेती ।
इस तौहार के पिछे एक जनसृति प्रचलित है
पूर्वोत्तरमे #साधव नामसे प्रसिद्ध व्यापारी कुल रहते थे ।
ये इंडोनेसिआ मालेसिआ आदि क्षेत्रोँ से नाव द्वारा व्यापार किया करते थे ।
ऐसे ही एक साधव घर कि कन्या
#तपोई के सात भाई भी व्यापार करने जाहज लेकर विदेश गये हुए थे ।
इधर बड़ी #भाभीओँ ने एक #विधवा_ब्राह्मणी_बुढ़िया के कहने पर #तपोई को घर से निकालदिया । कई यातना देते हुए भाभीओँ ने सुकुमारी
तपोई को बकरी चराने जैसा काम दिया । तपोई
सब दुःख दर्दोँ को सहन करलेती थी...वो ग्राम देवी मंगला को नित्य वन से चुनकर लायेगये फुलोँ से सजाती थी । एक दिन एक बुढ़ीऔरत ने उसे खास विधीओँ द्वारा भाद्रव माह मेँ देवी मंगला को पूजने के लिये कहा !!
उसने ऐसा ही किया
उसके भाई लौट रहे थे
देवी के प्रेरणा से जाहाजीओँ जलदस्युँ को युद्ध मेँ परास्त किया ।
इधर साधव के घर मेँ बड़ी बहू कि चहेती बकरी "Gharamani" खो गई !
भाभीओँ ने #तपोई को मारा पिटा फिर उसे कहा
जा या तो घरमणी को लेकर लौटना या कहीँ ड़ुब मरना !!
रोती बिलखती हुई तपोई रातमे जगंलो मे #घरमणी को ढ़ुड़ती रही ।
तभी घर लौट रहे सप्तसाधव भाईओँ का जहाज किनारे आ लगा । भाईओ नेँ नजदिक जंगल मेँ किसी की रोने कि आवाज सुना ।
बड़े भाईओँ ने सबसे छोटे भाई को जंगल मेँ जाकर देखने को कहा ।
छोटे भाई ने जंगल मेँ तपोई को पहचान लिया उसे जहाज मेँ ले गया ।
तपोई ने अपने भाईओँ को सारी सच्चाई बतादिया ।
भाईओँ ने जाहज पुजा के लिये अपनी पत्नीओँ को खबर भेज दिया । वो सब तपोई के खोजाने से डरी हुई थी ।
बड़े भाई धनेश्वर ने सभी साधवपत्नीओँ को जहाज मेँ देवी मंगला कि पूजा करने भेजदिआ ।
एक छोटीबहु निलेन्द्री ने च्युँकि
तपोई का पक्ष लिया था उसे छोड़ देवी मंगला ने सभी 6 साधवपत्नीओँ कि नाक काट दिया ।
उधर आश्रित विधवा ब्राह्मणी बुढ़िया साधवपत्नीओँ की गहनोँ को चुराकर भागरही थी सिपाहीओँ ने उसे पकड़ा और राजा के हवाले करदिया ।
इसतरह मंगला माता ने अपनी आश्रित भक्त कि रक्षा करते हुए
उसके भाईओँ से भी उसे मिला दिया ।
"जनसृति के पिछे छिपा इतिहास"
आजसे 1500वर्ष पूर्वतक ओड़िशा मेँ कोई जातपात न था
ओड़िआ या तो किसान ,सैनिक ,मछवारे ,नाविक या कलाकार हुआ करते थे ।
परंतु वैष्णवोँ के आगमन से
धीरे धीरे जातपात का अभ्युदय
होनेलगा ।
ब्राह्मणोँ ने क्षत्रियोँ को साथ कर
तपोई रुपी व्यापारी साधव जाति को अपमानित किया
अंत मेँ साधवोँ ने मंगला रुपी एकता के बलपर
उनपर विजय पा लिया ।
ओड़िशा मे पायेजानेवाले साहु सरनेमधारी साधाराण खेती करनेवाले चषा लोग साधवोँ के वंशज है ।
ओड़िशा के पूर्वी क्षेत्रोँ मेँ
#खुदुरुकुणी #Khudurukuni
नामसे
यह व्रत बहनोँ द्वारा उनके भाईओँ कि लम्बी उम्र के लिये रखाजाता है ।
कभी #उत्कल प्रान्त #शाक्तधर्म प्रभावित हुआ था ।
अतः गाँवदेहातोँ मेँ आज भी #विरजा #बिमला #मंगला #चंडी #चर्चिका आदि देवीओँ का पूजा व व्रत रखाजाता है ।
*. खुदुरुकुणी मेँ देवी मंगला की पूजा कियाजाता है । पुराने जमाने मेँ ग्रामकन्याएँ मिट्टी से मंगला देवी कि मूर्ति बनाया करती थी । आजकल कारिगरोँ के हातोँ बनायेगये मूर्तिओँ से
बड़े धुमधाम से व्रत रखा जाता है । वाकायदा आतिशवाजी
लाईटिगं के साथ मूर्तिविसर्जन भी किया जाता है ।
खुदुरुकुणी दरसल खुदरकुंणी का अपभ्रंस है
ये दो शब्दोँ के मिलन से बना है
खुद+रकुंणी ।
खुद का अर्थ है चावल का दाना
रकुंणी का अर्थ दीवानी ।
चावल कि दाना भोग लगाने से भी देवीमंगला प्रसन्न हो जाती और
भक्तोँ कि मनोकामनाएँ पूर्ण करदेती ।
इस तौहार के पिछे एक जनसृति प्रचलित है
पूर्वोत्तरमे #साधव नामसे प्रसिद्ध व्यापारी कुल रहते थे ।
ये इंडोनेसिआ मालेसिआ आदि क्षेत्रोँ से नाव द्वारा व्यापार किया करते थे ।
ऐसे ही एक साधव घर कि कन्या
#तपोई के सात भाई भी व्यापार करने जाहज लेकर विदेश गये हुए थे ।
इधर बड़ी #भाभीओँ ने एक #विधवा_ब्राह्मणी_बुढ़िया के कहने पर #तपोई को घर से निकालदिया । कई यातना देते हुए भाभीओँ ने सुकुमारी
तपोई को बकरी चराने जैसा काम दिया । तपोई
सब दुःख दर्दोँ को सहन करलेती थी...वो ग्राम देवी मंगला को नित्य वन से चुनकर लायेगये फुलोँ से सजाती थी । एक दिन एक बुढ़ीऔरत ने उसे खास विधीओँ द्वारा भाद्रव माह मेँ देवी मंगला को पूजने के लिये कहा !!
उसने ऐसा ही किया
उसके भाई लौट रहे थे
देवी के प्रेरणा से जाहाजीओँ जलदस्युँ को युद्ध मेँ परास्त किया ।
इधर साधव के घर मेँ बड़ी बहू कि चहेती बकरी "Gharamani" खो गई !
भाभीओँ ने #तपोई को मारा पिटा फिर उसे कहा
जा या तो घरमणी को लेकर लौटना या कहीँ ड़ुब मरना !!
रोती बिलखती हुई तपोई रातमे जगंलो मे #घरमणी को ढ़ुड़ती रही ।
तभी घर लौट रहे सप्तसाधव भाईओँ का जहाज किनारे आ लगा । भाईओ नेँ नजदिक जंगल मेँ किसी की रोने कि आवाज सुना ।
बड़े भाईओँ ने सबसे छोटे भाई को जंगल मेँ जाकर देखने को कहा ।
छोटे भाई ने जंगल मेँ तपोई को पहचान लिया उसे जहाज मेँ ले गया ।
तपोई ने अपने भाईओँ को सारी सच्चाई बतादिया ।
भाईओँ ने जाहज पुजा के लिये अपनी पत्नीओँ को खबर भेज दिया । वो सब तपोई के खोजाने से डरी हुई थी ।
बड़े भाई धनेश्वर ने सभी साधवपत्नीओँ को जहाज मेँ देवी मंगला कि पूजा करने भेजदिआ ।
एक छोटीबहु निलेन्द्री ने च्युँकि
तपोई का पक्ष लिया था उसे छोड़ देवी मंगला ने सभी 6 साधवपत्नीओँ कि नाक काट दिया ।
उधर आश्रित विधवा ब्राह्मणी बुढ़िया साधवपत्नीओँ की गहनोँ को चुराकर भागरही थी सिपाहीओँ ने उसे पकड़ा और राजा के हवाले करदिया ।
इसतरह मंगला माता ने अपनी आश्रित भक्त कि रक्षा करते हुए
उसके भाईओँ से भी उसे मिला दिया ।
"जनसृति के पिछे छिपा इतिहास"
आजसे 1500वर्ष पूर्वतक ओड़िशा मेँ कोई जातपात न था
ओड़िआ या तो किसान ,सैनिक ,मछवारे ,नाविक या कलाकार हुआ करते थे ।
परंतु वैष्णवोँ के आगमन से
धीरे धीरे जातपात का अभ्युदय
होनेलगा ।
ब्राह्मणोँ ने क्षत्रियोँ को साथ कर
तपोई रुपी व्यापारी साधव जाति को अपमानित किया
अंत मेँ साधवोँ ने मंगला रुपी एकता के बलपर
उनपर विजय पा लिया ।
ओड़िशा मे पायेजानेवाले साहु सरनेमधारी साधाराण खेती करनेवाले चषा लोग साधवोँ के वंशज है ।
गुरुवार, 27 अगस्त 2015
ओड़िशा के ढ़ेकाँनाल क्षेत्र मेँ "चषा" जाति व अन्य जातिओँ पर सम्यक जानकारी
ओड़िशा मेँ खेति करने वाले लोगोँ को आम बोलचाल मेँ "चषा" कहाजाता है ।
मेरे ढ़ेँकानाल मेँ प्रायः चार प्रकार के #चषा बताये जाते है
1.Khandayat Chasa
सैनिक किसान जो अब तलवार छोड़ चुके है खेती करते है
2.Pandarasariya-
साधारण खेती करनेवाले
वैश्य कुल
3.kalatuaa chasaa_
साधव -पुरातन व्यापारी कुल
4.thuriya chasa
साधारण किसान वैश्य कुल
इसके अलावा
यहाँ "Halua bramhan"
ब्राह्मण कुल भी पाया जाता है
जो खेती व साहुकारी करते है
#Dhenkanal जिल्ला मेँ Baulpuriya chasa नामसे
एक स्वतंत्र कृषक कुल भी पायाजाता है
जिसे कुछ लोग Khandayat के समकक्ष मानते है ।
कृषकोँ कि इन अलग अलग उपजातिओँ मेँ पारस्पारिक विवाह संबन्ध वर्जित
है फिर भी यदि कोई शादी करना चाहे तो समाज बिठाकर
कर सकता है ।
मेरा गाँव KANTIO मेँ कुल 36 जाति के लोग रहते है जिसमेँ 40% Khandayat है
खंडायत सरनामोँ मेँ
#JENA
#BISWAL
#SAHOO
#PARIDA
#PRADHAN
#RAUT
आदि मुख्यतः पायेजाते है ।
मेरे गाँव के आसपास Putasahi ,महिमाक्षेत्र jaka , Khuntabati ,kantio kateni , tumisinga आदि गाँव के लोगोँ को Kalatuaa Chasa कहाजाता है ।
आज से करिबन 1500वर्ष पूर्व
साहु Titel धारी ज्यादातर लोगोँ के पूर्वज #साधव कहलाते थे.....
1000 वर्ष पहले तक Odisha का पिपिलि चित्रोत्पला आदि वंदरगाहोँ से
मलेसिया .इंडोनेसिया ,मिशर व युरोप के साथ व्यापारीक संपर्क कायम था ।
धीरे धीरे ओड़िआ लोग जैन ,वौद व शैव धर्म छोड़ वैष्णव होने लगे....व्यापार छोड़ खेती करने पर ज्यादा तबज्जो देने लगे ,
Odisha मेँ जातिप्रथा वैष्णवोँ कि देन है । यदि ओड़िशा मेँ वैष्णव धर्म स्थापना न होता तो शायद आज ज्यादातर ओड़िआ
अन्य धर्म ग्रहण कर चुके होते ।
ओड़िशा मेँ वैश्णव धर्म के प्रचारकोँ मेँ श्री चैतन्य प्रधान मानेजाते है ।
उनका
"Bhaja shri krushna chaitanya prabhu nityananda japa hare krushna hare ram shriram gobinda"
महामन्त्र आज भी भजन किर्तनोँ मेँ गयाजाता है
वैष्णवोँ ने यहाँ ब्राह्मण व क्षत्रिय शासन (स्वायत्त गाँव) भी वसाया था ।
कुल मिलाकर
पहले ओड़िआ लोग किसान ,सैनिक साधव व नाविक हुआ करते थे
वैष्णवोँ ने जातपात को बढ़ावा दिया परंतु
आदिवासी भगवन को पूजने वाले ओड़िआओँ ने सर्वदा जातपात से ज्यादा मानव धर्म को तबज्जो दिया
यही कारण था कि यहाँ
उतना धर्मान्तरण नहीँ हो सका जितना शेष भारत मेँ हुआ था ।
[[आगे बताउगाँ कैसे वैष्णवोँ ने
एक आदिवासी भगवान जगन्नाथ को वैष्णव बनाने कि गहरी चाल चली
और 16वीँ सदी तक सफल भी हुए । ]]
मेरे ढ़ेँकानाल मेँ प्रायः चार प्रकार के #चषा बताये जाते है
1.Khandayat Chasa
सैनिक किसान जो अब तलवार छोड़ चुके है खेती करते है
2.Pandarasariya-
साधारण खेती करनेवाले
वैश्य कुल
3.kalatuaa chasaa_
साधव -पुरातन व्यापारी कुल
4.thuriya chasa
साधारण किसान वैश्य कुल
इसके अलावा
यहाँ "Halua bramhan"
ब्राह्मण कुल भी पाया जाता है
जो खेती व साहुकारी करते है
#Dhenkanal जिल्ला मेँ Baulpuriya chasa नामसे
एक स्वतंत्र कृषक कुल भी पायाजाता है
जिसे कुछ लोग Khandayat के समकक्ष मानते है ।
कृषकोँ कि इन अलग अलग उपजातिओँ मेँ पारस्पारिक विवाह संबन्ध वर्जित
है फिर भी यदि कोई शादी करना चाहे तो समाज बिठाकर
कर सकता है ।
मेरा गाँव KANTIO मेँ कुल 36 जाति के लोग रहते है जिसमेँ 40% Khandayat है
खंडायत सरनामोँ मेँ
#JENA
#BISWAL
#SAHOO
#PARIDA
#PRADHAN
#RAUT
आदि मुख्यतः पायेजाते है ।
मेरे गाँव के आसपास Putasahi ,महिमाक्षेत्र jaka , Khuntabati ,kantio kateni , tumisinga आदि गाँव के लोगोँ को Kalatuaa Chasa कहाजाता है ।
आज से करिबन 1500वर्ष पूर्व
साहु Titel धारी ज्यादातर लोगोँ के पूर्वज #साधव कहलाते थे.....
1000 वर्ष पहले तक Odisha का पिपिलि चित्रोत्पला आदि वंदरगाहोँ से
मलेसिया .इंडोनेसिया ,मिशर व युरोप के साथ व्यापारीक संपर्क कायम था ।
धीरे धीरे ओड़िआ लोग जैन ,वौद व शैव धर्म छोड़ वैष्णव होने लगे....व्यापार छोड़ खेती करने पर ज्यादा तबज्जो देने लगे ,
Odisha मेँ जातिप्रथा वैष्णवोँ कि देन है । यदि ओड़िशा मेँ वैष्णव धर्म स्थापना न होता तो शायद आज ज्यादातर ओड़िआ
अन्य धर्म ग्रहण कर चुके होते ।
ओड़िशा मेँ वैश्णव धर्म के प्रचारकोँ मेँ श्री चैतन्य प्रधान मानेजाते है ।
उनका
"Bhaja shri krushna chaitanya prabhu nityananda japa hare krushna hare ram shriram gobinda"
महामन्त्र आज भी भजन किर्तनोँ मेँ गयाजाता है
वैष्णवोँ ने यहाँ ब्राह्मण व क्षत्रिय शासन (स्वायत्त गाँव) भी वसाया था ।
कुल मिलाकर
पहले ओड़िआ लोग किसान ,सैनिक साधव व नाविक हुआ करते थे
वैष्णवोँ ने जातपात को बढ़ावा दिया परंतु
आदिवासी भगवन को पूजने वाले ओड़िआओँ ने सर्वदा जातपात से ज्यादा मानव धर्म को तबज्जो दिया
यही कारण था कि यहाँ
उतना धर्मान्तरण नहीँ हो सका जितना शेष भारत मेँ हुआ था ।
[[आगे बताउगाँ कैसे वैष्णवोँ ने
एक आदिवासी भगवान जगन्नाथ को वैष्णव बनाने कि गहरी चाल चली
और 16वीँ सदी तक सफल भी हुए । ]]
बुधवार, 12 अगस्त 2015
ओड़िशा और आदिवासी संस्कृति
ओड़िशा एक नहीँ तिन संस्कृतिओँ की मिलनस्थली है
1.आदिवासी
2.द्राविड
3.आर्य
आदिवासी इस क्षेत्र की मूल निवासी है फिर यहाँ द्राविड़ोँ का आगमन हुआ और अन्त मेँ आर्योँ ने इस क्षेत्र मेँ आकर आपसी एकता कायम करवाया ।
इसलिये पंडित नीलकंठ दासजी से लेकर के जर्मन विद्वान हर्मन् कुलके तक सभी ने यही मत दिया कि बर्तमान ओड़िआ संस्कृति आदीवासी संस्कृति से प्रभावित था ।
नीलकंठ जी ने तो यहाँतक कहा है "ओड़िआ भाषा मेँ आर्य है परंतु इनकी संस्कृति सर्वथा द्राविड़ रही है " !!!
इन तिनोँ संस्कृति के समन्वय को तथा जैन ,बौध ,वैदिक धर्म के एकीकृत अवस्था को जगन्नाथ संस्कृति कहाजाता है ।
जगन्नाथ शवरजाति के आदि परमेश्वर हे जिन्हे बादमेँ सभी पंथ के विद्वानोँ ने अपनाया । उन महाप्रभु के प्रथम पूजक आदिवासीओँ का ओड़िशा मेँ 62 जाति पायीजाती है
जिनकी जनसंख्या राज्य कि कुल जनसंख्या की 24% हे ।
इनमे शवर ,मुण्डा ,कोल्ह ,सान्ताळ और भील जातिओँ के बारे मेँ पौराणिक ग्रंथो मेँ बताया गया है ।
ओड़िशा मेँ रहनेवाले आदिवासीओँ का अपना 36 स्वतंत्र उपभाषा हे !! इसमेँ सबसे ज्यादा वोलीजानेवाली भाषाओँ मेँ देशीआ/Kotia ,साद्री और सान्ताली प्रमुख है ।
आदिवासी संस्कृति उत्कलीय संस्कृति कि प्राणकेन्द्र है आर्य सभ्यता अंगप्रत्यगं व द्राविड
सभ्यता रक्त हे ।
मुझे गर्व है मेँ एक ऐसे क्षेत्र मेँ निवाश करता हुँ जहाँ जातपात के नाम पर उत्तरभारतीयोँ कि तरह आपसी भेदभावमेँ नहीँ जिया करते ।
ओड़िशा के वाहार कोई मुझे यदि आदिवासी कहता हे तु मेँ इसे अपनी तारिफ समझता हुँ और उस व्यक्ति छोटी सोच पर मुझे अफसोस भी होता है ।
मानव मात्र मेँ प्रेम को गुरुत्व देनेवाले भोलेभाले प्रकृतिप्रेमी आदिवासीओँ का तो पुराणोँ मेँ भी गौरव बढ़ाया गया है !!!!
1.आदिवासी
2.द्राविड
3.आर्य
आदिवासी इस क्षेत्र की मूल निवासी है फिर यहाँ द्राविड़ोँ का आगमन हुआ और अन्त मेँ आर्योँ ने इस क्षेत्र मेँ आकर आपसी एकता कायम करवाया ।
इसलिये पंडित नीलकंठ दासजी से लेकर के जर्मन विद्वान हर्मन् कुलके तक सभी ने यही मत दिया कि बर्तमान ओड़िआ संस्कृति आदीवासी संस्कृति से प्रभावित था ।
नीलकंठ जी ने तो यहाँतक कहा है "ओड़िआ भाषा मेँ आर्य है परंतु इनकी संस्कृति सर्वथा द्राविड़ रही है " !!!
इन तिनोँ संस्कृति के समन्वय को तथा जैन ,बौध ,वैदिक धर्म के एकीकृत अवस्था को जगन्नाथ संस्कृति कहाजाता है ।
जगन्नाथ शवरजाति के आदि परमेश्वर हे जिन्हे बादमेँ सभी पंथ के विद्वानोँ ने अपनाया । उन महाप्रभु के प्रथम पूजक आदिवासीओँ का ओड़िशा मेँ 62 जाति पायीजाती है
जिनकी जनसंख्या राज्य कि कुल जनसंख्या की 24% हे ।
इनमे शवर ,मुण्डा ,कोल्ह ,सान्ताळ और भील जातिओँ के बारे मेँ पौराणिक ग्रंथो मेँ बताया गया है ।
ओड़िशा मेँ रहनेवाले आदिवासीओँ का अपना 36 स्वतंत्र उपभाषा हे !! इसमेँ सबसे ज्यादा वोलीजानेवाली भाषाओँ मेँ देशीआ/Kotia ,साद्री और सान्ताली प्रमुख है ।
आदिवासी संस्कृति उत्कलीय संस्कृति कि प्राणकेन्द्र है आर्य सभ्यता अंगप्रत्यगं व द्राविड
सभ्यता रक्त हे ।
मुझे गर्व है मेँ एक ऐसे क्षेत्र मेँ निवाश करता हुँ जहाँ जातपात के नाम पर उत्तरभारतीयोँ कि तरह आपसी भेदभावमेँ नहीँ जिया करते ।
ओड़िशा के वाहार कोई मुझे यदि आदिवासी कहता हे तु मेँ इसे अपनी तारिफ समझता हुँ और उस व्यक्ति छोटी सोच पर मुझे अफसोस भी होता है ।
मानव मात्र मेँ प्रेम को गुरुत्व देनेवाले भोलेभाले प्रकृतिप्रेमी आदिवासीओँ का तो पुराणोँ मेँ भी गौरव बढ़ाया गया है !!!!
मंगलवार, 11 अगस्त 2015
ओड़िशा मेँ मोगलराज
उत्कल राजा मुकुन्ददेव का मुसलमानोँ के हातोँ परास्थ व निहीत होने के पश्चात कई वर्षोँ तक ओड़िशा अँधकार युग मेँ जीनेलगा था । अंत मेँ मुकुन्द देव के कुछ विश्वासी मन्त्रीओँ ने "दनेइ विद्याधर" के पुत्र
"रणेइ राउतरा" को
"रामचँद्र देव" उपाधी देते हुए ओड़िशा का राजा घोषित कर दिया !
मुस्लिम ऐतिहासिक फेरस्ता के किताब से पताचलता है कि
--सुलेमान कारसान उर्फ गरजानी का पुत्र दाउद खाँ कुछदिनोँ तक ओड़िशा खंड का दखलकार था ।
दिल्ली सम्राट अकबर उनदिनोँ बंगाल के अफगान शासनकर्ताओँ से वेहद खफा थे । अंतमे मोगल सेनापति मनेम खाँ व खाँजाहान नेँ अफगानोँ को हराकर 1568 मेँ बंगाल व ओड़िशा को दिल्ली साम्राज्य मेँ मिलादिया था ।--
*फिर कुछदिनोँ बाद
अकबर के सेनापतिओँ मेँ जानेमाने "शवाई मानसिँह"
साम्राज्य संबधीय कार्य तदारख के लिये ओड़िशा आये और यहाँ कि देवालय व समाजिक व्यवस्था देखकर उनके मनमेँ ओड़िशा के लिये अपनापन और प्रगाढ़ हुआ !
कुछदिन ओड़िशा मेँ काटकर जाते समय शवाई मानसिँह ने पुरी राजा रामचंद्र देव को ओड़िशा का संपूर्ण राज सौँपते हुए दिल्ली लौटे ।
1582 मेँ मोगल राज के देवान टोडरमल्ल ओड़िशा आये ! और शावाई मानसिँह कि तरह उन्हे भी ओड़िशा व ओड़िआ लोग खुव भाये ।
जाते समय टोडरमल्ल ने ओड़िशा को करमुक्त करदिया ।
1592 तक मोगल राज ने ओड़िशा पर खास तबज्जो नहीँ दिया था परंतु उसी वर्ष बंगाल के प्रतिनीधि राजा मानसिँह के आगमन से इस क्षेत्र मेँ मोगलराज होना तय हो गया ।
उनदिनोँ ओड़िशा के पुरी राजा रामचंद्र देव
व मुकुन्ददेव के दो पुत्र रामचन्द्र राय तथा छकड़ी भ्रमरवर के बीच ओड़िशा पर प्रभुत्व पाने के लिये होड़ लगी हुई थी ।
परंतु मानसिँह के मध्यस्थता मेँ
सारे विवादोँ का अन्त हो गया ।
इसके तहत पुरी, खोर्दा ,कटक ,घुमुसुर, महुरी तथा गंजाम जिल्ला की खेमण्डी सीमातक कि सारी जमीन रामचंद्र देव को
पूर्ण स्वतंत्र शासन हेतु प्राप्त हुआ ।
वहीँ मुकुन्ददेव के बड़े पुत्र रामचंद्र राय को #आळि व इसके अधीनस्थ सभी क्षेत्र जमीदारी के तहत प्राप्त हुए ।
मुकुन्ददेव के कनिष्ठ पुत्र छकड़ि भ्रमरवर को सारगंगड़ प्राप्त हुआ ।
मानसिँह ने अफगानोँ को परास्त कर उत्कल व बंगाल मेँ कुछ हद तक विद्रोह दमन किया तथा इस क्षेत्र मेँ कुछ काल तक शान्ति स्थापना हो पाया ।
इसबीच अफगानोँ ने 1599 और 1611 मेँ फिर विद्रोह किया परंतु प्रादेशिक शक्तिओँ से उन्हे कड़ी चुनौति मिलता रहा और वो हमला करते रहे ,असफल होते रहे ।
1600 वी सदी मेँ अकबर ने ओड़िशा बंगाल का शासनभार अपने बड़े पुत्र के उपर न्यस्थ किया ।
परंतु अकबर के मृत्यु बाद जाहागिँर ने इस क्षेत्र को अपने छोटे भाई के हातोँ सौँप दिया ।
फिर 1612 से 22 तक ओड़िशा दिल्ली सम्राट के साले साहेब के हातोँ रहा ।
1622 मेँ साहाजाहान के साथ उनके मामा मकरम् खाँ का किसी बात पर झगड़ा हो गया और वो दिल्ली से ओड़िशा आ गया एक वर्ष के अंदर अंदर उसने बंगाल के नवाब को हराकर बंगाल पर राजकरना शुरुकिरदिया था । 1624 तक बंगाल पर राज करने के बाद दिल्ली कि शक्ति के आगे परास्त हो ओड़िशा लौटा !!!
क्रमशः....
"रणेइ राउतरा" को
"रामचँद्र देव" उपाधी देते हुए ओड़िशा का राजा घोषित कर दिया !
मुस्लिम ऐतिहासिक फेरस्ता के किताब से पताचलता है कि
--सुलेमान कारसान उर्फ गरजानी का पुत्र दाउद खाँ कुछदिनोँ तक ओड़िशा खंड का दखलकार था ।
दिल्ली सम्राट अकबर उनदिनोँ बंगाल के अफगान शासनकर्ताओँ से वेहद खफा थे । अंतमे मोगल सेनापति मनेम खाँ व खाँजाहान नेँ अफगानोँ को हराकर 1568 मेँ बंगाल व ओड़िशा को दिल्ली साम्राज्य मेँ मिलादिया था ।--
*फिर कुछदिनोँ बाद
अकबर के सेनापतिओँ मेँ जानेमाने "शवाई मानसिँह"
साम्राज्य संबधीय कार्य तदारख के लिये ओड़िशा आये और यहाँ कि देवालय व समाजिक व्यवस्था देखकर उनके मनमेँ ओड़िशा के लिये अपनापन और प्रगाढ़ हुआ !
कुछदिन ओड़िशा मेँ काटकर जाते समय शवाई मानसिँह ने पुरी राजा रामचंद्र देव को ओड़िशा का संपूर्ण राज सौँपते हुए दिल्ली लौटे ।
1582 मेँ मोगल राज के देवान टोडरमल्ल ओड़िशा आये ! और शावाई मानसिँह कि तरह उन्हे भी ओड़िशा व ओड़िआ लोग खुव भाये ।
जाते समय टोडरमल्ल ने ओड़िशा को करमुक्त करदिया ।
1592 तक मोगल राज ने ओड़िशा पर खास तबज्जो नहीँ दिया था परंतु उसी वर्ष बंगाल के प्रतिनीधि राजा मानसिँह के आगमन से इस क्षेत्र मेँ मोगलराज होना तय हो गया ।
उनदिनोँ ओड़िशा के पुरी राजा रामचंद्र देव
व मुकुन्ददेव के दो पुत्र रामचन्द्र राय तथा छकड़ी भ्रमरवर के बीच ओड़िशा पर प्रभुत्व पाने के लिये होड़ लगी हुई थी ।
परंतु मानसिँह के मध्यस्थता मेँ
सारे विवादोँ का अन्त हो गया ।
इसके तहत पुरी, खोर्दा ,कटक ,घुमुसुर, महुरी तथा गंजाम जिल्ला की खेमण्डी सीमातक कि सारी जमीन रामचंद्र देव को
पूर्ण स्वतंत्र शासन हेतु प्राप्त हुआ ।
वहीँ मुकुन्ददेव के बड़े पुत्र रामचंद्र राय को #आळि व इसके अधीनस्थ सभी क्षेत्र जमीदारी के तहत प्राप्त हुए ।
मुकुन्ददेव के कनिष्ठ पुत्र छकड़ि भ्रमरवर को सारगंगड़ प्राप्त हुआ ।
मानसिँह ने अफगानोँ को परास्त कर उत्कल व बंगाल मेँ कुछ हद तक विद्रोह दमन किया तथा इस क्षेत्र मेँ कुछ काल तक शान्ति स्थापना हो पाया ।
इसबीच अफगानोँ ने 1599 और 1611 मेँ फिर विद्रोह किया परंतु प्रादेशिक शक्तिओँ से उन्हे कड़ी चुनौति मिलता रहा और वो हमला करते रहे ,असफल होते रहे ।
1600 वी सदी मेँ अकबर ने ओड़िशा बंगाल का शासनभार अपने बड़े पुत्र के उपर न्यस्थ किया ।
परंतु अकबर के मृत्यु बाद जाहागिँर ने इस क्षेत्र को अपने छोटे भाई के हातोँ सौँप दिया ।
फिर 1612 से 22 तक ओड़िशा दिल्ली सम्राट के साले साहेब के हातोँ रहा ।
1622 मेँ साहाजाहान के साथ उनके मामा मकरम् खाँ का किसी बात पर झगड़ा हो गया और वो दिल्ली से ओड़िशा आ गया एक वर्ष के अंदर अंदर उसने बंगाल के नवाब को हराकर बंगाल पर राजकरना शुरुकिरदिया था । 1624 तक बंगाल पर राज करने के बाद दिल्ली कि शक्ति के आगे परास्त हो ओड़िशा लौटा !!!
क्रमशः....
गुरुवार, 30 जुलाई 2015
उत्कल ओड़िशा पर मुस्लिम आक्रमण ....(भाग 2)
मादलापांजी नामक उत्कलीय ग्रँथ से पताचलता हे की आखरी गंगवंशी राजा अकटाअवटा भानु के राजत्वकाल मेँ अकवर के दूत ने ओड़िशा से मित्रता का हाथ बढ़ाया था । परंतु कपिलेन्द्रदेवजी के राजत्वकाल मेँ चौतरफा भिषण युद्ध छिड़ा था ।
दक्षिण भारतीय मुसलमान च्युँकि कर्णाट व तेलगांना राज्य के खिलाफ लम्बे समय से विद्रोहरत्त थे उन्होने ओड़िशा पर ज्यादा तबज्जोँ नहीँ दिया ।
मुस्लिम ऐतिहासिकोँ कि माने तो ओड़िशा राजा कपिलेन्द्र देव के वजह से पठानोँ ने ओड़िशा पर फिर हमला किया था जबकी ये बात वो बदलनहीँ सकते कि उनके पूर्वज ही प्रथम आक्रमणकारी था च्युँकि यही संसारी सत्य है !
हुमायुन शाह बाहमन के राजत्वकाल मेँ तेलेगाँना क्षेत्र के लोगोँ पर पठानोँ का अत्याचार सोच से परे है । अब तेलेगाँ लोग
अत्याचार से प्रताड़ित हो ओड़िशा मेँ आनेलगे ।
जब कपिलेन्द्र देवजी को ये बात ज्ञात हुआ उन्होने तुरंत कारवाई करते हुए अपने सैनिक व हाती भेजकर तेलगाँना को मदद पहचाँई ।
दोनोँ राज्य कि सैन्योँ ने मिलकर मुसलमानोँ को पिछे खदेड़ दिया था ।
हुमायुन का पुत्र निजाम शाह के राजत्व काल मेँ फिर तेलेगांना पर हमला हुआ । मुस्लिम सैन्य बड़े जोश के साथ आगे बढ़रहे थे लेकिन जब उन्हे पताचला कि उत्कल राजा आगे उनसे लढ़ने हेतु तैयार बैठे है वो सब निराश हो लौट गये ।
राजमेहेन्द्र से कंटापाली तक का क्षेत्र तब #उडिया नामसे जानाजाता था । वहाँ का राजा 1417 मेँ मुसलमानोँ से जा मिला । लेकिन हिम्ब राज्य का राजा महम्मद शाह ने उसी कि राज्य पर कब्जा कर ली ।
उड़िया राजा का जब ज्ञानोदय हुआ तो वो फिर उत्कल राजपरिवार से जा मिले परंतु तबतक कपिलेन्द्र देव बृद्ध हो गये थे तथा उनका कोई शक्तिशाली वंशज भी न था तो
अहमन शाह से हारकर उससे संधि करना पड़ा । पर अहमन शाह के मन मेँ प्रतिहिँसा का आग सुलग रहा था । उसने अपने 20000 कातिल हैवान सैनिकोँ को लेकर ओड़िशा/उत्कल पर हमला करदिया और लुटपाट करते हुए राजधानी तक आ पहँचा । उसे हालाँकि इस युद्ध मेँ जीत मिली परंतु प्रतिकूल जलवायु व खाद्याभाव आदि समस्याओँ के कारण वो बिना राजधानी लुटे ही लौटगया ।
पुरुषोत्तम देव के राजत्व काल मेँ मुसलमानोँ ने उत्तरी दिशा से #कटक वारबाटी दुर्ग पर हमला किया । वहाँ के राजा अनन्त सामन्त सिँहार कटक दुर्ग को बचा न सके और गुप्त रुप से सारंगगढ़ मेँ रहने लगे । मुसलमानोँ ने तय कर लिया था कि वो अब #पुरी व #जगन्नाथ जी को फतह करके ही लौटेगेँ ।
राजा प्रतापरुद्र देव का वो राजत्वकाल था....बुढ़े प्रतापरुद्र ने भगवान जी को समंदर बालु मेँ छुपाने के लिये कहा और खुद शत्रुऔँ से संधि करने पहँचे ।
संधी मेँ देवस्थल से दूर रहना का प्रस्ताव मुसलमानोँ ने मानलिया व लौट गये ।
1531 मे प्रतापरुद्र देव भी चलवसे और उनके साथ साथ उत्कल भाग्यरवि भी डुबगया
क्रमशः..,.
ये लेख prachin utkal ओड़िआ किताब दुसरे भाग से प्रेरित है
मूल लेखक जगबंधु सिँह है
दक्षिण भारतीय मुसलमान च्युँकि कर्णाट व तेलगांना राज्य के खिलाफ लम्बे समय से विद्रोहरत्त थे उन्होने ओड़िशा पर ज्यादा तबज्जोँ नहीँ दिया ।
मुस्लिम ऐतिहासिकोँ कि माने तो ओड़िशा राजा कपिलेन्द्र देव के वजह से पठानोँ ने ओड़िशा पर फिर हमला किया था जबकी ये बात वो बदलनहीँ सकते कि उनके पूर्वज ही प्रथम आक्रमणकारी था च्युँकि यही संसारी सत्य है !
हुमायुन शाह बाहमन के राजत्वकाल मेँ तेलेगाँना क्षेत्र के लोगोँ पर पठानोँ का अत्याचार सोच से परे है । अब तेलेगाँ लोग
अत्याचार से प्रताड़ित हो ओड़िशा मेँ आनेलगे ।
जब कपिलेन्द्र देवजी को ये बात ज्ञात हुआ उन्होने तुरंत कारवाई करते हुए अपने सैनिक व हाती भेजकर तेलगाँना को मदद पहचाँई ।
दोनोँ राज्य कि सैन्योँ ने मिलकर मुसलमानोँ को पिछे खदेड़ दिया था ।
हुमायुन का पुत्र निजाम शाह के राजत्व काल मेँ फिर तेलेगांना पर हमला हुआ । मुस्लिम सैन्य बड़े जोश के साथ आगे बढ़रहे थे लेकिन जब उन्हे पताचला कि उत्कल राजा आगे उनसे लढ़ने हेतु तैयार बैठे है वो सब निराश हो लौट गये ।
राजमेहेन्द्र से कंटापाली तक का क्षेत्र तब #उडिया नामसे जानाजाता था । वहाँ का राजा 1417 मेँ मुसलमानोँ से जा मिला । लेकिन हिम्ब राज्य का राजा महम्मद शाह ने उसी कि राज्य पर कब्जा कर ली ।
उड़िया राजा का जब ज्ञानोदय हुआ तो वो फिर उत्कल राजपरिवार से जा मिले परंतु तबतक कपिलेन्द्र देव बृद्ध हो गये थे तथा उनका कोई शक्तिशाली वंशज भी न था तो
अहमन शाह से हारकर उससे संधि करना पड़ा । पर अहमन शाह के मन मेँ प्रतिहिँसा का आग सुलग रहा था । उसने अपने 20000 कातिल हैवान सैनिकोँ को लेकर ओड़िशा/उत्कल पर हमला करदिया और लुटपाट करते हुए राजधानी तक आ पहँचा । उसे हालाँकि इस युद्ध मेँ जीत मिली परंतु प्रतिकूल जलवायु व खाद्याभाव आदि समस्याओँ के कारण वो बिना राजधानी लुटे ही लौटगया ।
पुरुषोत्तम देव के राजत्व काल मेँ मुसलमानोँ ने उत्तरी दिशा से #कटक वारबाटी दुर्ग पर हमला किया । वहाँ के राजा अनन्त सामन्त सिँहार कटक दुर्ग को बचा न सके और गुप्त रुप से सारंगगढ़ मेँ रहने लगे । मुसलमानोँ ने तय कर लिया था कि वो अब #पुरी व #जगन्नाथ जी को फतह करके ही लौटेगेँ ।
राजा प्रतापरुद्र देव का वो राजत्वकाल था....बुढ़े प्रतापरुद्र ने भगवान जी को समंदर बालु मेँ छुपाने के लिये कहा और खुद शत्रुऔँ से संधि करने पहँचे ।
संधी मेँ देवस्थल से दूर रहना का प्रस्ताव मुसलमानोँ ने मानलिया व लौट गये ।
1531 मे प्रतापरुद्र देव भी चलवसे और उनके साथ साथ उत्कल भाग्यरवि भी डुबगया
क्रमशः..,.
ये लेख prachin utkal ओड़िआ किताब दुसरे भाग से प्रेरित है
मूल लेखक जगबंधु सिँह है
उत्कल / ओड़िशा पर मुस्लिम आक्रमण (भाग 1)
1212 मेँ दिल्ली राजगद्दी पर राजकरनेवाला गयासुद्दिन वलमन नेँ ओड़िशा प्रान्त से लगान माँगने हेतु धमकीभरा पत्र के साथ अपना दूत भेजा !
बंगाल के राजाओँ ने तबतक गयासुद्दिन से डर कर लगान दिल्ली भेजदिया था ।
अब बंगाल के निकट स्थित उत्कल/ओड़िशा की बारी थी ।
परंतु ये लागुंडा नरसिँह देवजी का राजत्वकाल था स्वाधिनता तब स्वाभिमान बनकर ओड़िआओँ के अंग अंग मेँ समाया हुआ था ।
गयासुद्दिन को जबाबी पत्र लिखकर भेजदिया गया ..,इससे
दिल्ली के मुसलमानोँ ने ओड़िशा पर हमला करदिया परंतु पराजित होकर लौटगये ।
पर मुस्लिम जाति का एक नियम ए है कि ये लोग हारकर पिछे जरुर हटजाते है परंतु वेशर्मोँ कि भाँति आतर्कित हमले के लिये फिर आ धमकते है ।
1243 मेँ तोगान खाँ ने ओड़िशा पर हमला किया बदले मेँ ओड़िआ वीर पाइकोँ नेँ उसे हराते हुए दिल्ली शासनाधीन गौड प्रदेश या बंगाल पर अधिकार कर लिया ।
1253 मेँ तोगान खाँ ने पुनर्वार हमले किए पर फिर मुँह काला करके दिल्ली लौटा
अब मुसलमानोँ ने उत्तर व दक्षिण दिशाओँ से ओड़िशा पर हमला करना शुरुकरदिया ।
परंतु राजा व सैन्य एकमन हो लढ़ते रहे और तबतक लढ़ते रहे जबतक राजा व प्रजा मेँ एकता बरकरार रहा ।
कहते है भाई भाई मेँ झगड़ा लगा हो तो इसमेँ दुसरे लोग अपना अपना फायदा उठाने के लिये उन्हे आपस मेँ और लढ़वाते है ।
1309 मेँ उत्कल राजा ने अपनी ही प्रजा पर विजय पाने के लिये मुसलमानोँ की सहायता माँगकर
अपनी ही पैरोँ पर कुराड़ी दे मारी । अब च्युँकि संधी के हिसाब से ओड़िशा दिल्ली दरवार को लगान देने के लिये राजी हो गया 1309 से 1451 तक कोई मुस्लीम आक्रमण नही हुए ।
1451 आते आते कुछ पठान आ कर के ओड़िशा मेँ लुटपाट करने लगे । तबतक मुसलमानोँ ने मान्द्राज Chhenai मेँ अपना वसेरा बना लिया था ।
ओड़िशा व दक्षिण भारतीय प्रजा इनके दौरात्म्य से परेशान हो गई थी ।
1452 साल मेँ दक्षिण भारतीय राजा के साथ ओड़िशा राजा ने मिलकर पठानोँ पर हमला करदिया । परंतु अंत मेँ 8000000 रु देकर उन्हे दिल्ली दरवार से शान्ति समछौता करना पड़ा ।
कुछ दिन क्षेत्र मेँ सब शान्त रहा परंतु अब ओड़िशा व दक्षिणभारतीय राजाओँ के बीच आपसी खिँचतान शुरु हो गयी ।
ये झगड़ा युद्धरुप लेनेलगा और आखिरकार
राजमहेन्द्री व कंटापाली के राजाओँ ने दक्षिण ओड़िशा स्थित दो दूर्ग पर कब्जा कर लिया !
इससे ओड़िशा राजा की ज्ञानोदय हुआ वे फिर दक्षिण भारतीय राजपरिवारोँ के संग जा मिले ।
अब ये बात मुसलमानोँ को अछी नहीँ लगी तो दिल्ली दरवार ने फिर 20000 पठान ओड़िशा जीत के लिये भेजदिया । पठान आक्रमणकारीओँ के द्वारा
कुछ लुटपाट व मंदिरोँ को ध्वस किया गया परंतु हिन्दु एकता के हार कर लौटे ।
15वीँ सदी मेँ ओड़िशा राजा फिर मुसलमानोँ से जा मिले और दक्षिण महेन्द्री राजपरिवार के खिलाफ युद्ध के लिये दक्षिणभारत पर चढ़ाई की परंतु
ये युद्ध दिर्घकाल तक चला बीना किसी निर्णय के !
16वीँ सदी मेँ कृष्णराय राजमहेन्द्री राजसिँहासन पर विराजित हुए ।
कहते है ' वे असाधरण वीर कुशली तीरंदाज भी थे ,उनके वीरता का आलम ये था की एकबार तो उन्होने पठानोँ की एक बड़ी टोली को समंदर कि और कुच करजाने को विवश कर दिया था ।
उनकी शौर्यगाथा सिलोन (Srilanka) से तिब्बत तक प्रसिद्ध हुआ है....
मुसलमानोँ के लिये वो आखरी काँटे थे । ओड़िशा से लम्बे दिनोँ तक चलरहे सीमाविवाद को निपटाने व पारिवारिक संबन्ध बनाकर आपसी एकता को और मजबुत करने हेतु कृष्णराय ने अपनी एक कन्या का विवाह ओड़िशा राजा से करवाया ।
क्रमशः .... Prachin utkal 2 nd part odia history book का हिन्दी अनुवाद
मूल लेखक जगबंधु सिँह है
बंगाल के राजाओँ ने तबतक गयासुद्दिन से डर कर लगान दिल्ली भेजदिया था ।
अब बंगाल के निकट स्थित उत्कल/ओड़िशा की बारी थी ।
परंतु ये लागुंडा नरसिँह देवजी का राजत्वकाल था स्वाधिनता तब स्वाभिमान बनकर ओड़िआओँ के अंग अंग मेँ समाया हुआ था ।
गयासुद्दिन को जबाबी पत्र लिखकर भेजदिया गया ..,इससे
दिल्ली के मुसलमानोँ ने ओड़िशा पर हमला करदिया परंतु पराजित होकर लौटगये ।
पर मुस्लिम जाति का एक नियम ए है कि ये लोग हारकर पिछे जरुर हटजाते है परंतु वेशर्मोँ कि भाँति आतर्कित हमले के लिये फिर आ धमकते है ।
1243 मेँ तोगान खाँ ने ओड़िशा पर हमला किया बदले मेँ ओड़िआ वीर पाइकोँ नेँ उसे हराते हुए दिल्ली शासनाधीन गौड प्रदेश या बंगाल पर अधिकार कर लिया ।
1253 मेँ तोगान खाँ ने पुनर्वार हमले किए पर फिर मुँह काला करके दिल्ली लौटा
अब मुसलमानोँ ने उत्तर व दक्षिण दिशाओँ से ओड़िशा पर हमला करना शुरुकरदिया ।
परंतु राजा व सैन्य एकमन हो लढ़ते रहे और तबतक लढ़ते रहे जबतक राजा व प्रजा मेँ एकता बरकरार रहा ।
कहते है भाई भाई मेँ झगड़ा लगा हो तो इसमेँ दुसरे लोग अपना अपना फायदा उठाने के लिये उन्हे आपस मेँ और लढ़वाते है ।
1309 मेँ उत्कल राजा ने अपनी ही प्रजा पर विजय पाने के लिये मुसलमानोँ की सहायता माँगकर
अपनी ही पैरोँ पर कुराड़ी दे मारी । अब च्युँकि संधी के हिसाब से ओड़िशा दिल्ली दरवार को लगान देने के लिये राजी हो गया 1309 से 1451 तक कोई मुस्लीम आक्रमण नही हुए ।
1451 आते आते कुछ पठान आ कर के ओड़िशा मेँ लुटपाट करने लगे । तबतक मुसलमानोँ ने मान्द्राज Chhenai मेँ अपना वसेरा बना लिया था ।
ओड़िशा व दक्षिण भारतीय प्रजा इनके दौरात्म्य से परेशान हो गई थी ।
1452 साल मेँ दक्षिण भारतीय राजा के साथ ओड़िशा राजा ने मिलकर पठानोँ पर हमला करदिया । परंतु अंत मेँ 8000000 रु देकर उन्हे दिल्ली दरवार से शान्ति समछौता करना पड़ा ।
कुछ दिन क्षेत्र मेँ सब शान्त रहा परंतु अब ओड़िशा व दक्षिणभारतीय राजाओँ के बीच आपसी खिँचतान शुरु हो गयी ।
ये झगड़ा युद्धरुप लेनेलगा और आखिरकार
राजमहेन्द्री व कंटापाली के राजाओँ ने दक्षिण ओड़िशा स्थित दो दूर्ग पर कब्जा कर लिया !
इससे ओड़िशा राजा की ज्ञानोदय हुआ वे फिर दक्षिण भारतीय राजपरिवारोँ के संग जा मिले ।
अब ये बात मुसलमानोँ को अछी नहीँ लगी तो दिल्ली दरवार ने फिर 20000 पठान ओड़िशा जीत के लिये भेजदिया । पठान आक्रमणकारीओँ के द्वारा
कुछ लुटपाट व मंदिरोँ को ध्वस किया गया परंतु हिन्दु एकता के हार कर लौटे ।
15वीँ सदी मेँ ओड़िशा राजा फिर मुसलमानोँ से जा मिले और दक्षिण महेन्द्री राजपरिवार के खिलाफ युद्ध के लिये दक्षिणभारत पर चढ़ाई की परंतु
ये युद्ध दिर्घकाल तक चला बीना किसी निर्णय के !
16वीँ सदी मेँ कृष्णराय राजमहेन्द्री राजसिँहासन पर विराजित हुए ।
कहते है ' वे असाधरण वीर कुशली तीरंदाज भी थे ,उनके वीरता का आलम ये था की एकबार तो उन्होने पठानोँ की एक बड़ी टोली को समंदर कि और कुच करजाने को विवश कर दिया था ।
उनकी शौर्यगाथा सिलोन (Srilanka) से तिब्बत तक प्रसिद्ध हुआ है....
मुसलमानोँ के लिये वो आखरी काँटे थे । ओड़िशा से लम्बे दिनोँ तक चलरहे सीमाविवाद को निपटाने व पारिवारिक संबन्ध बनाकर आपसी एकता को और मजबुत करने हेतु कृष्णराय ने अपनी एक कन्या का विवाह ओड़िशा राजा से करवाया ।
क्रमशः .... Prachin utkal 2 nd part odia history book का हिन्दी अनुवाद
मूल लेखक जगबंधु सिँह है
सोमवार, 29 जून 2015
मयुरभंज और बारिपदा के बारे मेँ सम्यक रोचक तथ्य
अगर आप ओड़िशा घुमने आते हो और #मयुरभञ्ज #Mayurbhanj कि सैर नही किये तो कहना पड़ेगा आपने ओड़िशा देखा ही नहीँ !
ओड़िशा का सबसे बड़ा जिल्ला #मयुरभंज पर भंज व केशरी राज परिवार का बर्चस्व रहा है ।
मयुरभंज कि मुख्यालय बारिपदा या वारिपदा मेँ स्थित है । ओड़िशा मे सबसे पहले रेलपथ से जुड़नेवाला सहर है वारिपदा ! उनदिनोँ भंजराज कृष्णचंद्रदेव ने वारिपदा को नेरोगेज रेलवे लेन के तहत हावड़ा चेन्नई रेलवे से संयुक्त करवाया था । अंग्रेजीराज मेँ ओड़िशा का पहला एयरपोर्ट भी मयुरभंज जिल्ला के रासगोविँदपुर (वारिपदा से 60 ୬୦ Km.) । दुसरे विश्वयुद्ध के समय इस जंगी एयारपोर्ट का निर्माण अंग्रेजोँ ने करवाया था यहाँ 2 किलोमिटर लम्बा टैक अफ ट्रेक है ।
मयुरभंज छउ लोक नृत्य के लिये विश्व प्रसिद्ध है । इस जिल्ला मेँ चैत्र माह पर पाइकवीरोँ द्वारा दक्षता पदर्शन हेतु जगह जगह छउनृत्यप्रतियोगिताओँ का आयोजन कियाजाता है ।
वहीँ श्रीजगन्नाथ रथयात्रा भी यहाँ के प्रमुख तौहारोँ मेँ से एक हे । ओड़िशा मेँ इसे द्वितीय श्रीक्षेत्र कहते ,यहाँ पुरीरथयात्रा के एक दिन बाद रथयात्रा होता है । वारिपदा के निकट सिमलिपाल टाइगर रिर्जव सैलानीओँ को अपनीऔर आकर्षित करता है । 1956 में इसे टाइगर रिजर्व प्रोजेक्ट मेँ आधिकारिक रुप से सामिल किया गया था । के लिए किया गया था। बारीपादा से यह 60 किमी. दूर स्थित हे ,यह पार्क 2277.07 वर्ग किमी. के क्षेत्रफल में फैला हुआ है । प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण इस वन्य अभ्यारण्य मे वाघ के अलावा हाथी हिरन व अन्य वन्यजीव पायेजाते हे । बारिपदा से 150 किमी. दूर स्थित खिचिंग नगर अपने प्राचीन मंदिरों के लिए जाना जाता है। एक समय मे यह स्थान भंज शासकों की राजधानी थी। देवी चामुंडा को समर्पित यहां का मंदिर प्रमुख और लोकप्रिय दर्शनीय स्थल है । देवी चामुंडा का यह मंदिर किचकेश्वरी के नाम से प्रसिद्ध हे । यह मंदिर पत्थर की अनोखी मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है। चौलाकुंज और बिराटगढ़ यहां के अन्य चर्चित स्थल हैं। चौलाकुंज विशाल स्तंभों और बिराटगढ़ संग्रहालय के लिए जाना जाता है।
ओड़िशा का सबसे बड़ा जिल्ला #मयुरभंज पर भंज व केशरी राज परिवार का बर्चस्व रहा है ।
मयुरभंज कि मुख्यालय बारिपदा या वारिपदा मेँ स्थित है । ओड़िशा मे सबसे पहले रेलपथ से जुड़नेवाला सहर है वारिपदा ! उनदिनोँ भंजराज कृष्णचंद्रदेव ने वारिपदा को नेरोगेज रेलवे लेन के तहत हावड़ा चेन्नई रेलवे से संयुक्त करवाया था । अंग्रेजीराज मेँ ओड़िशा का पहला एयरपोर्ट भी मयुरभंज जिल्ला के रासगोविँदपुर (वारिपदा से 60 ୬୦ Km.) । दुसरे विश्वयुद्ध के समय इस जंगी एयारपोर्ट का निर्माण अंग्रेजोँ ने करवाया था यहाँ 2 किलोमिटर लम्बा टैक अफ ट्रेक है ।
मयुरभंज छउ लोक नृत्य के लिये विश्व प्रसिद्ध है । इस जिल्ला मेँ चैत्र माह पर पाइकवीरोँ द्वारा दक्षता पदर्शन हेतु जगह जगह छउनृत्यप्रतियोगिताओँ का आयोजन कियाजाता है ।
वहीँ श्रीजगन्नाथ रथयात्रा भी यहाँ के प्रमुख तौहारोँ मेँ से एक हे । ओड़िशा मेँ इसे द्वितीय श्रीक्षेत्र कहते ,यहाँ पुरीरथयात्रा के एक दिन बाद रथयात्रा होता है । वारिपदा के निकट सिमलिपाल टाइगर रिर्जव सैलानीओँ को अपनीऔर आकर्षित करता है । 1956 में इसे टाइगर रिजर्व प्रोजेक्ट मेँ आधिकारिक रुप से सामिल किया गया था । के लिए किया गया था। बारीपादा से यह 60 किमी. दूर स्थित हे ,यह पार्क 2277.07 वर्ग किमी. के क्षेत्रफल में फैला हुआ है । प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण इस वन्य अभ्यारण्य मे वाघ के अलावा हाथी हिरन व अन्य वन्यजीव पायेजाते हे । बारिपदा से 150 किमी. दूर स्थित खिचिंग नगर अपने प्राचीन मंदिरों के लिए जाना जाता है। एक समय मे यह स्थान भंज शासकों की राजधानी थी। देवी चामुंडा को समर्पित यहां का मंदिर प्रमुख और लोकप्रिय दर्शनीय स्थल है । देवी चामुंडा का यह मंदिर किचकेश्वरी के नाम से प्रसिद्ध हे । यह मंदिर पत्थर की अनोखी मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है। चौलाकुंज और बिराटगढ़ यहां के अन्य चर्चित स्थल हैं। चौलाकुंज विशाल स्तंभों और बिराटगढ़ संग्रहालय के लिए जाना जाता है।
सोमवार, 15 जून 2015
रज पर्व
ओड़िशा मेँ रज पर्व का खास महत्व होता हे ,यह पर्व चार दिन के लिये मनाया जाता हे
[[पहिलि रज
रजसक्रान्ति/मिथुन सक्रान्ति
शेष रज
वसुमति स्नान]]
चार दिन तक चलने वाली इस पर्व के प्रथम दिन को पहिलि रज
द्वितीय दिन को रज संक्रान्ति
तथा अंतिम दिन को भूमिदाह ,भूमि दहन व शेष रज भी कहाजाता है ।
पर्व के अंतिम व चौथे दिन को वसुमती स्नान दिवस कहाजाता है । इस पर्व का आरम्भ होना खेती कि शुरवाद करने हेतु सुचित करता है । प्रायः इस पर्व के दौरान मॉनसुन कि बरसात हो जाता है और कृषक लोग खेतोँ मेँ धान कि बीज वपन करते है ।
। प्राचिनकाल मेँ रज पर्व कब कैसे प्रारंभ हुआ इसका सटिक विवरण उपलब्ध नही , परंतु इसे सम्भवतः स्थानीय लोगोँ ने पृथ्वी माता तथा नारीऔँ की गौरव बढ़ाने हेतु मनाना शुरुकिया था । रज पर्व के इन चार दिनोँ मेँ ओड़िशा प्रान्त के लोग न तो धरती पर खुदाई करते न चपल पहन कर चला करते है । नारीआँ विभिन्न प्रकार की प्रादेशिक पकवान व मिठाई बनाकर घर परिवार को खिलाती पड़ोशीओँ मेँ बाँटती ।
तिन दिन तक इस क्षेत्र के नारीआँ न तो मसाला बाटती न सब्जी काटती है ये सब तीन दिन के लिये पुरुषोँ को करना होता हे ।
तिन दिन तक इस प्रान्त के नारीआँ वृक्ष शाखाओँ मेँ झुला बाँधकर झुला झुलती पायीजाती है इसे प्रान्तिय भाषा मेँ दोळी कहाजाता है ।
वसुमती स्नान रजपर्व का अंतिम दिन है ।
इस दिन धरतीमाता के साथ साथ महालक्ष्मी की भी पूजा कियाजाता है । रजस्वला नारी जैसे ऋतु स्नान पश्चात् पवित्र होति है ठिक उसी प्रकार वर्षाजल द्वारा पृथ्वी माता का ऋतुस्नान मनसुन के आने से संपन्न होता हे । पुरातन काल मेँ इस क्षेत्र के लोग मानते थे कि ऋतुस्नान बाद अब धरती माँ कृषि सृजन व वीज धारण हेतु उपयुक्त हो जाती हे ।
इस पर्व मेँ उत्कल भुखंड के नारीआँ झुला झुलते समय कई तरह कि गीत गाया करती है ।
ये गीत आज स्थानीय लोकगीतोँ मेँ काफी लोकप्रिय है ।
उत्कलीय नारी इन गीतोँ मेँ अपने दिलोँ मेँ दफ्न उन दुःख दर्द व आकांक्षाओँ को वयाँ करती हुई सामाजिक सुधार कि उम्मिद रखती है । कोई कोई गाने मजेदार भी होते है ये नंनन्द भैजाई व देवर भाबी आदि मधुर संपर्क रखनेवाले लोग आपस मेँ दोहराते हुए सामाजिक बंधनोँ को और सुदृढ़ बनाते ।
रज पर्व मेँ ज्यादातर पुरुष लोग क्रिकेट कबड्डी तास आदि खेलोँ मेँ छुट्टीओँ का आनंद लेते है । वहीँ पुरुषोँ को चुला चौका मेँ ये 4 दिन नारीओँ कि मदद करना होता हे । इसके पिछे उद्देश्य होता है पुरुषोँ को बताना कि नारीआँ घर चलाने के लिये कितना महनत करती हे नारी सम्मान बढ़ाने हेतु इसतरह की रीति रिवाज जोड़दिया गया हे ।
[[पहिलि रज
रजसक्रान्ति/मिथुन सक्रान्ति
शेष रज
वसुमति स्नान]]
चार दिन तक चलने वाली इस पर्व के प्रथम दिन को पहिलि रज
द्वितीय दिन को रज संक्रान्ति
तथा अंतिम दिन को भूमिदाह ,भूमि दहन व शेष रज भी कहाजाता है ।
पर्व के अंतिम व चौथे दिन को वसुमती स्नान दिवस कहाजाता है । इस पर्व का आरम्भ होना खेती कि शुरवाद करने हेतु सुचित करता है । प्रायः इस पर्व के दौरान मॉनसुन कि बरसात हो जाता है और कृषक लोग खेतोँ मेँ धान कि बीज वपन करते है ।
। प्राचिनकाल मेँ रज पर्व कब कैसे प्रारंभ हुआ इसका सटिक विवरण उपलब्ध नही , परंतु इसे सम्भवतः स्थानीय लोगोँ ने पृथ्वी माता तथा नारीऔँ की गौरव बढ़ाने हेतु मनाना शुरुकिया था । रज पर्व के इन चार दिनोँ मेँ ओड़िशा प्रान्त के लोग न तो धरती पर खुदाई करते न चपल पहन कर चला करते है । नारीआँ विभिन्न प्रकार की प्रादेशिक पकवान व मिठाई बनाकर घर परिवार को खिलाती पड़ोशीओँ मेँ बाँटती ।
तिन दिन तक इस क्षेत्र के नारीआँ न तो मसाला बाटती न सब्जी काटती है ये सब तीन दिन के लिये पुरुषोँ को करना होता हे ।
तिन दिन तक इस प्रान्त के नारीआँ वृक्ष शाखाओँ मेँ झुला बाँधकर झुला झुलती पायीजाती है इसे प्रान्तिय भाषा मेँ दोळी कहाजाता है ।
वसुमती स्नान रजपर्व का अंतिम दिन है ।
इस दिन धरतीमाता के साथ साथ महालक्ष्मी की भी पूजा कियाजाता है । रजस्वला नारी जैसे ऋतु स्नान पश्चात् पवित्र होति है ठिक उसी प्रकार वर्षाजल द्वारा पृथ्वी माता का ऋतुस्नान मनसुन के आने से संपन्न होता हे । पुरातन काल मेँ इस क्षेत्र के लोग मानते थे कि ऋतुस्नान बाद अब धरती माँ कृषि सृजन व वीज धारण हेतु उपयुक्त हो जाती हे ।
इस पर्व मेँ उत्कल भुखंड के नारीआँ झुला झुलते समय कई तरह कि गीत गाया करती है ।
ये गीत आज स्थानीय लोकगीतोँ मेँ काफी लोकप्रिय है ।
उत्कलीय नारी इन गीतोँ मेँ अपने दिलोँ मेँ दफ्न उन दुःख दर्द व आकांक्षाओँ को वयाँ करती हुई सामाजिक सुधार कि उम्मिद रखती है । कोई कोई गाने मजेदार भी होते है ये नंनन्द भैजाई व देवर भाबी आदि मधुर संपर्क रखनेवाले लोग आपस मेँ दोहराते हुए सामाजिक बंधनोँ को और सुदृढ़ बनाते ।
रज पर्व मेँ ज्यादातर पुरुष लोग क्रिकेट कबड्डी तास आदि खेलोँ मेँ छुट्टीओँ का आनंद लेते है । वहीँ पुरुषोँ को चुला चौका मेँ ये 4 दिन नारीओँ कि मदद करना होता हे । इसके पिछे उद्देश्य होता है पुरुषोँ को बताना कि नारीआँ घर चलाने के लिये कितना महनत करती हे नारी सम्मान बढ़ाने हेतु इसतरह की रीति रिवाज जोड़दिया गया हे ।
गुरुवार, 28 मई 2015
फकिरमोहन सेनापति जी की बुद्धिमता
ओड़िआ भाषा को पुनः जीवित करनेवाले संक्रान्ति पुरुष (Fakir mohan senapati) व्यासकवि फकिरमोहन सेनापति जी युवावस्था मेँ बांग्ला भाषी पत्रपत्रिकाओँ मेँ बांग्ला कविता व प्रबन्ध लिखाकरते थे । उन दिनोँ ओड़िआ भाषाको लुप्त करने कि चालेँ चली जा रही थी ,बंगाल मेँ स्थानीय लेखको द्वारा "ODIA EK SWOTANTRO BHASA NOOY " आदि लेख लिखेजानेलगे ! फकीर मोहनजी ने ओड़िआ भाषा को बचाने कि ठान ली और ओड़िआ साहित्य रचना करने मे लग गये ।
वे जीवनपर्यन्त लिखते गये कभी रुके नही कविता ,कहानी ,उपन्यास प्रबन्ध सहित्य कि हर क्षेत्र मेँ अपने प्रतिभा दिखाए ।
प्रेमचंद व फकिर मोहन सेनापति जी की जीवनी व रचनाओँ मेँ काफी समानताएँ देखि जा सकती है । ओड़िआ भाषा मेँ पहला क्षुद्रगल्प "रेबति" को फकिरमोहन जी ने हीँ लिखा था ।
उत्कल सम्मिलनी बनाकर मातृभाषा को बचानेवाले बुद्धिजीविओँ मेँ उनका नाम सबसे पहले आता है ।
वालेश्वर जिल्ला मेँ जन्मेँ फकिरमोहन जी का असली नाम व्रजमोहन था , वे खंडयात परिवार मेँ जन्मे थे । वाल्यकाल मेँ फकिर बाबा के कृपा से बचजाने के वजह से उनकी दादी उनको फकिरमोहन बुलाने लगी और ये नाम रहगया ।
ओड़िशा के कई राजपरिवारोँ मेँ वे दिवान रहे ! जीवन की आखिरी दिनोँ मेँ वे बालेश्वर जिल्ला राजपरिवार के दिवान थे ।
उनदिनोँ(1920-1929) ओड़िशा मेँ लोग ब्रिटिस व राजाओँ से उबकर कुछ लोग
#प्रजामेली बनाकर सशस्त्र आंदोलन करने लगे थे । इन आंदोलनकारीओँ द्वारा ज्यादातर राजनवरोँ पर ही हमला किया जा रहा था जबकी असली शत्रु अंग्रेज इसे कुचलने मेँ कामियाब हो जाते ।
ऐसा ही एक प्रजामेली आंदोलन बालेश्वर जिल्ला मेँ हुआ । विद्रोहीओँ के द्वारा बालेश्वर राजनवर का घिराव किया गया । बालेश्वर राजा व राजपरिवार गुप्तरस्तोँ से कटक के लिये निकल लिये पर फँस गये देवान फकिर मोहन व कुछ और राजकर्मचारी । उन सभी कैदीओँ समेत विद्रोहीओँ ने फकिरमोहन को भी बंदी बनालिया ।
विद्रोहीओँ का जोश दुगना हो चुका था वे सब राजनवर लुटेजाने को लेकर काफी उन्मादी हो रहे थे ।
फकिर मोहन जी को एक बात सुझी उन्होने विद्रोहीओँ से कहा कि वे अपने गाँव मेँ रहनेवाले भाई को चिठ्ठी लिखना चाहते है । विद्रोही सरदार इसबात पर चिठ्ठी भेजने के लिये तैयार हो गया कि पहले उस चिठ्ठी कि जाँच होगी क्या पता इसमे शत्रृओँ को हमारे बारे मेँ जानकारी दियेजाने की कोशिश किया जाय । विद्रोहीओँ के सरदार ने फकिरमोहन जी से कहा कि वे पान के शौकिन है अतः गाँव से पान व सुपारी भी मंगवा लिजिये । फकिरमोहन जी ने जो चिठ्ठी लिखी थी वो इसप्रकार है :-
[[ "ଭୋଳାନାଥ ଖମାରୀଆ ଜାଣିବୁ, ମହାରାଣୀ ଭୀକ୍ଟୋରିଆଙ୍କ ପୁତ୍ରଙ୍କ ସକାଶେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଜରୁରୀ, ଅତିଶୀଘ୍ର ଶହେ ପାନ ଦୁଇଶହ ଗୁଆ ପଠାଇବୁ, ଉତ୍ତର ପଟୁ ମାହାରା କରି ଆଖିବାଡି ରେ ପାଣି ବୁହାଇବୁ, ନହେଲେ ଆଖୁବାଡି ବିନାଶ ଯିବ ଜାଣିବୁ
BHOLANATH KHAMARIYA JANIBU MAHARANI VICTORIYA NKA PUTRA NKA SAKAASHE ATYANTA JARURI
ATISIGHRA SAHE PAAN DUI SAHA GUAA PATHAAIBU
UTTARA PATU MAHARA KARI PANI BUHAIBU NAHELE AKHUBADI BINASH JIBA JANIBU]]
हिँदी मेँ इसका भाषान्तर इसप्रकार है :-
भोलानाथ खमारिया समझियेगा
रानी विक्टोरिया कि पुत्र के लिये अत्यन्त जरुरी
100 पान के पत्ते व 200 सुपारी जल्दी भेजो
उत्तरी दिशा से गन्ने के खेतोँ मेँ पानी बहादेना नहीँ तो पुरा का पुरा खेत नष्ट हो जाएगी !!!
गाँव मेँ चिठ्ठी पहचाँ उस चिठ्ठी को पढ़कर सब हैरान !
भोलानाथ खमारिया ,रानी विक्टोरिया का पुत्र ,गन्ने का खेत और पान सुपारी कुछ समझनहीँ पाये गाँववाले ।
ये चिठ्ठी फकीरमोहन जी के मित्र मधुसुदन दास जी के पास पहचाँ और उन्होने इसका गृढ़ अर्थ कुछ ऐसा निकाला
विद्रोहीओँ का सरदार खुदको महारानी विक्टोरिया का पुत्र मानता था जाहिर हे उसके दिल मेँ देशप्रेम कम राजनवर लुटने कि चाहत ज्यादा थी
पान =का अर्थ यहाँ सैनिक,
गुआ या सुपारी माने गोलाबारुद ,गन्ने का खेत का मतलब राजनवर और उत्तरी दिशा से हमला करने को कहागया है ।
मधुबाबु के तारन निकालेजाने पर वैसे ही किया गया व राजनवर लुटने से बचगया ।
फकिरमोहनजी ने इसबात का जिक्र अपने जीवनी या अटोवायोग्राफी मेँ की है ।
वे 13 जन्मवरी मकर संक्रान्ति मेँ जन्मे थे व 14 जुन 1929 को रजसंक्रान्ति पर उनका निधन हो गया था...........
वे जीवनपर्यन्त लिखते गये कभी रुके नही कविता ,कहानी ,उपन्यास प्रबन्ध सहित्य कि हर क्षेत्र मेँ अपने प्रतिभा दिखाए ।
प्रेमचंद व फकिर मोहन सेनापति जी की जीवनी व रचनाओँ मेँ काफी समानताएँ देखि जा सकती है । ओड़िआ भाषा मेँ पहला क्षुद्रगल्प "रेबति" को फकिरमोहन जी ने हीँ लिखा था ।
उत्कल सम्मिलनी बनाकर मातृभाषा को बचानेवाले बुद्धिजीविओँ मेँ उनका नाम सबसे पहले आता है ।
वालेश्वर जिल्ला मेँ जन्मेँ फकिरमोहन जी का असली नाम व्रजमोहन था , वे खंडयात परिवार मेँ जन्मे थे । वाल्यकाल मेँ फकिर बाबा के कृपा से बचजाने के वजह से उनकी दादी उनको फकिरमोहन बुलाने लगी और ये नाम रहगया ।
ओड़िशा के कई राजपरिवारोँ मेँ वे दिवान रहे ! जीवन की आखिरी दिनोँ मेँ वे बालेश्वर जिल्ला राजपरिवार के दिवान थे ।
उनदिनोँ(1920-1929) ओड़िशा मेँ लोग ब्रिटिस व राजाओँ से उबकर कुछ लोग
#प्रजामेली बनाकर सशस्त्र आंदोलन करने लगे थे । इन आंदोलनकारीओँ द्वारा ज्यादातर राजनवरोँ पर ही हमला किया जा रहा था जबकी असली शत्रु अंग्रेज इसे कुचलने मेँ कामियाब हो जाते ।
ऐसा ही एक प्रजामेली आंदोलन बालेश्वर जिल्ला मेँ हुआ । विद्रोहीओँ के द्वारा बालेश्वर राजनवर का घिराव किया गया । बालेश्वर राजा व राजपरिवार गुप्तरस्तोँ से कटक के लिये निकल लिये पर फँस गये देवान फकिर मोहन व कुछ और राजकर्मचारी । उन सभी कैदीओँ समेत विद्रोहीओँ ने फकिरमोहन को भी बंदी बनालिया ।
विद्रोहीओँ का जोश दुगना हो चुका था वे सब राजनवर लुटेजाने को लेकर काफी उन्मादी हो रहे थे ।
फकिर मोहन जी को एक बात सुझी उन्होने विद्रोहीओँ से कहा कि वे अपने गाँव मेँ रहनेवाले भाई को चिठ्ठी लिखना चाहते है । विद्रोही सरदार इसबात पर चिठ्ठी भेजने के लिये तैयार हो गया कि पहले उस चिठ्ठी कि जाँच होगी क्या पता इसमे शत्रृओँ को हमारे बारे मेँ जानकारी दियेजाने की कोशिश किया जाय । विद्रोहीओँ के सरदार ने फकिरमोहन जी से कहा कि वे पान के शौकिन है अतः गाँव से पान व सुपारी भी मंगवा लिजिये । फकिरमोहन जी ने जो चिठ्ठी लिखी थी वो इसप्रकार है :-
[[ "ଭୋଳାନାଥ ଖମାରୀଆ ଜାଣିବୁ, ମହାରାଣୀ ଭୀକ୍ଟୋରିଆଙ୍କ ପୁତ୍ରଙ୍କ ସକାଶେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଜରୁରୀ, ଅତିଶୀଘ୍ର ଶହେ ପାନ ଦୁଇଶହ ଗୁଆ ପଠାଇବୁ, ଉତ୍ତର ପଟୁ ମାହାରା କରି ଆଖିବାଡି ରେ ପାଣି ବୁହାଇବୁ, ନହେଲେ ଆଖୁବାଡି ବିନାଶ ଯିବ ଜାଣିବୁ
BHOLANATH KHAMARIYA JANIBU MAHARANI VICTORIYA NKA PUTRA NKA SAKAASHE ATYANTA JARURI
ATISIGHRA SAHE PAAN DUI SAHA GUAA PATHAAIBU
UTTARA PATU MAHARA KARI PANI BUHAIBU NAHELE AKHUBADI BINASH JIBA JANIBU]]
हिँदी मेँ इसका भाषान्तर इसप्रकार है :-
भोलानाथ खमारिया समझियेगा
रानी विक्टोरिया कि पुत्र के लिये अत्यन्त जरुरी
100 पान के पत्ते व 200 सुपारी जल्दी भेजो
उत्तरी दिशा से गन्ने के खेतोँ मेँ पानी बहादेना नहीँ तो पुरा का पुरा खेत नष्ट हो जाएगी !!!
गाँव मेँ चिठ्ठी पहचाँ उस चिठ्ठी को पढ़कर सब हैरान !
भोलानाथ खमारिया ,रानी विक्टोरिया का पुत्र ,गन्ने का खेत और पान सुपारी कुछ समझनहीँ पाये गाँववाले ।
ये चिठ्ठी फकीरमोहन जी के मित्र मधुसुदन दास जी के पास पहचाँ और उन्होने इसका गृढ़ अर्थ कुछ ऐसा निकाला
विद्रोहीओँ का सरदार खुदको महारानी विक्टोरिया का पुत्र मानता था जाहिर हे उसके दिल मेँ देशप्रेम कम राजनवर लुटने कि चाहत ज्यादा थी
पान =का अर्थ यहाँ सैनिक,
गुआ या सुपारी माने गोलाबारुद ,गन्ने का खेत का मतलब राजनवर और उत्तरी दिशा से हमला करने को कहागया है ।
मधुबाबु के तारन निकालेजाने पर वैसे ही किया गया व राजनवर लुटने से बचगया ।
फकिरमोहनजी ने इसबात का जिक्र अपने जीवनी या अटोवायोग्राफी मेँ की है ।
वे 13 जन्मवरी मकर संक्रान्ति मेँ जन्मे थे व 14 जुन 1929 को रजसंक्रान्ति पर उनका निधन हो गया था...........
रविवार, 24 मई 2015
बलियार सिँह जी कि वीरता और संबलपुर जिल्ला की शीतलषष्ठी पर्व
ओड़िशा राज्य स्थित सम्बलपुर जिल्ला मेँ प्रसिद्ध शीतलषष्ठी पर्व कबसे शुरु हुई इस सम्बंध मेँ सटिक तथ्य नहीँ है । अवश्य विषय मेँ एक जनसृति प्रचलन मेँ पायाजाता हे
वो इसप्रकार है ।
छत्रपति राजा बलियार सिँह/अजित सिँह जी कि राजत्वकाल मेँ संभवतः इस त्योहार को बड़े पैमाने पर मनाये जाने लगा था ।
छत्रपति बलियार सिँहजी को 18 गड़जात सम्मान देने हेतु जगन्नाथपुरी महाराज नेँ उन्हे जगन्नाथपुरी आमन्त्रण किया । पुरी राजा नेँ वलियार सिँह जी शक्ति परिचय हेतु 7 श्रेष्ठ मल्लयोद्धाओँ को नियोजित कर लिया । वीर बलीयार सिँह जी दरबार मेँ आ कर के पुरीराजा का अभिवादन कर रहे थे कि योद्धाओँ ने उनपर धाबा वोलदिया । इससे विचलित न हो बलियार सिँह जी ने युद्ध कि और सारे के सारे मल्लयोद्धाओँ को अपने वाहुबल से धरासायी करदिया ।
बलियार सिँह से पुरी महाराजा प्रभावित हो गये और सिँहासन से दौडकर उन्हे गले लगालिया व कुछ माँगने के लिये आग्रह करने लगे । उन दिनोँ सम्बलपुर क्षेत्र मेँ ब्राह्मण न थे अतः सम्बलपुर राजा ने उन्हे सम्बलपुर ब्राह्मण गाँव बसाने का अनुरोध किया । राज आदेश तथा आदिवासी क्षेत्रोँ मेँ वैष्णव धर्म कि प्रचार प्रसार हेतु कई ब्राह्मण परिवार सम्बलपुर गये और वहाँ के होकर रहगये । मानाजाता है कि ब्राह्मणोँ के सम्बलपुर आने के बाद से यहाँ शिव पार्वति विवाहोस्छब शुरु हुआ था । इस धार्मिक विवाह मेँ शिवजी का वारात काफी मनोहारी होता है ,ओड़िशा कि पारंपरिक करतब नृत्य परिवेषण करते हुए वरपक्ष पुरे सहर मेँ घुमते पायेजाते है ।
वो इसप्रकार है ।
छत्रपति राजा बलियार सिँह/अजित सिँह जी कि राजत्वकाल मेँ संभवतः इस त्योहार को बड़े पैमाने पर मनाये जाने लगा था ।
छत्रपति बलियार सिँहजी को 18 गड़जात सम्मान देने हेतु जगन्नाथपुरी महाराज नेँ उन्हे जगन्नाथपुरी आमन्त्रण किया । पुरी राजा नेँ वलियार सिँह जी शक्ति परिचय हेतु 7 श्रेष्ठ मल्लयोद्धाओँ को नियोजित कर लिया । वीर बलीयार सिँह जी दरबार मेँ आ कर के पुरीराजा का अभिवादन कर रहे थे कि योद्धाओँ ने उनपर धाबा वोलदिया । इससे विचलित न हो बलियार सिँह जी ने युद्ध कि और सारे के सारे मल्लयोद्धाओँ को अपने वाहुबल से धरासायी करदिया ।
बलियार सिँह से पुरी महाराजा प्रभावित हो गये और सिँहासन से दौडकर उन्हे गले लगालिया व कुछ माँगने के लिये आग्रह करने लगे । उन दिनोँ सम्बलपुर क्षेत्र मेँ ब्राह्मण न थे अतः सम्बलपुर राजा ने उन्हे सम्बलपुर ब्राह्मण गाँव बसाने का अनुरोध किया । राज आदेश तथा आदिवासी क्षेत्रोँ मेँ वैष्णव धर्म कि प्रचार प्रसार हेतु कई ब्राह्मण परिवार सम्बलपुर गये और वहाँ के होकर रहगये । मानाजाता है कि ब्राह्मणोँ के सम्बलपुर आने के बाद से यहाँ शिव पार्वति विवाहोस्छब शुरु हुआ था । इस धार्मिक विवाह मेँ शिवजी का वारात काफी मनोहारी होता है ,ओड़िशा कि पारंपरिक करतब नृत्य परिवेषण करते हुए वरपक्ष पुरे सहर मेँ घुमते पायेजाते है ।
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